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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 290 में से

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पृष्ठ 133

( ८० ) सतसई-सटीक ।
बहक न इहि बहनापते, जब तब वीर निवास ।
बचै न बडी सबीलहू, चील्ह घौंसुआ माँस ॥२३१॥
हेबहन ! इस बहनापनसे मत बहँकै, हे बहन! जब न तब
इसमें विनाश है, कारण कि, बड़ी युक्तिसेभी चील्हके घौंस-
लेमें मांस नहीं बचता अर्थात् बहनचारेमें सुन्दर स्त्री नहीं बच-
सकती । दृष्टान्तालंकार ॥ २३१ ॥
तू रहि सखि हौंही लखौं, चढि न अटावलि बाल ॥
बिनही उगे शशिसमझ, दैहैं अर्घ अकाल २३२॥
हे सखि! तू यहीं रह मैंही देखूँहूँ मैं बलिजाऊं तू अटापर
मत चढै नहीं तो बिनही चन्द्रमा उगे लोक अकालमें तुझे
चन्द्रमा समझ अर्घ्य देने लगेंगे । पर्यायोक्ति ॥ २३२ ॥
दयो अरघ नीचे चलो, संकट भानै जाय ।
सुचितीहै औरै सबै, शशिहि बिलोकै आय २३३॥
अब अर्घ्य देचुकी नीचे चलो ( भोजनकर ) संकट दूर
करैं औरभी सब सुचिती होकर चन्द्रमाको आकर देखें अर्थात्
दो चन्द्रमाका सन्देह जातारहै । संशयालंकार । पूर्ण अपूर्णके
प्रश्नमें चन्द्रमाका उजाला लेना ॥ २३३ ॥
भाववर्णन ।
नाक चढै सीवी करै, जितै छबीली छैल ।
फिरि फिरि भूलि उहैगहै, पिय कँकरीली गैल २३४