बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९४ ) सतसई-सटीक ।
है हिय रहति हईछई, नई युक्ति यह जोड़ ।
आँखिन आँख लगीरहै, देह दूबरी होइ ॥२७४॥
हाय हाय तेरे हृदयमें यह नई रीति छाई रहतीहै आं-
खोंसे आंखें लगी रहतीहैं और शरीर सूखताहै। असंगति २७४
क्योंवसिये क्यों निवजिये नीतिनेह पुरनाहिं ।
लगालगी लोयनकरैं, नाहक मन बँधजाहिं २७५
यहां कैसे वसै और कैसे निवाहहो प्रीति नगरमें न्याय न-
हीं होता लगालगी तौ नेत्र करते हैं, मन वृथा बँधजाता है।
असंगति ॥ २७५ ॥
जात सयान अयान ह्वै, वे ठग काहिठगैन ।
को ललचाय न लालके, लखिललचोहेनैन २७६
वहां सयाना भी अयाना होजाताहै वे नेत्ररूपी ठग किसे
नहीं ठगते, लालके ललचोहे नेत्र देखकर कौन न ललचावै।
व्याजस्तुति ॥ २७६ ॥
डर न टरै नींद न परैं, हरै न काल विपाक ।
क्षणछाकैकैउछकैनफिर, खरोविषमछविछाक २७७
डर दूर नहीं होता, नींद नहीं आती, कालकर्म भोगको हरण
नहीं करता, एकक्षण छककर फिर नहीं उछकता, छबिके मद-