बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८२ ) सतसई-सटीक ।
अरी शरदका पूर्ण चन्द्रमा उदय हुआ मनमें चेत क्यों
नहीं करती, यह चन्द्रमा नहीं मानो कामरूप पृथ्वीपतिका
छत्र शोभित होता है छाँहगीर छत्र 'वस्तूत्प्रेक्षा' ॥ २३७ ॥
अनुभाववर्णन ।
नावकसरसे लायकै, तिलक तरुणि इतताकि ।
पावकझरसी झमककै, गई झरोखे झाँकि ॥ २३८॥
नावकके तीरकी समान तिलक लगाये प्रिया इस ओर
देखकर खिड़कीमें झांककर आगकी लपटसी चमक कर चली
गई, 'छेकानुप्रास' तथा 'उपमा' ॥ २३८ ॥
सुनिपगध्वनिचितई इतै, नहातदियेही पीठि ।
चकीझुकीसकुचीडरी, हँसी लजीली दीठि २३९॥
जो पीठदिये हुए स्नान करती थी, उसने मेरे पांवका शब्द
सुन मेरी ओर देखा, उस समय चौकी निहुराकर सकुची
डरी और लजीली दृष्टिकर हँसी, 'हाव'समुच्चयालंकार २३९॥
सहितसनेहसकोच सुख, स्वेदकंप मुसिक्यानि ॥
प्राण पनिकरिआपने, पानदये मोपानि ॥२४०॥
प्रीतिसकुच और रोमांचके सहित मेरा जी अपने हाथमें
कर अपने पान मेरे हाथमें दिये 'विनिमय' ॥ २४० ॥