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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

(९०) सतसई-सटीक ।
लोभ लगे हरि रूपके, करी सांट जुरिजाय ।
होयनबेचीबीचही, लोयन बडी बलाय ॥ २६१ ॥
सट्टेकी गोष्ठीमें परस्पर मिलकर कृष्णके रूपके लोभमें
लगगये यह मेरे नेत्र बड़ी बलाय हैं, इन्होंने मुझे बीचहीमें
बेच दिया आशय यह कि, प्यारी प्रीतमके पास जातीथी अचा-
नक वे मार्गमें मिलगये तो नेत्र लगजानेसे मन उनके आधीन
होगया इस कारण सखीसे कहा कि, मैं वहाँतक पहुंची भी
नहीं और इन्होंने सट्टाकर प्रीतमका रूप पानकर बदलेमें मुझे
सेतमेत देदिया रूपक ॥ २६१ ॥
नैना नैकन मानहीं, कितौ कह्यो समुझाय ।
तन मन हारेहू हँसे, तिनसों कहा बसाय ॥ २६२ ॥
यह नेत्र मेरी एक नहीं मानते मैंने इन्हे कितनाही सम-
झाकर कहा यह शरीर और मन हारनेसे भी हँसतेहैं इनसे
क्या बसाय । विशेषोक्ति ॥ २६२ ॥
ढरे ढार तेही ढरत, दूजे ढार ढरैन ।
क्याहूं आनन आनसों, नैना लागत नैन ॥ २६३ ॥
हे सखी ! यह जिस ओर ढरगये उसी ओरको ढरगये
दूसरी ओर नहीं ढरते यह हमारी आंखें किसी प्रकार भी