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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

द्वितीयाशतक २. ( ६३ )
सबक्या तुम्हारा मनहैं, जो तुम्हारे माथेमें लगी महावर
की लीक देखेंगी इससे विदितहै कि, मानिनीके पांव पड़
रति करके आयेहो। छेकानुप्रास अलंकार ॥१७९॥
तरुण कोकनद वरुण वर, भये अरुण निशिजागि
वाहीके अनुराग दृग, रहे मनो अनुरागि ॥१८०॥
यह नेत्र रात्रिमें जागकर लाल कमलके रंगके समान
रक्तवर्ण होगयेहैं, मानो उसीके अनुरागमें रँग गयेहैं । उ-
क्तास्पद ॥ १८० ॥
न कर न डर सब जग कहत, कत बेकाज लजात ।
सौंहैं कीजे नैन जो, साँचौ सौंहैं खात ॥१८१॥
विना करे मत डरो ऐसा सब जगत कहता है, फिर तुम
बेकाज क्यों लजातेहो, जो सच्ची सौगंध खातेहो तो नेत्र स-
न्मुख करो। यमक ॥ १८१ ॥
लालन लहि पाये दुरै, चोरी सौंह किएँ न ।
शीशचढे पनिहा प्रगट, कहैं पुकारे नैन ॥१८२॥
रात्रिको प्यारे और कहीं जागे इस पर प्यारी बोली हेलाल!
मैने जानलिया सौगंध खायेसे तुम्हारी चोरी नहीं छिपेगी
शिरपर चढे चोरीकी पाग लगानेवाले तुम्हारे नेत्र इस
बातको प्रगट कहतेहैं आँखें लाल हैं। काव्यलिंग ॥ १८२ ॥