सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 117

( ६४ ) सतसई-सटीक ।
रह्यो चकित चहुँघा चितै, चित मेरो मति भूलि ।
सूर उदय आये रही, दृगनि साँझसी फूलि १८३
मेरा मन मति भूलकर चारों ओर चकित होरहा सूर्य
के उदयमें तुम आयेहो परन्तु तुम्हारी आँखोंमें साँझसी
फूलरही है, अर्थात् लालहैं। तृतीय विभावना धर्मलुप्ता-
लंकार ॥ १८३ ॥
आप दियो मन फेरिलै, पलटै दीनी पीठि ।
कौन चाल यह रावरी, लाल लुकावत दीठि १८४
तुमने जो आप मन दिया सो फेरकर उसके बदले मुझे
पीठदी, हे कृष्ण ! यह आपका कौन रीति है जो अब दृष्टि
छिपाते हो, विनिमया ( बदला करना ) लंकार ॥ १८४ ॥
मोहिं दियो मेरो भयो, रहत जु मिलि जिय साथ ।
सो मन बाँधन दीजिये, पिय सौतिनिके हाथ १८५
मन आपने मुझे दिया सो मेरा हुआ, मेरे जीके साथ मि-
लकर रहता है, हे प्रीतम ! यह मन बाँध कर सौतोंके हाथ न
सौंपिये । काव्यलिंग ॥ १८५ ॥
मध्या धीरावर्णन ।
लन सलोने अरु रहे, अति सनेहसों पागि ।
नक कचाई देत दुख, सूरनलों मुखलागि ॥ १८६ ॥