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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

तृतीयशतक ३. ( ७५ )
मैंने बहाना करके सोये हुएको निश्चयही सोया जान
कर उनके धोरे जाय मुख चूमा जब वे हँसे तब मैं खिसियानी
होगई उन्होंने मेरा गला पकड़ा तब मैं उनके गलेसे लिपट
गई अर्थात् गलेमें हाथ डाल चुम्बन करना चाहा परन्तु मैं
मुख ऊँचाकर लिपट गई । भ्रान्ति ॥ २१४ ॥
मुँह उघारि प्यौ लखि रहत, रह्योनगो मिस सैन॥
फरके होठ उठे पुलक, गये उघर जुग नैन२१५॥
मुँह उघारकर प्रीतम देख रहेथे तब उससे बहाना करके
सोना न बनपड़ा, होठ फड़क उठे शरीरमें रोमांच होकर
दोनों नेत्र खुलगये । जात्यलंकार ॥ २१५ ॥
दोऊ चोर मिहीचनी, खेलन खेल अघात ।
दुरत हिये लपटायकै,छुवत हिये लपटात २१६॥
नायक और परकीया बाला आंखमिचौली खेलतेहैं परन्तु
खेलसे मन नहीं भरता छातीसे लिपटकर छिपते हैं और छा-
तीसे लिपटकर छूते हैं । विशेषोक्ति ॥ २१६ ॥
मदपानवर्णन ।
हँसि हँसि हेरत नवलतिय, मदके मद उमदाति॥
वैलकिवेलकि बोलतिवचन,ललकिललकि लपटाति॥

( ७६ ) सतसई-सटीक ।
नवोढ़ा बाला हँस हँसकर देखतीहै हर्षकी मदिरासे उमँग-
तीहै उमँग उमँगके बात करतीहै और बढ बढ कर प्रीतमसे
लिपटती जातीहै! जाति अलंकार वा वीप्सा ॥ २१७ ॥
निपट लजीली नवल तिय, बहकि वारुणी सेइ ।
त्यों त्योंअतिमीठी लगे, ज्यों ज्यों दीठीदइ २१८
नवोढा बाला अत्यन्त लजौलीथी मदपान करके बहक-
गई ज्यों ज्यों प्रीतमसे ढिठाई करतीहै त्यों त्यों उसे अच्छी
लगतीहै । जाति अलंकार ॥ २१८ ॥
स्खलितवचनअधखुलितदृग,ललितस्वेदकणजोति
अरुणवदनछबिमदछकी,खरीछबीलीहोति २१९
खिलखिलाकर बातें करती है अधखुले नेत्रहैं सुन्दर प-
सीनेके मोतियोंकी ज्योति चमकती है लाल मुखहै शोभाके
मदसे मतवाली बाला अति शोभित होती है।जाति०॥२१९॥
रूपसुधा आसव छक्यो, आसव पियत बनै न।
प्याले ओठ प्रियावदन, रह्यो लगाये नैन २२०॥
प्यारीके रूपरूपी अमृतसे पेट भरनेके कारण मदपान
नहीं कियाजाता, प्यालेसे होठ लगायेंहैं और नेत्र प्रियाके
मुखकी ओर लग रहेहैं। तुल्ययोगिता ॥ २२० ॥
गली अँधेरी साँकरी, भो भटभेरो आन।

तृतीयशतक ३. ( ७७ )
परे पिछाने परस्पर, दोऊ परस पिछान॥२२१॥
गली अंधेरी और छोटी है वहां दोनोंका भेटभेग हुआ
परस्पर शरीरसे शरीर लगनेसे दोनों जानेगये । उन्मी-
लितालंकार ॥ २२१ ॥
लटकिलटिकिलटकत चलत, डटतमुकुटकीछांहं।
चटकभन्यो नटमिलगयो, अटक भटकवनमांहं॥
झुकझुककर लटकते चलते मुकुटकी छाँहको देखते च-
टकभर छविके भरे नटवर वेष किये कृष्ण अटकने भटकने
वनमें मुझको मिलगये । जातिस्वभावोक्ति॥ २२२ ॥
अहै दहेडी जिन धरै, जिन तू लेइ उतारि ।
नीकैहैं छींको छुवै, ऐसेही रह नारि ॥ २२३ ॥
प्रीतमका प्यारीसे परिहास; अरी दहीकी हांडी मत धरै
और उतारकर मत भूलै, छींका छुएहुए अच्छी लगती है हे
नारि ! ऐसेही रह, आशय यह छींकेपर हांडी रखते प्यारी

( ७८ ) सतसई-सटीक ।
रुठा रुठा देता हैं, लीलामें लगे प्रीतमको प्रियाका क्रोध
भी रिझाता जाता है।पंचम विभावना विरुद्धते कार्य्य॥२२४॥
दै छिंगुनी पहुँच्यो गिलत, अतिदीनता दिखाय ॥
बलि बामनको ब्योंत सुनि, को बल तुम्हें पत्याय ।
परकीयासे रति मांगते हैं सो वह हँसी करती है अति
दीनता दिखाकर अंगुरी छूकर पहुँचा पकड़तेहो, बलि
और तुम्हारे वामन अवतारकी रीति सुनकर तुम्हारा विश्वास
कौन करै, जैसे छोटेहो बलिसे भूमि मांग फिर सब लेकर
उसे दुःख दिया इसीप्रकार अँगुरी पकड पहुँचेको हाथ
चलाय सर्वस्वं ले यही दशा हमारी करोगे।लोकोक्ति ॥२२५॥
चिरजीवो जोरी जुरै, क्यों न सनेह गँभीर ।
को घटिये वृषभानुजा, वे हलधरके वीर ॥ २२६ ॥
राधाकृष्णकी जोरी चिरकालतक जियो, इनका गंभीर
प्रेम क्यों न हो, इन दोनोंमें कौन घाट है वृषभानुकी बेटी
या बलदेवके भाई । समालंकार [ दोहा-समप्रभाव वर्णन
जहां, दो वस्तुनको होय॥ कहत समालंकार तेहि, जानत यहि
कोइ कोय ] ॥ २२६ ॥
कहा लड़ैते दृगकरै, परे लाल बेहाल ।
कहूँ मुरली कहूँ पीतपट, कहूँ मुकुट वनमाल २२७

तृतीयशतक ३. ( ७२ )
हे लाड़ले ! ऐसे क्या तुमने अपने नेत्र किये हैं जो तुम
बेहाल पड़ेहो कहीं मुरली, कहीं पीला वस्त्र, कहीं मुकुट, कहीं
वनमाला पड़ी है; चलकर तो देख । व्याजस्तुति ॥ २२७ ॥
यों दल मिलियत निरदई, दइ कुसुमसे गात ।
करधर देखो धरधरा, अजौं न उरको जात २२८॥
हे भगवन् ! यह निर्दयी होकर फूलोंसे गातको ऐसे दलकर
मलते हैं, हाथ रखकर देखो मेरी छातीका धड़कना अब
तक नहीं जाता, नायकाकी सखीका नायकसे उरहना ।
विषमालंकार ॥ २२८ ॥
मैं तोसों कौवाँ कह्यो, तू जिन इन्हें पत्याय ।
लगालगी कर लोयननि, उरमें लाई लाय ॥ २२९॥
हे मन ! मैने तुझसे कईवार कहा तू इनका विश्वास मत
कर आँखोंमें लाग लगाकर निदान छातीमें आग लगाईही
आशय यह कि, बिना उनके जी घबड़ाता है। असंगति २२९
मन न धरति मेरो कह्यो, तू आपने सयान ।
अहै परन परि प्रेमकी, परहथ पारन प्रान ॥ २३०॥
तू अपनी सयानतासे मेरी बात मनमें नहीं रखती, अरी
प्रेमके परनमें पड़के पराये हाथ जी मतडालि, आशय यह
स्वयं प्रेमकर बीचमें दूती मतडालि । वृत्यनुप्रास ॥ २३० ॥

( ८० ) सतसई-सटीक ।
बहक न इहि बहनापते, जब तब वीर निवास ।
बचै न बडी सबीलहू, चील्ह घौंसुआ माँस ॥२३१॥
हेबहन ! इस बहनापनसे मत बहँकै, हे बहन! जब न तब
इसमें विनाश है, कारण कि, बड़ी युक्तिसेभी चील्हके घौंस-
लेमें मांस नहीं बचता अर्थात् बहनचारेमें सुन्दर स्त्री नहीं बच-
सकती । दृष्टान्तालंकार ॥ २३१ ॥
तू रहि सखि हौंही लखौं, चढि न अटावलि बाल ॥
बिनही उगे शशिसमझ, दैहैं अर्घ अकाल २३२॥
हे सखि! तू यहीं रह मैंही देखूँहूँ मैं बलिजाऊं तू अटापर
मत चढै नहीं तो बिनही चन्द्रमा उगे लोक अकालमें तुझे
चन्द्रमा समझ अर्घ्य देने लगेंगे । पर्यायोक्ति ॥ २३२ ॥
दयो अरघ नीचे चलो, संकट भानै जाय ।
सुचितीहै औरै सबै, शशिहि बिलोकै आय २३३॥
अब अर्घ्य देचुकी नीचे चलो ( भोजनकर ) संकट दूर
करैं औरभी सब सुचिती होकर चन्द्रमाको आकर देखें अर्थात्
दो चन्द्रमाका सन्देह जातारहै । संशयालंकार । पूर्ण अपूर्णके
प्रश्नमें चन्द्रमाका उजाला लेना ॥ २३३ ॥
भाववर्णन ।
नाक चढै सीवी करै, जितै छबीली छैल ।
फिरि फिरि भूलि उहैगहै, पिय कँकरीली गैल २३४

तृतीयशतक ३. ( ८१ )
एक समय प्रिया प्रीतम मार्गमें चले तब प्रीतम आप
कँकरी ले मार्गमें चलनेलगे, प्यारीके निमित्त श्रेष्ठमार्ग छोड़ने
लगे जब छैल आप कँकरीले मार्गमें चले, उस समय कंकर
लगी तौ सीवी करती है यह चेष्टा प्रीतमको भली लगी इस का-
रण फिर भूलकर उस कँकरीले मार्गमेंही चलते हैं 'असंगति'॥
लखिलखिअँखियनअधखुलनिअंगमोरिअँगराय
अधिकउठतिलेटतिलटकि, आलसभरीजँभाय ॥
अधखुली आंखोंसे प्रीतमको देख अंगमोड़कर अंगराई
लेती है आधी एक उठ झुककर लेटती है, आलस्यभरी जंभा-
ई लेती है 'स्वभावोक्ति' ॥ २३५ ॥
दोंऊ चाहभरे कछू, चाहत कह्यो करैन ।
नहिजाचकसुनिसूमलों, बाहरनिकसतवैन २३६॥
दोनों प्रीतमप्यारे चाहसे भरे कुछ कहा चाहते हैं, परन्तु
लाज और संकोचसे कुछ नहीं कहते, जिसप्रकार मँगताके
आनेसे मूम बाहर नहीं आता इस प्रकार दोनोंके मुखसे वचन
नहीं निकलते. 'उपमा' ॥ २३६ ॥
उद्दीपनविभाववर्णन ।
उयोशरदराकाशशी, करति न क्यों चित चेत ।
मनो मदनक्षितिपालको, छाँहगीरछविदेत२३७॥

( ८२ ) सतसई-सटीक ।
अरी शरदका पूर्ण चन्द्रमा उदय हुआ मनमें चेत क्यों
नहीं करती, यह चन्द्रमा नहीं मानो कामरूप पृथ्वीपतिका
छत्र शोभित होता है छाँहगीर छत्र 'वस्तूत्प्रेक्षा' ॥ २३७ ॥
अनुभाववर्णन ।
नावकसरसे लायकै, तिलक तरुणि इतताकि ।
पावकझरसी झमककै, गई झरोखे झाँकि ॥ २३८॥
नावकके तीरकी समान तिलक लगाये प्रिया इस ओर
देखकर खिड़कीमें झांककर आगकी लपटसी चमक कर चली
गई, 'छेकानुप्रास' तथा 'उपमा' ॥ २३८ ॥
सुनिपगध्वनिचितई इतै, नहातदियेही पीठि ।
चकीझुकीसकुचीडरी, हँसी लजीली दीठि २३९॥
जो पीठदिये हुए स्नान करती थी, उसने मेरे पांवका शब्द
सुन मेरी ओर देखा, उस समय चौकी निहुराकर सकुची
डरी और लजीली दृष्टिकर हँसी, 'हाव'समुच्चयालंकार २३९॥
सहितसनेहसकोच सुख, स्वेदकंप मुसिक्यानि ॥
प्राण पनिकरिआपने, पानदये मोपानि ॥२४०॥
प्रीतिसकुच और रोमांचके सहित मेरा जी अपने हाथमें
कर अपने पान मेरे हाथमें दिये 'विनिमय' ॥ २४० ॥

तृतीयशतक ३. (८३)
विभ्रमहाववर्णन ।
रही दहैंडी ढिगधरी, भरी मथनियाँ वारि ।
करफेरति उलटीरई, नई विलोवनिहारि ॥२४१॥
दहीकी भरी हँडिया निकट धरी रही, और दही मथनेकी
बड़ी हाँडी पानीसे भर दी, और उलटी रई हाथसे घुमाती है तू
अनोखी विलोनेवाली है, अर्थात् प्रीतमको देख मन ठिकाने
न रहा उस समयकी दशा सखीने कही 'भ्रान्ति' ॥ २४१ ॥
बेसर मोती द्युति झलक, परी ओठपर आय ।
चूनोहोयनचतुरतिय, क्योंपटपोंछ्यौजाय २४२
बेसरके मोतीकी झलक तेरे होठपर आकर पड़ी है हेचतुर!
यहपानका चूना नहीं है कपड़ेसे क्योंकर पोंछा जाय 'भ्रान्त
अपन्हुति' ॥ २४२ ॥
टटकी धोई धोवती, चटकीली मुखजोति ॥
फिरति रसोईकेबगर, जगरमगरद्युतिहोति ॥२४३॥
तुरतकी धोई धोती पहरे चटकीली मुखकी कान्तिसे
रसोईके आंगनमें फिरती हुईके अंगकी शोभा जगर मगर
होती है 'जातिअलंकार' ॥ २४३ ॥
क्षणेकचलतठठकतक्षणेक, भुजप्रीतमगलडारि ।
चढीअटाहंसतिघटा, विज्जुछटासीनारि ॥२४४॥

( ८४ ) सतसई-सटीक ।
एक क्षणको चलती है फिर क्षणमात्रको ठठकती है प्रीत-
मके गलेमें बांहडाले बिजलीकी छटासी वह बाला अटारी
पर चढी घटा देखती है, ‘धर्मलुप्तोपमा’ ॥ २४४ ॥
राधा हरि हरि राधिका, बनिआये संकेत ।
दम्पतिरतिविपरीतसुख, सहजसुरतहूलेत॥२४५॥
राधा कृष्ण बनी और कृष्ण राधा बनकर संकेत (मिला-
पस्थान ) में आये वह दोनों प्रियाप्रीत सहज सुरतमें
ही विपरीत रतिकी सुखलेते हैं, ‘काव्यलिंग.’ इसी शोभाको
मेरे पितृव्य कविवर झब्बीलालने यौं लिखा है कि, पद- यह
जोडी मेरे मनभाई है, गोरेलाल चंद्र सम सोहैं राधेश्याम
अधिकमनमोहैं मानोधटामिलनशशि आईहै ॥१॥ मृदुमुसका
नभरी टौनेकी, भाल बंधी बंदी सोनेकी, सखि दामिनिसी
दमकाई है ॥ २ ॥ शिर मोरन चंद्रिका सुहाई, घटा निरख
बोले मोर आई, जो लालने बंसी बजाई है ॥ ३ ॥ मुक्तमाल
कुचबिच लटकी है । तामें यह शोभा अटकी है । जनु गिरि
बिच नदी बहाई है ॥ ४ ॥ शिर मोतिनकी माँग विराजै ।
ताकी छवि वर्णत कवि लाजै । मनुबक पंक्ति बैठाई है ॥५॥
जबराधे इतउत कहुं डोलैं, नूपुर ऐसी बोली बोलैं । मानो
दादुर झिंगर झरलाई है ॥६॥ बोलत राधे अति प्रिय वानी ।
सों वानी मोहि अति हि सुहानी । मनो कोयल कूक सुनाई

तृतीयशतक ३. ( ८५ )
है ॥ ७ ॥ स्वांतिबूँद पिया दर्शन तेरो । प्रेम सखीको मन
चातक चेरो। तेरे नामकी रटन लगाई है ॥ ८ ॥
चलत घरै घर घरतऊ, घरी न घर ठहराति ।
समुझिउहीघरकोचलै, भूलिउहीघरजाति २४६॥
अपने घरकी कोठरी कोठरीमें घूमती है, तौभी घरमें
घड़ीभर नहीं ठहरती जानकरभी उसी घरको जाती है.
भूलकरभी उसी घरको जातीहै. अथवा समझ उही-परघरकी
उस दुर्नामताको समझकर घरको चलती है और फिर
प्रेमके कारण निन्दाको भूल कृष्णकेही स्थानको चली
आती है 'भ्रांति' ॥ २४६ ॥
नाहिं नहीं नाहींककै, नारि निहोरै लेय ।
छुवतओठविचआँगुरिन,बिरीवदनप्यौँदेय २४७
नहीं नहीं कर प्यारी निहोरैसे लेती है, प्यारे पानकी
बीड़ी देते समय होंठोंको अंगुरियोंसे छू देते हैं 'कुट्टामित
हाव, स्वभावोक्ति' ॥ २४७ ॥
गदराने तन गोरटी, ऐपन आड लिलार ।
हृस्यौँदैअठलायदृग, करै गँवारि सुमार ॥२४८॥
गदराने शरीरकी गोरी बाला माथेपर ऐपनकी आड लगाये

( ८६ ) सतसई-सटीक ।
अठखेलीसे आंखका धक्का दे गँवारी मुझे विद्ध किये देती है
'मदहाव' 'जाति' अलंकार ॥ २४८ ॥
जात मरी बिछुरत घरी, जल सफरीकी रीति ।
क्षणक्षण होत खरी खरी,अरी जरी यह प्रीति २४९
एकघरी भी जलसे बिछुरे तो मरजाती है यह मच्छरीकी
रीति है,परन्तु हे सखी! यह हमारी जली प्रीति तो पलपलमें
अधिक होती है आशय यह,मच्छरी तो मरकर दुःखसे छूटती
है और मैं तो क्षणक्षण अधिक दुःखपाती हूं वा वियोगमें प्रीति
बढती है तपनहाव वर्णन किया ॥ २४९ ॥
द्वैजसुधादीधितिकला, यह लखि दीठि लगाय ।
मनो अकास अगस्तिया,एकै कली लखाय २५०
दोयजके चन्द्रमाकी अमृत भरी कलाको जान दृष्टि
लगाकर देख, जैसे आकाशरूपी अगस्तके वृक्षमें एकही
कली दिखाई दे रही है [ दीधिति चन्द्रमा ] । 'मुग्धाहाव
पर्यायोक्ति और उत्प्रेक्षालंकार' ॥ २५० ॥
मोट्टायितहाववर्णन ।
सकुचिसरकिपिय निकटतें,मुलकिकछुकतनतोरि
करआँचरकी ओटकर,जमुहानी मुख मोरि २५१

तृतीयशतक ३. (८७)
सकुचकर प्रीतमके पाससे सरक मुसकुराकर प्यारीने
अँगडाई ले हाथसे आँचरकी ओटकर मुख मोर जँभाई ली
आशय यह कि, संभोगकी इच्छा की । 'स्वभावोक्ति'२५१॥
बेंदी भाल तंबोल मुख, सीस सिलसिलेवार ।
दृग आँजे राजै खरी, यही सहज शृँगार ॥ २५२ ॥
माथेपर बेंदी, मुखमें पान, शिरके चिकने बाल, आंखोंमें
काजर दिये इस सहज शृंगारसेही अच्छी शोभा पारही है ।
जाति अलंकार, विक्षिप्तहाव ॥ २५२ ॥
बिब्बोकहाव (प्रियांका विलास)
बिधिविधिकै निकरै टरै, नहीं परेहू पान ।
चितै कितै तैंलैं धरयो, इतौ इते तन मान॥२५३॥
भांति भांतिसे प्रीतमने तेरा मान मनाया, पांवभी पड़े
परन्तु नहीं गया, देख तो इतने छोटे शरीरमें इतना बड़ा
मान तैने कहां रखरा है । अधिक ॥ २५३ ॥
ललित हाववर्णन ।
बतरस लालच लालकी, मुरलीधरी लुकाय ।
सौंहकरै भौंहनि हँस, दैन कहै नटि जाय॥२५४॥
बातोंके रसस्वादके लालची लाल की मुरली प्यारीने

( ८८ ) सतसई-सटीक ।
छिपाराखी, सौगंध खाया, भौंहोंमें हँसे देनेको कहै और
फिर मुकर जाती है। पर्याय० स्वभावोक्ति ॥ २५४ ॥
विक्षेपहाव ।
गुडी उडी लखि लालकी, अँगना अँगना मांहि ।
बौरीलों दौरतिफिरै, छुवत छबीली छांहि॥२५५॥
प्रीतमकी गुड्डी ( कनकैया ) उडी देख वह बाला अपने
आँगन २ में बौरीहुईसी दौडती फिरती है और पतंगकी
छांहको छूतीहै। छेकानुप्रास पूर्णोपमा ॥ २५५ ॥
बोधकहाववर्णन ।
लखि गुरुजन बिच कमलसों, सीस छुवायोश्याम
हरिसन्मुख करि आरसी, हिये लगाई वाम२५६
गुरुजनोंके मध्यमें प्यारीको देख कृष्णने कमलको
शिरसे छुवाया, और प्यारीने आरसी कृष्णके सन्मुखकर
हृदयसे लगाई अर्थात् कृष्णने शिरपर कमल धर प्रणाम
किया. प्यारीने आरसी दिखाय हिय लगाय रातमें मिलनेको
कहा। सूक्ष्मालंकार ॥ २५६ ॥
मैंहू जान्यो लोचननि, जुरत बाढिहै जोति ।
कोहो जानत दीठिकों,दीठिकिरकिटीहोति २५७
हे सखी! मैंने जानीही कि आंखोंके मिलतेही आंखोंमें जो-
ति बढैगी,यह मैंने नहीं जाना कि,दृष्टि लगनेसे दृष्टि किरकिटी

तृतीयशतक ३. (८९)
होती है आशय यह कि, देखतेही सात्त्विक हुआ और आं-
सूभर कर दृष्टि किरकिरी होगई । विषमालंकार ॥ २५७ ॥
हरिछवि जल जबतें परे, तबतें क्षणनिवरैन ।
भरत ढरत ऊडत तरत, रहत घरीलों नैन ॥२५८॥
कृष्णकी छविरूप जलमें जबसे पड़ेहैं, तबसे क्षणमा-
त्रको निचिन्त नहीं हैं, भरते हैं, ढरकते हैं, मग्न होते हैं,
तिरते हैं, कटोरेकी घड़ीकी समान नेत्रोंकी दशा है । उप-
मालंकार ॥ २५८ ॥
अलि इन लोयनको कछू, उपजी बडी बलाय ।
नीरभरे नित प्रति रहें, तऊन प्यास बुझाय २५९॥
हे सखी ! इन नेत्रोंको कोई बड़ा रोग उपजाहै, इनमें नित
जल भरा रहता है, तथापि ( प्रीतमदर्शनकी ) प्यास नहीं
जाती, विनादेखे जल भरे, देखनेसे तृष्णा नहीं मिटती । वि-
शेषोक्ति ॥ ५९ ॥
अलि इनलोयनशरनिको, खरो विषम संचार ।
लगे लगाये एकसे, दुहवन करत सुमार ॥ २६० ॥
हे सखी ! इन नैनारूपी बानकी कठिन गति है, यह लगे
लगाये एकसे हैं और लगानेसे दोनोंको मूर्छित करते हैं
असंगति ॥ ६० ॥

(९०) सतसई-सटीक ।
लोभ लगे हरि रूपके, करी सांट जुरिजाय ।
होयनबेचीबीचही, लोयन बडी बलाय ॥ २६१ ॥
सट्टेकी गोष्ठीमें परस्पर मिलकर कृष्णके रूपके लोभमें
लगगये यह मेरे नेत्र बड़ी बलाय हैं, इन्होंने मुझे बीचहीमें
बेच दिया आशय यह कि, प्यारी प्रीतमके पास जातीथी अचा-
नक वे मार्गमें मिलगये तो नेत्र लगजानेसे मन उनके आधीन
होगया इस कारण सखीसे कहा कि, मैं वहाँतक पहुंची भी
नहीं और इन्होंने सट्टाकर प्रीतमका रूप पानकर बदलेमें मुझे
सेतमेत देदिया रूपक ॥ २६१ ॥
नैना नैकन मानहीं, कितौ कह्यो समुझाय ।
तन मन हारेहू हँसे, तिनसों कहा बसाय ॥ २६२ ॥
यह नेत्र मेरी एक नहीं मानते मैंने इन्हे कितनाही सम-
झाकर कहा यह शरीर और मन हारनेसे भी हँसतेहैं इनसे
क्या बसाय । विशेषोक्ति ॥ २६२ ॥
ढरे ढार तेही ढरत, दूजे ढार ढरैन ।
क्याहूं आनन आनसों, नैना लागत नैन ॥ २६३ ॥
हे सखी ! यह जिस ओर ढरगये उसी ओरको ढरगये
दूसरी ओर नहीं ढरते यह हमारी आंखें किसी प्रकार भी

तृतीयशतक ३. (९१)
( आन ) दूसरेके मुखकी ओर लगतीही नहीं ऐसी आसक्त
है । छेकानुप्रास ॥ २६३ ॥
कहत सकल कविकमलसे, मो मत नैन पषान ।
नतरुकुकत इनघिसिलगत,उपजत विरहकृशान॥
सम्पूर्ण कवि नेत्रोंको कमलसे कहतेंहैं परन्तु मेरे मतमें ने-
त्र पत्थर हैं नहीं तो जब यह परस्पर चारहोकर मिलतेहैं तो इ
नकी रगड़से अग्नि क्यों उत्पन्न होतीहै कमलकी रगड़से आग
उत्पन्न नहीं होती । हेतूत्प्रेक्षा ॥ २६४ ॥
साजे मोहन मोहकों, मोही करत कुचैन ।
कहाकरों उलटे परें, टोनै लौने नैन ॥ २६५ ॥
यह मैंने ( अंजन लगाय ) कृष्णके मोहनेको सजाये
परन्तु यह मुझेही मोहित करते हैं क्याकरूं इन नेत्ररूप
जादूगरका जादू उलटा मेरेही ऊपर पड़ा। विषमालं-
कार ॥ २६५ ॥
मोहूसों तजि मोह दृग,चले लागि उहिँगैल ।
क्षणक छाय छविगुर् डरी,छलेछबीले छैल २६६
मेरी आंखें मुझसे भी मोह छोड़ कर उनके पीछे हो उन्हीं-
की राहचलीं छिन एक छविरूपी गुड़की डली छुवायके
छबीले प्रीतमने मेरे नेत्र ठगलिये । रूपक ॥ २६६॥

(९२) सतसई-सटीक ।
नख सिख रूप भरे खरे, तउ मांगत मुसकान ।
तजत न लोचनलालची, ये ललचौहीं वान॥२६७॥
प्रीतमके नखसे सिखापर्यन्तके रूपमें अत्यन्त भर रहे
हैं, तथापि मुसकुरानदेखनेकी इच्छा करते हैं यह लाल-
ची अपने ललचानेका स्वभाव नहीं छोडते। विशेषोक्ति २६७
यश अपयश देखत नहीं, देखात सांवलगात ।
कहाकरौं लालचभरे, चपल नैन चलिजात॥२६८॥
सखी ! यह यश अपयशको तौ नहीं देखते केवल उनके स-
लौने शरीरको देखतेहैं क्या करूं यह लालचभरे चञ्चल नेत्र
उधरही चलजातेहैं अथवा आधेमें सखीने कहा तूं यश अपयश
नहीं देखती केवल सांवले गात देखती है इसपर आगे उत्तर है।
उत्तरालंकार ॥ २६८ ॥
लाज लगा मनमानहीं, नैनामो वसनाहिं ।
यह मुख जोरतुरंगलों, एचतहू चलिजाहिं २६९
यह नेत्र लज्जारूपी लगामको नहीं मानते, मेरे वशमें
नहीं और मुख जोर घोडेकी समान खैंचनेसेभी उसी ओर
चलेजातेहैं । उपमा और रूपक ॥ २६९ ॥
इनदुखिया अँखियानको, सुखसिरजोईनाहिं ।
देखतबनैन देखते, बिनदेखे अकुलाहिं ॥२७०॥

तृतीयशतक ३. (९३)
हे सखी इन दुखिया आँखोंको तो विधाताने सुख बना-
याही नहीं लोकोंके देखते लाजसे देखना नहीं बनता अथवा
देखतेसमय आंसू आनेसे नहीं देखाजाता और बिन देखे
अकुलाती हैं । विशेषोक्ति ॥ २७० ॥
को जानेहैहै कहां, जग उपजी अति आगि ।
मनलागे नैननि लगै, चलै न मगलग लागि २७१॥
सखी कौन जाने क्या होगा जगतमें अधिक आग उपजीहै
यह नेत्रोंमें लगतेही मनमें लगती है तू इसकारण इस (प्रेमकी
आगके ) निकट होकर मत चल । असंगति ॥ २७१ ॥
वनतनको निकसत लसत,हँसत हँसत इतआय ।
दृगखंजनि गहिलैगयो,चितवनिचपलगाय २७२
वनकी ओरको निकलते, शोभित होते हँसते हँसते इधर
आकर अपनी चितवनका चेप लगाकर मेरे नेत्ररूपी खंजन
( ममोले ) को पकड़कर लेगये । रूपकालंकार ॥ २७२ ॥
दृगउरझतटूटतकुटुमजुरतिचतुरसँगप्रीति ।
परतिगांठदुर्जनहिये, दईनई यहरीति ॥ २७३ ॥
नेत्रोंके उलझनेसे कुटुम्ब टूटताहै चतुरके संग प्रीति जु-
ड़ती है शत्रुके मनमें गांठ पड़ती है हे विधाता यह नई रीतिहै।
असंगति ॥ २७३ ॥

( ९४ ) सतसई-सटीक ।
है हिय रहति हईछई, नई युक्ति यह जोड़ ।
आँखिन आँख लगीरहै, देह दूबरी होइ ॥२७४॥
हाय हाय तेरे हृदयमें यह नई रीति छाई रहतीहै आं-
खोंसे आंखें लगी रहतीहैं और शरीर सूखताहै। असंगति २७४
क्योंवसिये क्यों निवजिये नीतिनेह पुरनाहिं ।
लगालगी लोयनकरैं, नाहक मन बँधजाहिं २७५
यहां कैसे वसै और कैसे निवाहहो प्रीति नगरमें न्याय न-
हीं होता लगालगी तौ नेत्र करते हैं, मन वृथा बँधजाता है।
असंगति ॥ २७५ ॥
जात सयान अयान ह्वै, वे ठग काहिठगैन ।
को ललचाय न लालके, लखिललचोहेनैन २७६
वहां सयाना भी अयाना होजाताहै वे नेत्ररूपी ठग किसे
नहीं ठगते, लालके ललचोहे नेत्र देखकर कौन न ललचावै।
व्याजस्तुति ॥ २७६ ॥
डर न टरै नींद न परैं, हरै न काल विपाक ।
क्षणछाकैकैउछकैनफिर, खरोविषमछविछाक २७७
डर दूर नहीं होता, नींद नहीं आती, कालकर्म भोगको हरण
नहीं करता, एकक्षण छककर फिर नहीं उछकता, छबिके मद-