बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७० ) सतसई-सटीक ।
बातें करतींथीं सो वह अधकही बातें रहीं, प्रीतमके खिसौने
नयन देखकर प्यारीने रिसभरी आंखें करी अर्थात् आंखोंसे
जानलिया कि, यह और कहीं आसक्त है। भेदकाति-
शयोक्ति ॥ २०० ॥
इति श्रीकविविहारीदासकी सतसईमें पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृत
दूसरा शतक पूर्ण हुआ ॥ २ ॥
उत्तमा खण्डिता ।
वाहीकी चित चटपटी, धरत अटपटे पाय।
लपट बुझावत विरहकी, कपटभरेहू आय॥२०१॥
उसीके मिलनेकी मनमें चटपटी है, इस कारण अटपटे
पांव धरतेहो, इसप्रकार कपटभरेभी आकर तुम मेरे विरहकी
तपत बुझातेहो। पंचम विभावना ॥ २०१ ॥
दक्षन पिय ह्वै वाम वश, बिसराई तिय आन।
एकै वासरके विरह, लागे बरष बितान ॥२०२॥
हे चतुर पिय ! तुमने एक स्त्रीके वशीभूतहो और स्त्रियों
को भुलादिया, हमें तो एकही दिनका विरह वर्षदिनके समान
बीतनैलगा अथवा हे पिय ! तुम हमारे दहिने नहीं वामहो
काव्यलिंग ॥ २०२ ॥