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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

तृतीयशतक ३. ( ७५ )
मैंने बहाना करके सोये हुएको निश्चयही सोया जान
कर उनके धोरे जाय मुख चूमा जब वे हँसे तब मैं खिसियानी
होगई उन्होंने मेरा गला पकड़ा तब मैं उनके गलेसे लिपट
गई अर्थात् गलेमें हाथ डाल चुम्बन करना चाहा परन्तु मैं
मुख ऊँचाकर लिपट गई । भ्रान्ति ॥ २१४ ॥
मुँह उघारि प्यौ लखि रहत, रह्योनगो मिस सैन॥
फरके होठ उठे पुलक, गये उघर जुग नैन२१५॥
मुँह उघारकर प्रीतम देख रहेथे तब उससे बहाना करके
सोना न बनपड़ा, होठ फड़क उठे शरीरमें रोमांच होकर
दोनों नेत्र खुलगये । जात्यलंकार ॥ २१५ ॥
दोऊ चोर मिहीचनी, खेलन खेल अघात ।
दुरत हिये लपटायकै,छुवत हिये लपटात २१६॥
नायक और परकीया बाला आंखमिचौली खेलतेहैं परन्तु
खेलसे मन नहीं भरता छातीसे लिपटकर छिपते हैं और छा-
तीसे लिपटकर छूते हैं । विशेषोक्ति ॥ २१६ ॥
मदपानवर्णन ।
हँसि हँसि हेरत नवलतिय, मदके मद उमदाति॥
वैलकिवेलकि बोलतिवचन,ललकिललकि लपटाति॥