बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७६ ) सतसई-सटीक ।
नवोढ़ा बाला हँस हँसकर देखतीहै हर्षकी मदिरासे उमँग-
तीहै उमँग उमँगके बात करतीहै और बढ बढ कर प्रीतमसे
लिपटती जातीहै! जाति अलंकार वा वीप्सा ॥ २१७ ॥
निपट लजीली नवल तिय, बहकि वारुणी सेइ ।
त्यों त्योंअतिमीठी लगे, ज्यों ज्यों दीठीदइ २१८
नवोढा बाला अत्यन्त लजौलीथी मदपान करके बहक-
गई ज्यों ज्यों प्रीतमसे ढिठाई करतीहै त्यों त्यों उसे अच्छी
लगतीहै । जाति अलंकार ॥ २१८ ॥
स्खलितवचनअधखुलितदृग,ललितस्वेदकणजोति
अरुणवदनछबिमदछकी,खरीछबीलीहोति २१९
खिलखिलाकर बातें करती है अधखुले नेत्रहैं सुन्दर प-
सीनेके मोतियोंकी ज्योति चमकती है लाल मुखहै शोभाके
मदसे मतवाली बाला अति शोभित होती है।जाति०॥२१९॥
रूपसुधा आसव छक्यो, आसव पियत बनै न।
प्याले ओठ प्रियावदन, रह्यो लगाये नैन २२०॥
प्यारीके रूपरूपी अमृतसे पेट भरनेके कारण मदपान
नहीं कियाजाता, प्यालेसे होठ लगायेंहैं और नेत्र प्रियाके
मुखकी ओर लग रहेहैं। तुल्ययोगिता ॥ २२० ॥
गली अँधेरी साँकरी, भो भटभेरो आन।