बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. ( ६५ )
हे कृष्ण! एक तो आप सलोने हो और अतिसनेहसों पगे हो
परन्तु तुम्हारी यह थोड़ी कचाई दुःख देती है जो आप झूठ बो-
लतेहो, अथवा जैसे सूरन (जिमींकंद) मुख लगके दुःख देता
है तैसे तुम दुःख देतेहो। पूर्णोपमाश्लेष ॥ १८६ ॥
आज कछू औरै भये, ठये नये ठिक ठैन।
चितके हितके चुगल ये, नितके होय न नैन ॥ १८७
आज कुछ औरही नई ठीक ठाने हुए हैं, वा नये उत्स-
बसे ठने कुछ औरही हैं परन्तु ठहरते नहीं हैं मनकी प्रीतिके
चुगल यह तुम्हारे नयन सदाके से न होंय अर्थात् आज तुम्हारे
नेत्र चंचल हैं इससे तुम्हारा भेद जानलिया। भेद कातिशयो-
क्ति वृत्त्यलंकार ॥ १८७ ॥
अनत बसे निशिकारिसनि, उर वर रह्यो विशेषि।
तऊ लाज आई झुकत, खरे लजौंहै देखि ॥ १८८ ॥
रात्रिमें प्रीतम और स्थानमें बसे, इसकारण हृदय विक्षे-
[L16