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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

( ७८ ) सतसई-सटीक ।
रुठा रुठा देता हैं, लीलामें लगे प्रीतमको प्रियाका क्रोध
भी रिझाता जाता है।पंचम विभावना विरुद्धते कार्य्य॥२२४॥
दै छिंगुनी पहुँच्यो गिलत, अतिदीनता दिखाय ॥
बलि बामनको ब्योंत सुनि, को बल तुम्हें पत्याय ।
परकीयासे रति मांगते हैं सो वह हँसी करती है अति
दीनता दिखाकर अंगुरी छूकर पहुँचा पकड़तेहो, बलि
और तुम्हारे वामन अवतारकी रीति सुनकर तुम्हारा विश्वास
कौन करै, जैसे छोटेहो बलिसे भूमि मांग फिर सब लेकर
उसे दुःख दिया इसीप्रकार अँगुरी पकड पहुँचेको हाथ
चलाय सर्वस्वं ले यही दशा हमारी करोगे।लोकोक्ति ॥२२५॥
चिरजीवो जोरी जुरै, क्यों न सनेह गँभीर ।
को घटिये वृषभानुजा, वे हलधरके वीर ॥ २२६ ॥
राधाकृष्णकी जोरी चिरकालतक जियो, इनका गंभीर
प्रेम क्यों न हो, इन दोनोंमें कौन घाट है वृषभानुकी बेटी
या बलदेवके भाई । समालंकार [ दोहा-समप्रभाव वर्णन
जहां, दो वस्तुनको होय॥ कहत समालंकार तेहि, जानत यहि
कोइ कोय ] ॥ २२६ ॥
कहा लड़ैते दृगकरै, परे लाल बेहाल ।
कहूँ मुरली कहूँ पीतपट, कहूँ मुकुट वनमाल २२७