बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयशतक ३. (८९)
होती है आशय यह कि, देखतेही सात्त्विक हुआ और आं-
सूभर कर दृष्टि किरकिरी होगई । विषमालंकार ॥ २५७ ॥
हरिछवि जल जबतें परे, तबतें क्षणनिवरैन ।
भरत ढरत ऊडत तरत, रहत घरीलों नैन ॥२५८॥
कृष्णकी छविरूप जलमें जबसे पड़ेहैं, तबसे क्षणमा-
त्रको निचिन्त नहीं हैं, भरते हैं, ढरकते हैं, मग्न होते हैं,
तिरते हैं, कटोरेकी घड़ीकी समान नेत्रोंकी दशा है । उप-
मालंकार ॥ २५८ ॥
अलि इन लोयनको कछू, उपजी बडी बलाय ।
नीरभरे नित प्रति रहें, तऊन प्यास बुझाय २५९॥
हे सखी ! इन नेत्रोंको कोई बड़ा रोग उपजाहै, इनमें नित
जल भरा रहता है, तथापि ( प्रीतमदर्शनकी ) प्यास नहीं
जाती, विनादेखे जल भरे, देखनेसे तृष्णा नहीं मिटती । वि-
शेषोक्ति ॥ ५९ ॥
अलि इनलोयनशरनिको, खरो विषम संचार ।
लगे लगाये एकसे, दुहवन करत सुमार ॥ २६० ॥
हे सखी ! इन नैनारूपी बानकी कठिन गति है, यह लगे
लगाये एकसे हैं और लगानेसे दोनोंको मूर्छित करते हैं
असंगति ॥ ६० ॥