बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयशतक ३. ( ७३ )
नीठि नीठि उठि बैठिहू, पिय प्यारी परभात।
दोऊ नींदभरे खरे, गरे लागि गिरजात॥२०८॥
नीठि २ उठ बैठकर प्रातःकालमें प्रीतम और प्यारी नींद
में भरे खरे गले लगकर गिरपडंत हैं । स्वभावोक्ति । नीठ
नीठ-इच्छाकरके ॥ २०८ ॥
विनती रति विपरीतकी, करी परशि पिय पाय।
हँसि अनबोलेही दियो, उत्तर दियो बताय २०९॥
प्यारीके चरण छूकर प्रीतमने विपरीत रति करनेकी प्रार्थना
की प्यारीने विना बोलेही उत्तर दिया सो मैने तुम्हें बताया
आशय यह न बोलनाही अंगीकार है । विभावनापंचम २०९
रमणकह्योहँसिरमणिसों, रतिविपरीतविलास ।
चितईफिरलोचनसतर,सगरवसल्लजसहास २१०
प्रीतमने हँसकर प्यारीसे विपरीत रतिके विलास करनेको
कहा तब रूखी आँखोंकर लाज और क्रोध सहित प्यारीने
देखा । हावस्वभावोक्ति ॥ २१० ॥
प्रेमकेलि ।
प्रीतम दृग मिहिंचति प्रिया, पाणि परश सुखपाय।
जान पिछान अजानलौं, नेक न होति जनाय २११