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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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तृतीयशतक ३. ( ७२ )
हे लाड़ले ! ऐसे क्या तुमने अपने नेत्र किये हैं जो तुम
बेहाल पड़ेहो कहीं मुरली, कहीं पीला वस्त्र, कहीं मुकुट, कहीं
वनमाला पड़ी है; चलकर तो देख । व्याजस्तुति ॥ २२७ ॥
यों दल मिलियत निरदई, दइ कुसुमसे गात ।
करधर देखो धरधरा, अजौं न उरको जात २२८॥
हे भगवन् ! यह निर्दयी होकर फूलोंसे गातको ऐसे दलकर
मलते हैं, हाथ रखकर देखो मेरी छातीका धड़कना अब
तक नहीं जाता, नायकाकी सखीका नायकसे उरहना ।
विषमालंकार ॥ २२८ ॥
मैं तोसों कौवाँ कह्यो, तू जिन इन्हें पत्याय ।
लगालगी कर लोयननि, उरमें लाई लाय ॥ २२९॥
हे मन ! मैने तुझसे कईवार कहा तू इनका विश्वास मत
कर आँखोंमें लाग लगाकर निदान छातीमें आग लगाईही
आशय यह कि, बिना उनके जी घबड़ाता है। असंगति २२९
मन न धरति मेरो कह्यो, तू आपने सयान ।
अहै परन परि प्रेमकी, परहथ पारन प्रान ॥ २३०॥
तू अपनी सयानतासे मेरी बात मनमें नहीं रखती, अरी
प्रेमके परनमें पड़के पराये हाथ जी मतडालि, आशय यह
स्वयं प्रेमकर बीचमें दूती मतडालि । वृत्यनुप्रास ॥ २३० ॥