बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८६ ) सतसई-सटीक ।
अठखेलीसे आंखका धक्का दे गँवारी मुझे विद्ध किये देती है
'मदहाव' 'जाति' अलंकार ॥ २४८ ॥
जात मरी बिछुरत घरी, जल सफरीकी रीति ।
क्षणक्षण होत खरी खरी,अरी जरी यह प्रीति २४९
एकघरी भी जलसे बिछुरे तो मरजाती है यह मच्छरीकी
रीति है,परन्तु हे सखी! यह हमारी जली प्रीति तो पलपलमें
अधिक होती है आशय यह,मच्छरी तो मरकर दुःखसे छूटती
है और मैं तो क्षणक्षण अधिक दुःखपाती हूं वा वियोगमें प्रीति
बढती है तपनहाव वर्णन किया ॥ २४९ ॥
द्वैजसुधादीधितिकला, यह लखि दीठि लगाय ।
मनो अकास अगस्तिया,एकै कली लखाय २५०
दोयजके चन्द्रमाकी अमृत भरी कलाको जान दृष्टि
लगाकर देख, जैसे आकाशरूपी अगस्तके वृक्षमें एकही
कली दिखाई दे रही है [ दीधिति चन्द्रमा ] । 'मुग्धाहाव
पर्यायोक्ति और उत्प्रेक्षालंकार' ॥ २५० ॥
मोट्टायितहाववर्णन ।
सकुचिसरकिपिय निकटतें,मुलकिकछुकतनतोरि
करआँचरकी ओटकर,जमुहानी मुख मोरि २५१