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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 141

( ८८ ) सतसई-सटीक ।
छिपाराखी, सौगंध खाया, भौंहोंमें हँसे देनेको कहै और
फिर मुकर जाती है। पर्याय० स्वभावोक्ति ॥ २५४ ॥
विक्षेपहाव ।
गुडी उडी लखि लालकी, अँगना अँगना मांहि ।
बौरीलों दौरतिफिरै, छुवत छबीली छांहि॥२५५॥
प्रीतमकी गुड्डी ( कनकैया ) उडी देख वह बाला अपने
आँगन २ में बौरीहुईसी दौडती फिरती है और पतंगकी
छांहको छूतीहै। छेकानुप्रास पूर्णोपमा ॥ २५५ ॥
बोधकहाववर्णन ।
लखि गुरुजन बिच कमलसों, सीस छुवायोश्याम
हरिसन्मुख करि आरसी, हिये लगाई वाम२५६
गुरुजनोंके मध्यमें प्यारीको देख कृष्णने कमलको
शिरसे छुवाया, और प्यारीने आरसी कृष्णके सन्मुखकर
हृदयसे लगाई अर्थात् कृष्णने शिरपर कमल धर प्रणाम
किया. प्यारीने आरसी दिखाय हिय लगाय रातमें मिलनेको
कहा। सूक्ष्मालंकार ॥ २५६ ॥
मैंहू जान्यो लोचननि, जुरत बाढिहै जोति ।
कोहो जानत दीठिकों,दीठिकिरकिटीहोति २५७
हे सखी! मैंने जानीही कि आंखोंके मिलतेही आंखोंमें जो-
ति बढैगी,यह मैंने नहीं जाना कि,दृष्टि लगनेसे दृष्टि किरकिटी