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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

तृतीयशतक ३. (९५)
से छकना विषमतेजहै, आशय यह कि, हे सखी! भयसे मदका
मद उतरजाताहै परन्तु रूपका मद नहीं उतरता, उसमें नींद
आती है पर इसमें नहीं, वह समयपर जाताहै यह नहीं, उस-
के पानेसे चेत होजाताहै इसरूपको क्षणमात्र पान करनेसे
फिर चेत नहीं होता, मदके मदसे रूपका मद बड़ाहै। आक्षिप्त
उपमामें व्यतिरेक ॥ २७७ ॥
चित वित वचत न हरत हठि, लालन दृगवर जोर।
सावधानके वटपरा, ये जागतकें चोर ॥ २७८ ॥
हे सखी मेरा चित्तरूपी धन नहीं बचता कृष्णके नेत्र
वरजोरीसे उसको हरे लेतेहैं, सावधानके वटमार और जागत
के चोरहैं [ वटमार-मार्ग्लुटेरे ] विभावना ॥ २७८ ॥
चखरुचिचूरन डारिकै, ठग लगाय निजसाथ ।
रह्यो राखिहठलैगयो, हथाहथी मनहाथ ॥२७९॥
आंखोंकी शोभारूप भभूत डालकर वह ठग अपने साथ
लगाकर बलसे अति हठकर हाथोंहाथ मेरे मनको वशकर
लेगया आशय यह कि, उसकी शोभासे मेरा मन उसके साथ
गया और रुक न सका जैसे ठग भुकनी डालकर हाथ पकड़
लेजातेहैं । विशेषोक्ति ॥ २७९ ॥
कीन्हे हू कोरिक यतन, अवगाहि काढ़े कौन ।