बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयशतक ३. ( ८५ )
है ॥ ७ ॥ स्वांतिबूँद पिया दर्शन तेरो । प्रेम सखीको मन
चातक चेरो। तेरे नामकी रटन लगाई है ॥ ८ ॥
चलत घरै घर घरतऊ, घरी न घर ठहराति ।
समुझिउहीघरकोचलै, भूलिउहीघरजाति २४६॥
अपने घरकी कोठरी कोठरीमें घूमती है, तौभी घरमें
घड़ीभर नहीं ठहरती जानकरभी उसी घरको जाती है.
भूलकरभी उसी घरको जातीहै. अथवा समझ उही-परघरकी
उस दुर्नामताको समझकर घरको चलती है और फिर
प्रेमके कारण निन्दाको भूल कृष्णकेही स्थानको चली
आती है 'भ्रांति' ॥ २४६ ॥
नाहिं नहीं नाहींककै, नारि निहोरै लेय ।
छुवतओठविचआँगुरिन,बिरीवदनप्यौँदेय २४७
नहीं नहीं कर प्यारी निहोरैसे लेती है, प्यारे पानकी
बीड़ी देते समय होंठोंको अंगुरियोंसे छू देते हैं 'कुट्टामित
हाव, स्वभावोक्ति' ॥ २४७ ॥
गदराने तन गोरटी, ऐपन आड लिलार ।
हृस्यौँदैअठलायदृग, करै गँवारि सुमार ॥२४८॥
गदराने शरीरकी गोरी बाला माथेपर ऐपनकी आड लगाये