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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

द्वितीयशतक २. ( ६७ )
जिहि चंपकबरनी किये, गुल्लाला रँग नैन १९२॥
मेरे गलेसे क्यों लपटते हो, मैं वह नहीं जिसने रातको
तुम्हारे साथ सेजपर शयन किया और जिस चंपकवरनीने
जगाकर फूल लालके रंगके समान तुम्हारी आंखेंकीं । मोगरे
सोनजुही चंपा गुल्लाला यह पद श्लेषहै। श्लेषालंकार ॥ १९२॥
प्रौढाधीरावर्णन ।
मैं तपाय त्रयतापसों, राख्यो हियो हम्माम ॥
मति कवहूं आये इहां, पुलकपसीजहि श्याम १९३
मैंने तीनतापसे तपाकर अपना हिया हम्माम कररक्खाहै;
जो कभी आवेंगे तो श्रीकृष्ण रोमांच होकर पसीजेंगे,
आशय यह कि, कृपाकर मेरे मनके संताप दूर करेंगे,
अधिदैविक-देवताओंसे होनेवाले ताप। अधिभौतिक लोक-
कृत । अध्यात्मिक-आत्मासे होनेवाला यह मैंने तीन ताप-
का महादुःख पायाहै, कृष्ण उद्धार करेंगे हम्माम गरम
पानीका कुण्डसा होताहै, उसमें स्नान करते हैं । रूपका-
लंकार ॥ १९३ ॥
जो तिय तुम मनभावती, राखौ हिये बसाय ।
मोहिं खिझावति दृगनिहै, वहई उझकति आय १९४
हृदयमें अपना प्रतिबिम्ब देख प्रीतमसें प्यारी बोली