बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयशतक ३. (९३)
हे सखी इन दुखिया आँखोंको तो विधाताने सुख बना-
याही नहीं लोकोंके देखते लाजसे देखना नहीं बनता अथवा
देखतेसमय आंसू आनेसे नहीं देखाजाता और बिन देखे
अकुलाती हैं । विशेषोक्ति ॥ २७० ॥
को जानेहैहै कहां, जग उपजी अति आगि ।
मनलागे नैननि लगै, चलै न मगलग लागि २७१॥
सखी कौन जाने क्या होगा जगतमें अधिक आग उपजीहै
यह नेत्रोंमें लगतेही मनमें लगती है तू इसकारण इस (प्रेमकी
आगके ) निकट होकर मत चल । असंगति ॥ २७१ ॥
वनतनको निकसत लसत,हँसत हँसत इतआय ।
दृगखंजनि गहिलैगयो,चितवनिचपलगाय २७२
वनकी ओरको निकलते, शोभित होते हँसते हँसते इधर
आकर अपनी चितवनका चेप लगाकर मेरे नेत्ररूपी खंजन
( ममोले ) को पकड़कर लेगये । रूपकालंकार ॥ २७२ ॥
दृगउरझतटूटतकुटुमजुरतिचतुरसँगप्रीति ।
परतिगांठदुर्जनहिये, दईनई यहरीति ॥ २७३ ॥
नेत्रोंके उलझनेसे कुटुम्ब टूटताहै चतुरके संग प्रीति जु-
ड़ती है शत्रुके मनमें गांठ पड़ती है हे विधाता यह नई रीतिहै।
असंगति ॥ २७३ ॥