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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

तृतीयशतक ३. ( ८१ )
एक समय प्रिया प्रीतम मार्गमें चले तब प्रीतम आप
कँकरी ले मार्गमें चलनेलगे, प्यारीके निमित्त श्रेष्ठमार्ग छोड़ने
लगे जब छैल आप कँकरीले मार्गमें चले, उस समय कंकर
लगी तौ सीवी करती है यह चेष्टा प्रीतमको भली लगी इस का-
रण फिर भूलकर उस कँकरीले मार्गमेंही चलते हैं 'असंगति'॥
लखिलखिअँखियनअधखुलनिअंगमोरिअँगराय
अधिकउठतिलेटतिलटकि, आलसभरीजँभाय ॥
अधखुली आंखोंसे प्रीतमको देख अंगमोड़कर अंगराई
लेती है आधी एक उठ झुककर लेटती है, आलस्यभरी जंभा-
ई लेती है 'स्वभावोक्ति' ॥ २३५ ॥
दोंऊ चाहभरे कछू, चाहत कह्यो करैन ।
नहिजाचकसुनिसूमलों, बाहरनिकसतवैन २३६॥
दोनों प्रीतमप्यारे चाहसे भरे कुछ कहा चाहते हैं, परन्तु
लाज और संकोचसे कुछ नहीं कहते, जिसप्रकार मँगताके
आनेसे मूम बाहर नहीं आता इस प्रकार दोनोंके मुखसे वचन
नहीं निकलते. 'उपमा' ॥ २३६ ॥
उद्दीपनविभाववर्णन ।
उयोशरदराकाशशी, करति न क्यों चित चेत ।
मनो मदनक्षितिपालको, छाँहगीरछविदेत२३७॥