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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 144

तृतीयशतक ३. (९१)
( आन ) दूसरेके मुखकी ओर लगतीही नहीं ऐसी आसक्त
है । छेकानुप्रास ॥ २६३ ॥
कहत सकल कविकमलसे, मो मत नैन पषान ।
नतरुकुकत इनघिसिलगत,उपजत विरहकृशान॥
सम्पूर्ण कवि नेत्रोंको कमलसे कहतेंहैं परन्तु मेरे मतमें ने-
त्र पत्थर हैं नहीं तो जब यह परस्पर चारहोकर मिलतेहैं तो इ
नकी रगड़से अग्नि क्यों उत्पन्न होतीहै कमलकी रगड़से आग
उत्पन्न नहीं होती । हेतूत्प्रेक्षा ॥ २६४ ॥
साजे मोहन मोहकों, मोही करत कुचैन ।
कहाकरों उलटे परें, टोनै लौने नैन ॥ २६५ ॥
यह मैंने ( अंजन लगाय ) कृष्णके मोहनेको सजाये
परन्तु यह मुझेही मोहित करते हैं क्याकरूं इन नेत्ररूप
जादूगरका जादू उलटा मेरेही ऊपर पड़ा। विषमालं-
कार ॥ २६५ ॥
मोहूसों तजि मोह दृग,चले लागि उहिँगैल ।
क्षणक छाय छविगुर् डरी,छलेछबीले छैल २६६
मेरी आंखें मुझसे भी मोह छोड़ कर उनके पीछे हो उन्हीं-
की राहचलीं छिन एक छविरूपी गुड़की डली छुवायके
छबीले प्रीतमने मेरे नेत्र ठगलिये । रूपक ॥ २६६॥