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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

तृतीयशतक ३. (८३)
विभ्रमहाववर्णन ।
रही दहैंडी ढिगधरी, भरी मथनियाँ वारि ।
करफेरति उलटीरई, नई विलोवनिहारि ॥२४१॥
दहीकी भरी हँडिया निकट धरी रही, और दही मथनेकी
बड़ी हाँडी पानीसे भर दी, और उलटी रई हाथसे घुमाती है तू
अनोखी विलोनेवाली है, अर्थात् प्रीतमको देख मन ठिकाने
न रहा उस समयकी दशा सखीने कही 'भ्रान्ति' ॥ २४१ ॥
बेसर मोती द्युति झलक, परी ओठपर आय ।
चूनोहोयनचतुरतिय, क्योंपटपोंछ्यौजाय २४२
बेसरके मोतीकी झलक तेरे होठपर आकर पड़ी है हेचतुर!
यहपानका चूना नहीं है कपड़ेसे क्योंकर पोंछा जाय 'भ्रान्त
अपन्हुति' ॥ २४२ ॥
टटकी धोई धोवती, चटकीली मुखजोति ॥
फिरति रसोईकेबगर, जगरमगरद्युतिहोति ॥२४३॥
तुरतकी धोई धोती पहरे चटकीली मुखकी कान्तिसे
रसोईके आंगनमें फिरती हुईके अंगकी शोभा जगर मगर
होती है 'जातिअलंकार' ॥ २४३ ॥
क्षणेकचलतठठकतक्षणेक, भुजप्रीतमगलडारि ।
चढीअटाहंसतिघटा, विज्जुछटासीनारि ॥२४४॥