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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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द्वितीयशतक २. ( ६९ )
नख जानकर प्रीतमसे अनखाकर क्यों बोलती है ।
व्याजोक्ति ॥ १९७ ॥
प्रौढाधीरा ।
रसकेसे मुख शशिमुखी, हँसि हँसि बोलति वैन ।
गूढमान मन क्यों रहे, भये वूढ रँग नैन ॥ १९८ ॥
हे चन्द्रमुखी! तू हँस हँसकर रसकेसे त्योरके वचन बोल-
ती है, पर छिपाहुआ मान मनमें कैसे रहसकता है, तेरे
नेत्रही वीरबहूटीकेसे रंगके होरहे हैं । काव्यलिंगलुप्ता-
वाचक ॥ १९८ ॥
मोहूसों बातन लगे, लगी जीभ जेहि भाय ।
सोई लेउर लाइये, लाल लागियत पाय ॥ १९९ ॥
प्रीतमको मनाते समय प्यारीके सन्मुख उसका नाम नि-
कलगया जिसके कारण यह रूठीथी तब वह बोली मुझसेभी
बातें करते तुम्हारी जीभ जिस नायकांस लगी उसीको
ले हृदयसे लगाओ, हे कृष्ण ! मैं तुम्हारे पांव पड़तीहूं मुझे
छोड़ो । काव्यलिंग ॥ १९९ ॥
गहकि गाँस औरै गहे, रहे अधकहे वैन ।
देखि खिसौंहें पिय नयन, किये रिसौंहें नैन २००
सखीका वचन सखीसे, उमँगकर औरही आशय लिये

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