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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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तृतीयशतक ३. ( ७७ )
परे पिछाने परस्पर, दोऊ परस पिछान॥२२१॥
गली अंधेरी और छोटी है वहां दोनोंका भेटभेग हुआ
परस्पर शरीरसे शरीर लगनेसे दोनों जानेगये । उन्मी-
लितालंकार ॥ २२१ ॥
लटकिलटिकिलटकत चलत, डटतमुकुटकीछांहं।
चटकभन्यो नटमिलगयो, अटक भटकवनमांहं॥
झुकझुककर लटकते चलते मुकुटकी छाँहको देखते च-
टकभर छविके भरे नटवर वेष किये कृष्ण अटकने भटकने
वनमें मुझको मिलगये । जातिस्वभावोक्ति॥ २२२ ॥
अहै दहेडी जिन धरै, जिन तू लेइ उतारि ।
नीकैहैं छींको छुवै, ऐसेही रह नारि ॥ २२३ ॥
प्रीतमका प्यारीसे परिहास; अरी दहीकी हांडी मत धरै
और उतारकर मत भूलै, छींका छुएहुए अच्छी लगती है हे
नारि ! ऐसेही रह, आशय यह छींकेपर हांडी रखते प्यारी