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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

( ५४ ) सतसई-सटीक ।
विहँसी और आंखें हँसी, मित्रकी प्रीति छिपायेथी सो सखियें
उस समय बैठीथीं इसकारण प्रगट न कहा उपरोक्त चिह्नही
से प्रगट हुई ॥ १४९ ॥
अहै कहै न कहा कह्यो, तोसों नंदकिशोर ।
बडबोली कत होतहै, बड़े दृगनके जोर॥१५०॥
प्यारीके पास कृष्ण आये तब प्यारीने मान किया पीछे
कृष्णको बुलाने भेजा जब सखी आई तब उससे पूछती है
अरी कह तो तुझसे नंदकिशोरने क्या कहा सखी बोली अरी
आंखोंके बलसे बडबोली क्यों होती है, कृष्णको न्यून करके
नंदकिशोर क्यों कहती है । उत्तरालंकार ॥ १५० ॥
यदपि तेज रोहालयर, लगी न पलकौ बार ।
तउ गैंडों घरको भयो, पैंडों कोश हजार १५१
यद्यपि पराक्रमसे प्रीतमका घोडा तेज चलनेवाला है और
आतेमें एक पलभी देर न लगी तोभी गांवका मार्ग आते २
उत्कंठासे सहस्र कोशके समान होगया । विशेषोक्ति॥ १५१॥
नभलाली चाली निशा, चटकाटी धुनि कीन ।
रतिपाली आली अनत, आये वनमालीन १५२
आकाशमें लालीहुई, रात्रि चली, चिडिाएँ और भौंरे बोले
हे आली ! प्रीति कहीं और स्थानमें पाली इससे वनमाली
नहीं आये । वृत्त्यनुप्रास वासकसज्जा वर्णन ॥ १५२ ॥

द्वितीयशतक २. ( ५५ )
झुकिझुकिझपकोंहेंपलक, फिरिफिरिजुरिजमुहाय।
जानिपियागम नींदमिस, दीसबसखीउठाय १५३
झुक २ के पलकें झपकाने लगा वारंवार ऐंडकर जंभाने
लगी पीतमका आगमन जानकर नींदका मिसकर सब
सखी उठादीं। पर्यायोक्ति ॥ १५३ ॥
ज्यों २ आवति निकट निशि, त्यों २ खरी उताल।
झमकि २ टहलें करै, लगी रहचटै बाल॥१५४॥
ज्यों ज्यों रात्रि आतीहै तैसे २ बड़ी उतावलीसे सब
टहल करती है कारण कि, मनोरथका चसका लगा हुआ है।
स्वभावोक्ति । रहचट-सोनेकी चाट ॥ १५४ ॥
फूली फाली फूलसी, फिरति जो विमल विकास ।
भोर तरैयां होहि ते, चलत तोहि पिय पास १५५॥
जोकि ( विमल विकास ) उज्ज्वल ज्योतिसे तेरी सौति
फूली हुई फूलसी फिरती हैं सो तुझे पीतमके पास चलने
देखकर भोरके तारोंके समना क्षीणकान्ति होजायँगी । उपमेय
लुप्ता और वाचकलुप्ता ॥ १५५ ॥
उठि ठक २ ए तो कहा, पावसके अनुमार्ग ।
जानपरेंगी देखियों, दामिनि घन अँधियार १५६

( ५६ ) सतसई-सटीक ।
उठ वर्षाके समय नायकके पास चलनेमें इतनी अडचड़
क्यों है, वहां ऐसी विदित होगी कि, मानो बिजली बादलको
लिये अंधकारमें हैं। भ्रांतालंकार ॥ १५६ ॥
गोप अथाइनितै उठे, गोरज छाई गैल ।
चलिबलिअलिअभिसारिके, भलीसँजोखेसैल ॥
गोप चौबारों से उठे और गायके चरणोंसे उठकर धूलि
पंथमें छाई हे आली ! मैं बलिहारी जाऊं प्रीतमके पास चल,
हे सखी ! अभिसारिकाकी संध्या समय भली सैल है। काव्य-
लिंग ॥ १५७ ॥
छप्योछपाकरछितछयो, तमशशिहरन सँभारि ।
हँसति हँसति चल शशिमुखी,मुखतेआंचरटारि॥
शुक्ला अभिसारिकाको बाटमें जाते चंद्रमा छिपा, इसपर
सखी बोली, छपाकर(चंद्र) छिपा भूमिपर अंधकार छाया, तू
सकुचावे मत, अपनेको सँभालकर चन्द्रका अस्त सँभाल,
हे चन्द्रमुखी ! मुखपरसे घूँघटको हटाकर तू हँसती २ चल
अर्थात् हँसनेसे मुखपरसे घूँघट हटनेसे चाँदनी होगी।काव्य-
लिंगअलंकार ॥ १५८ ॥
सघन कुंज घन घन तिमिर,अधिकअँधेरीराति।
तऊ न दुरिहैश्यामयह,दीप शिखासीजाति १५९

द्वितीयशतक २. ( ५७ )
घनाकुंज है बहुतसे मेघोंका अँधेरा है महाकाली अँधेरी
रात है, हे कृष्ण ! तोभी यह बाला जाती हुई दीपशिखाके
समान नहीं छिपैगी । विशेषोक्ति लुप्तोपमेयसंकर ॥ १५९ ॥
युवति जौन्हमें मिलगई, नैक न होति लखाइ ।
सौंधेके डोरेलगी, अली चली सँगजाइ ॥१६०॥
वह बाला चाँदनीमें मिलगई किंचित् भी नहीं दिखाई
देती सुगंधकी डोरसे लगी सखी बालाके संग चली जाती है।
उन्मीलितालंकार । सुगंधिसे ज्ञान हुआ गौरतासे नहीं १६०॥
निशि अँधियारी नील पट, पहरिचली पियगेह ।
कहो दुराई क्यों दुरै, दीपशिखासी देह ॥१६१॥
अँधेरी रात है नीलपट पहरकर पियाके घर चली [गर्वि-
ताबोली] कहो इसपरभी यह दीपकी शिखासीदेह छिपायेसे
अबभी कैसे छिपेगी । विशेषोक्ति उत्तरालंकार ॥ १६१ ॥
अरी खरी सटपट परी, विधु आधे मग हेरि ।
संगलगे मधुपन लई, भागि न गली अँधेरि १६२
हे सखी ! आधे मार्गमें चन्द्रमाको देखकर मुझे बहुत
व्याकुलता हुई भौंरोंके संग लगनेपर भाग्यहीसे अँधेरी गली
पाई अर्थात् गली अँधेरेमें जाकर भौंरोंसे छुटी । प्रहर्ष-
णालंकार [दोहा-कार्यसिद्ध हो बिन यतन, मनमें हर्ष अपार॥

( ५८ ) सतसई-सटीक ।
ताहि प्रहर्षण कवि कहै, गुणियनको आधार ॥ १६२ ॥
दंपतिदिवाभिसार वर्णन ॥
मिसही मिस आतप दुसह, दई और बहकाय ।
चले ललनमनभावतिहिं,तनुकीछाँहछिपाय १६३
बहानेही बहाने कठिन धूप करदी औरोंको टालदिया
प्रीतमप्यारीको शरीरकी छाँहमें छिपाकर लेचले, आशय यह
किं, परकीया बाला है उसकी कांति छिपानेको वस्त्र उढ़ाय
लेचले। पर्यायोक्ति ॥ १६३ ॥
दम्पतिनिशाभिसारवर्णन ।
मिलि परछाहीं जौन्हसों, रहे दुहुँनके गात ।
हरि राधा इक संगही, चले गलीमें जात ॥ १६४ ॥
जैसे परछाईं चाँदनीमें मिलीहो, इस प्रकार प्रीतम और
प्यारीके शरीर मिले हैं श्रीकृष्ण और राधिका इसप्रकार एक
साथही मिले गलीमें चलेजाते हैं। मिलितालंकार॥१६४॥
स्वकीया खण्डिता ।
पलनि पीक अंजन अधर, धरे महावर भाल ।
आज मिले सुभली करी, भले बनेहो लाल १६५
पलकोंमें पीक, होठोंमें अंजन, माथेपर महावर, लगायेहो
आज मिले सो अच्छी करी, हे कृष्ण ! भले बनेहो धीराधीरा
दूसरा । असंगति अलंकार ॥ १६५ ॥

द्वितीयशतक २. ( ५९ )
मरकत भाजन सलिलगत, इन्दुकलाके वेप ।
झीन झगामें झलमलै, श्यामगात नख रेप १६६
नीलमणिका पात्र जैसे पानीमें पड़ाहो और उसमें चन्द्र-
माकी कलाका प्रतिबिम्ब हो, इसप्रकार पतले झगे (जामे )
में श्याम शरीरके बीच नखकी रेखा चमकतीहै । लुप्तवस्तु-
त्प्रेक्षा ॥ १६६ ॥
वैसी यह जानी परत, झगा ऊजरे माँहिं ।
मृगनैनी लपटी जु हिय, वेणी उपटी बाँहिं । १६७
यह ऊजरे जामेमें वैसीही जानीजातीहै, मृगनैनी जो
हृदयसे लिपटी सो उसकी चोटी बांहमें उपड़आईहै । अनुमा-
नालंकार ॥ १६७ ॥
कत बेकाज चलाइयत, चतुराईकी चाल ।
कहैदेत गुण रावर, सब गुण निर्गुण माल ॥ १६८॥
विनाकाज चतुराईकी रीति क्यों चलानेहो, यह विना
डोरेकी मालाही आपके सब गुण प्रगट कियेदेतीहै, हृदयपर
मालाका चिह्न जो पड़ाहै सो रतिको प्रगट करताहै । विरो-
धाभास ॥ १६८ ॥
तुरत सुरत कैसे दुरत, मूरत नैन जुरि दीठि ।
डाडा दै गुण रावर, कहै कनौडी डीठि ॥ १६९॥

( ६० ) सतसई-सटीक ।
हेप्रीतम ! तुरतका मैथुन किसप्रकार छिपसकताहै, दृष्टि
मिल कर तुम्हारे नेत्र मुरतेहैं, और कनौड़ी दृष्टिही यह तु-
म्हारे दोष ढंढोरा देकर कथन करताह । वृत्यनुप्रासलो-
कोक्ति ॥ १६९ ॥
पावकसों नैननि लग्यो, जावक लाग्यो भाल ।
मुकर होहुगे नकम,मुकुर विलोको लाल ॥१७०॥
आँखोंमें आगसी लगीहै, माथेमें जो महावर लगाहै, थोड़ी
देरमें मुकर जाओगे,इसकारण हेलाल ! तनक दर्पणमें अपना
मुख तो देखो । पूर्णोपमा जमकलाटानुप्रास ॥ १७० ॥
प्राणप्रिया हियमें बसै, नखरेखा शशि भाल ।
भलो दिखायो आन यह, हरिहररूपरसाल १७१
प्राणप्यारी तुम्हारे हृदयमें निवास करतीहै, जैसे विष्णुके
हृदयमें लक्ष्मी, नखकी लकीर शिरपर है जैसे शिवके माथे
पर चन्द्रमा, यह अपना रसाल शिव और विष्णुका भलारूप
दिखाया । रूपकालंकार ॥ १७१ ॥
नखरेखा सोहै नई, अरु सोहै सब गात ।
सौहैं होत न नैन यह, तुम सौहैं कत खात १७२
नवीन नखप्रहारकी रेखा शोभा पातीहै, सब शरीर
आलस्य भरैहैं, और यह नेत्र सामने नहीं होतें फिर तुम सौ-
गन्ध क्यों खातेहो । जमकालंकार ॥ १७२ ॥

द्वितीयशतक २. (६१)
पल सोहैं पग पीकरँग,छल सो हैं सब वैन ।
बल सोहैं कत कीजियत, यह अलसोहैं नैन १७३
पीकके रंगसे पगी पलकें शोभित होतीहैं, और छलसे
तुम्हारी सब बातें शोभितहैं, वलसे सन्मुख यह आलस्य
भरी आँखें क्यों करतेहो । वृत्यनुप्रास ॥ १७३ ॥
पटसों पोंछ परी करो, खरी भयानक वेषि ।
नागनि ह्वै लागति दृगनि, नागवेलिरँगरेषि १७४
वस्त्रसे पोंछकर दूर करो यह तुम्हारा बहुत भयानक
वेषहै, यह तुम्हारी आँखोंमें लगी हुई पानकी रेख मेरी
आँखोंको सांपन होकर काटती है। लुप्तोत्प्रेक्षालंकार॥१७४॥
जिहि भामिनि भूषण रच्यो,चरण महाउर भाल।
उही मनो अँखियां रंगी,ओठनिके रँगलाल १७५
जिस प्रियाने शृंगार बनाय अपने पाँवका महावर तुम्हारे
माथेमें लगाई,उसीने अपने होठोंके रंगसे मानो तुम्हारी आंखें
रंगीहैं, आशय यह कि, उसने मान किया तुम पांव पडे इससे
माथेमें महावर लगगया और रतिमें जागे इससे नेत्र लालहैं ।
वस्तूत्प्रेक्षा असंगति ॥ १७५ ॥
गडेवडेछविछाकिछकि, छिगुनी छोर छुटै न ॥
रहे सुरँगरँग रंगि उही,नहदी महँदी नैन ॥१७६॥

( ६२ ) सतसई-सटीक ।
बड़े छबिके नसेके छककर अर्थात् उसकी सुन्दरताके
मदमें मतवारे होकर कन अंगुरीके छोर गडे छुटते नहीं उसी
नखमें लगाई हुई महँदीसे नेत्र लाल रंगसे रँगरहेहैं। नह-नाखून।
सुरंग-लाल रंग । व्याजोक्ति ॥ १७६ ॥
बेई गड गाडैं परी, उपड्यो हार हिये न ।
आन्यो मोरि मतंग मनु, मार गुरेरनि मैन १७७॥
नायकके आगमनमें सखी वेई गढके गढे पड़ेहैं मोतियोंका
हार छातीमें नहीं उमड़ाहै, मानो कामदेव हाथीको गुलेलोंसे
मारकर फेर लायाहै उसके चिह्न हैं । असिद्धास्पदउत्प्रेक्षा ।
अथवा खण्डिता प्रीतमके हृदयपर परकीया विहारका हार
चिह्न देख यह वचन बोली ॥ १७७ ॥
ह्या न चलै बलि रावरी, चतुराईकी चाल ।
सनख हिये क्षण क्षण नटत,अनख बढावत लाल॥
हे लाल ! यहां आपकी चतुराईकी चाल नहीं चलेगी यह
छातीपर नखके चिह्न लगेहुए छिपाकर मेरा क्रोध क्यों बढ़ा-
तेहो । विरोधाभास ॥ १७८ ॥
कत कहियत दुख देनको,रच रच वचन अलीक ।
सबै कहा उरहै लखै, लाल महाउर लीक॥ १७९॥
हे प्रीतम ! झूठी बातें बनाकर दुःख देनेको क्यों कहतेहो

द्वितीयाशतक २. ( ६३ )
सबक्या तुम्हारा मनहैं, जो तुम्हारे माथेमें लगी महावर
की लीक देखेंगी इससे विदितहै कि, मानिनीके पांव पड़
रति करके आयेहो। छेकानुप्रास अलंकार ॥१७९॥
तरुण कोकनद वरुण वर, भये अरुण निशिजागि
वाहीके अनुराग दृग, रहे मनो अनुरागि ॥१८०॥
यह नेत्र रात्रिमें जागकर लाल कमलके रंगके समान
रक्तवर्ण होगयेहैं, मानो उसीके अनुरागमें रँग गयेहैं । उ-
क्तास्पद ॥ १८० ॥
न कर न डर सब जग कहत, कत बेकाज लजात ।
सौंहैं कीजे नैन जो, साँचौ सौंहैं खात ॥१८१॥
विना करे मत डरो ऐसा सब जगत कहता है, फिर तुम
बेकाज क्यों लजातेहो, जो सच्ची सौगंध खातेहो तो नेत्र स-
न्मुख करो। यमक ॥ १८१ ॥
लालन लहि पाये दुरै, चोरी सौंह किएँ न ।
शीशचढे पनिहा प्रगट, कहैं पुकारे नैन ॥१८२॥
रात्रिको प्यारे और कहीं जागे इस पर प्यारी बोली हेलाल!
मैने जानलिया सौगंध खायेसे तुम्हारी चोरी नहीं छिपेगी
शिरपर चढे चोरीकी पाग लगानेवाले तुम्हारे नेत्र इस
बातको प्रगट कहतेहैं आँखें लाल हैं। काव्यलिंग ॥ १८२ ॥

( ६४ ) सतसई-सटीक ।
रह्यो चकित चहुँघा चितै, चित मेरो मति भूलि ।
सूर उदय आये रही, दृगनि साँझसी फूलि १८३
मेरा मन मति भूलकर चारों ओर चकित होरहा सूर्य
के उदयमें तुम आयेहो परन्तु तुम्हारी आँखोंमें साँझसी
फूलरही है, अर्थात् लालहैं। तृतीय विभावना धर्मलुप्ता-
लंकार ॥ १८३ ॥
आप दियो मन फेरिलै, पलटै दीनी पीठि ।
कौन चाल यह रावरी, लाल लुकावत दीठि १८४
तुमने जो आप मन दिया सो फेरकर उसके बदले मुझे
पीठदी, हे कृष्ण ! यह आपका कौन रीति है जो अब दृष्टि
छिपाते हो, विनिमया ( बदला करना ) लंकार ॥ १८४ ॥
मोहिं दियो मेरो भयो, रहत जु मिलि जिय साथ ।
सो मन बाँधन दीजिये, पिय सौतिनिके हाथ १८५
मन आपने मुझे दिया सो मेरा हुआ, मेरे जीके साथ मि-
लकर रहता है, हे प्रीतम ! यह मन बाँध कर सौतोंके हाथ न
सौंपिये । काव्यलिंग ॥ १८५ ॥
मध्या धीरावर्णन ।
लन सलोने अरु रहे, अति सनेहसों पागि ।
नक कचाई देत दुख, सूरनलों मुखलागि ॥ १८६ ॥

द्वितीयशतक २. ( ६५ )
हे कृष्ण! एक तो आप सलोने हो और अतिसनेहसों पगे हो
परन्तु तुम्हारी यह थोड़ी कचाई दुःख देती है जो आप झूठ बो-
लतेहो, अथवा जैसे सूरन (जिमींकंद) मुख लगके दुःख देता
है तैसे तुम दुःख देतेहो। पूर्णोपमाश्लेष ॥ १८६ ॥
आज कछू औरै भये, ठये नये ठिक ठैन।
चितके हितके चुगल ये, नितके होय न नैन ॥ १८७
आज कुछ औरही नई ठीक ठाने हुए हैं, वा नये उत्स-
बसे ठने कुछ औरही हैं परन्तु ठहरते नहीं हैं मनकी प्रीतिके
चुगल यह तुम्हारे नयन सदाके से न होंय अर्थात् आज तुम्हारे
नेत्र चंचल हैं इससे तुम्हारा भेद जानलिया। भेद कातिशयो-
क्ति वृत्त्यलंकार ॥ १८७ ॥
अनत बसे निशिकारिसनि, उर वर रह्यो विशेषि।
तऊ लाज आई झुकत, खरे लजौंहै देखि ॥ १८८ ॥
रात्रिमें प्रीतम और स्थानमें बसे, इसकारण हृदय विक्षे-
[L16

( ६६ ) सतसई-सटीक ।
खेल है, हे लाल ! और और स्थानोंसे प्रीतिको नित्य क्यों
सकुचाते हो, अर्थात् इन बातोंमें लोक कहेंगे प्यारी प्यारेसे
प्रीति नहीं करती, इसकारण ठौर ठौर अटकते फिरते हैं ।
लोकोक्ति अलंकार ॥ १८९॥
कत सकुचत निधरक फिरो, रतियों खोरि तुम्हेंन ।
कहा करौं जो जा हिये, लगे लगोहे नैन ॥१९०॥
सकुचाते काहेको हो निधरक फिरो हो तुम्हें रत्तीभर दोष
नहीं है, इसमें तुम्हारा क्या वश है जो यह लगोहे नयन जाकर
लगजाते हैं । व्याजस्तुति यथा [दोहा-मुखपर स्तुतिसी लगे,
अरु खलु निन्दा होय । इमि वचरचनाको कहें, व्याजस्तुति
सबकोय ] ॥ १९० ॥
तेह तरेंयौ त्यौरकरि, कत करियत दृग लोल ।
लीकनहींयहपीककी, श्रुतिमणिझलककपोल ॥
क्रोधसे डरावना मुखकर नेत्र क्यों चंचल करतेहो यह
लकी

द्वितीयशतक २. ( ६७ )
जिहि चंपकबरनी किये, गुल्लाला रँग नैन १९२॥
मेरे गलेसे क्यों लपटते हो, मैं वह नहीं जिसने रातको
तुम्हारे साथ सेजपर शयन किया और जिस चंपकवरनीने
जगाकर फूल लालके रंगके समान तुम्हारी आंखेंकीं । मोगरे
सोनजुही चंपा गुल्लाला यह पद श्लेषहै। श्लेषालंकार ॥ १९२॥
प्रौढाधीरावर्णन ।
मैं तपाय त्रयतापसों, राख्यो हियो हम्माम ॥
मति कवहूं आये इहां, पुलकपसीजहि श्याम १९३
मैंने तीनतापसे तपाकर अपना हिया हम्माम कररक्खाहै;
जो कभी आवेंगे तो श्रीकृष्ण रोमांच होकर पसीजेंगे,
आशय यह कि, कृपाकर मेरे मनके संताप दूर करेंगे,
अधिदैविक-देवताओंसे होनेवाले ताप। अधिभौतिक लोक-
कृत । अध्यात्मिक-आत्मासे होनेवाला यह मैंने तीन ताप-
का महादुःख पायाहै, कृष्ण उद्धार करेंगे हम्माम गरम
पानीका कुण्डसा होताहै, उसमें स्नान करते हैं । रूपका-
लंकार ॥ १९३ ॥
जो तिय तुम मनभावती, राखौ हिये बसाय ।
मोहिं खिझावति दृगनिहै, वहई उझकति आय १९४
हृदयमें अपना प्रतिबिम्ब देख प्रीतमसें प्यारी बोली

( ६८ ) सतसई-सटीक ।
तुम्हारे मनमें जो भावतीहै वही तुमने हृदयमें बसारक्खी है,
मुझे खिजाती है और तुम्हारी आंखोंमें होकर मुझे झाँकती
है । लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ १९४ ॥
प्रौढाअधीरा वर्णन ।
सदन सदनके फिरनकी, सदन छुटै हरिराय ।
रुचै तितै विहरतफिरो, कतविहरतउरआय १९५
हे कृष्ण ! घर घर फिरनेकी तुम्हारी बान नहीं छुटती
अच्छा जहां तुम्हारी इच्छाहो वहां विहरते- फिरो, मेरे हृद-
यमें क्यों विहरते हो अथवा आनकर मेरी छाती क्यों चीरते
हो । लाटानुप्रासजमकालंकार ॥ १९५॥
सुभर भयौ तुव गुणकणनि, पचयोकुबतकुचाल।
क्योंधौं दाऱ्यो लौहियो, दरकतनहिंनँदलाल १९६
हे नंदलाल ! तुम्हारे गुणोंके सूखे धानसे भलीप्रकार
भराहुआ तुम्हारी बुरीबात और कुचालसे पकाहुआ मेरा हृदय
अनार की भाँति क्यों नहीं फटता । पूर्णोपमा ॥ १९६ ॥
केसर केसर कुसुमके, रहे अंग लपटाय ।
लगेजाननखअनखली, कतबोलत अनखाय १९७
केसरके फूलके तन्तु अंगमें लिपट रहेहैं त और बालाके

द्वितीयशतक २. ( ६९ )
नख जानकर प्रीतमसे अनखाकर क्यों बोलती है ।
व्याजोक्ति ॥ १९७ ॥
प्रौढाधीरा ।
रसकेसे मुख शशिमुखी, हँसि हँसि बोलति वैन ।
गूढमान मन क्यों रहे, भये वूढ रँग नैन ॥ १९८ ॥
हे चन्द्रमुखी! तू हँस हँसकर रसकेसे त्योरके वचन बोल-
ती है, पर छिपाहुआ मान मनमें कैसे रहसकता है, तेरे
नेत्रही वीरबहूटीकेसे रंगके होरहे हैं । काव्यलिंगलुप्ता-
वाचक ॥ १९८ ॥
मोहूसों बातन लगे, लगी जीभ जेहि भाय ।
सोई लेउर लाइये, लाल लागियत पाय ॥ १९९ ॥
प्रीतमको मनाते समय प्यारीके सन्मुख उसका नाम नि-
कलगया जिसके कारण यह रूठीथी तब वह बोली मुझसेभी
बातें करते तुम्हारी जीभ जिस नायकांस लगी उसीको
ले हृदयसे लगाओ, हे कृष्ण ! मैं तुम्हारे पांव पड़तीहूं मुझे
छोड़ो । काव्यलिंग ॥ १९९ ॥
गहकि गाँस औरै गहे, रहे अधकहे वैन ।
देखि खिसौंहें पिय नयन, किये रिसौंहें नैन २००
सखीका वचन सखीसे, उमँगकर औरही आशय लिये

( ७० ) सतसई-सटीक ।
बातें करतींथीं सो वह अधकही बातें रहीं, प्रीतमके खिसौने
नयन देखकर प्यारीने रिसभरी आंखें करी अर्थात् आंखोंसे
जानलिया कि, यह और कहीं आसक्त है। भेदकाति-
शयोक्ति ॥ २०० ॥
इति श्रीकविविहारीदासकी सतसईमें पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृत
दूसरा शतक पूर्ण हुआ ॥ २ ॥
उत्तमा खण्डिता ।
वाहीकी चित चटपटी, धरत अटपटे पाय।
लपट बुझावत विरहकी, कपटभरेहू आय॥२०१॥
उसीके मिलनेकी मनमें चटपटी है, इस कारण अटपटे
पांव धरतेहो, इसप्रकार कपटभरेभी आकर तुम मेरे विरहकी
तपत बुझातेहो। पंचम विभावना ॥ २०१ ॥
दक्षन पिय ह्वै वाम वश, बिसराई तिय आन।
एकै वासरके विरह, लागे बरष बितान ॥२०२॥
हे चतुर पिय ! तुमने एक स्त्रीके वशीभूतहो और स्त्रियों
को भुलादिया, हमें तो एकही दिनका विरह वर्षदिनके समान
बीतनैलगा अथवा हे पिय ! तुम हमारे दहिने नहीं वामहो
काव्यलिंग ॥ २०२ ॥

तृतीयशतक ३. ( ७१ )
मध्यमा वर्णन ।
बालमवारे सौतिके, सुन परनारि विहारि ।
भो रस अनरस रँगरली, रीझ खीझ इक बारि ॥२०३॥
नायकने सौतकी वारीमें परनारीके यहां जाकर भोग
किया, यह सुनकर रस और अनरस अर्थात् सुख और दुःख
हुआ अर्थात् इस रंगमें मिलकर रीझीभी और खीझीभी सुख
तो इस बातका कि, सौतकी वारी टलकर उसको दुःख
हुआ, और अनरस यह कि, मेरे पास न आकर औरके पास
गये, रीझी इसबातपर कि, मेरी वारी नहीं टाली, खीझी इस-
पर कि, कहूं मेरे संग ऐसा न करें यह प्रकृति बुरी है ।
दीपकालंकार ॥ २०३ ॥
अधमा वर्णन ।
मुँह मिठास दृग चीकने, भौंह सरल सुभाय ।
तऊ खरे आदर खरो, क्षण २ हियो सकाय ॥२०४॥
मुखपर मीठापन चिकने नेत्र, सरल स्वभावकी भृकुटी
हैं तोभी प्यारीके अति आदरसे क्षण२में हृदय डरता है अ-
र्थात् ऐसा न हो कि, कहीं क्रोध कर उठै अर्थात् ज्यों २ वह
मीठी २ बातें करती है त्यों त्यों मन डरताहै । पंचम विभा-
वना ॥ २०४ ॥

( ७२ ) सतसई-सटीक ।
रही पकर पाटी सुरिस, भरे भौंह चित नैन ।
लखि सपने पिय आन रति,जगतहु लगति हियै न
क्रोधभरी भौंह नेत्र,और चित्तसे खाटकी पट्टी पकडे रही
स्वप्नमें प्रीतमको अन्य नारीके साथ सम्भोग करता देखकर
जागकरभी प्रीतमको हृदयसे नहीं लगाती । भ्रान्त्यलं-
कार ॥ २०५ ॥
इति नायक नायका वर्णनं नाम प्रथमं प्रकरणं समाप्तम् ।
अथ संयोगशृंगारवर्णन ।
अँगुरिनु उचि भरु भीतदै,उलमि चितै चखलोल।
रुचिसों दुहुँ दुहूँनके, चूमे चारु कपोल ॥२०६॥
पाँवकी अँगुरियोंसे उचक भीतपर बोझ देकर लटककर
चञ्चल आंखोंसे चारों ओर देख परमप्रीतिसे दोनोंने दोनोंके
सुन्दर कपोल चूमे । जात्यलंकार ॥ २०६ ॥
विपरीतरतिवर्णने ।
पर्यो जोर विपरीत रति, रुपी सुरत रणधीर ॥
करति कुलाहल किंकिणी, गह्यो मौन मंजीर २०७
विपरीत रतिका भार पडनेसे प्यारी संभोगरूपी युद्धमें
धीरहो डटगई उस समय तगडीके घुंघरू शब्द करनेलगे और
पैरके भूषण नूपुरने मौनता गही। जाति वा समासोक्ति २०७

तृतीयशतक ३. ( ७३ )
नीठि नीठि उठि बैठिहू, पिय प्यारी परभात।
दोऊ नींदभरे खरे, गरे लागि गिरजात॥२०८॥
नीठि २ उठ बैठकर प्रातःकालमें प्रीतम और प्यारी नींद
में भरे खरे गले लगकर गिरपडंत हैं । स्वभावोक्ति । नीठ
नीठ-इच्छाकरके ॥ २०८ ॥
विनती रति विपरीतकी, करी परशि पिय पाय।
हँसि अनबोलेही दियो, उत्तर दियो बताय २०९॥
प्यारीके चरण छूकर प्रीतमने विपरीत रति करनेकी प्रार्थना
की प्यारीने विना बोलेही उत्तर दिया सो मैने तुम्हें बताया
आशय यह न बोलनाही अंगीकार है । विभावनापंचम २०९
रमणकह्योहँसिरमणिसों, रतिविपरीतविलास ।
चितईफिरलोचनसतर,सगरवसल्लजसहास २१०
प्रीतमने हँसकर प्यारीसे विपरीत रतिके विलास करनेको
कहा तब रूखी आँखोंकर लाज और क्रोध सहित प्यारीने
देखा । हावस्वभावोक्ति ॥ २१० ॥
प्रेमकेलि ।
प्रीतम दृग मिहिंचति प्रिया, पाणि परश सुखपाय।
जान पिछान अजानलौं, नेक न होति जनाय २११