बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयशतक ३. ( ७१ )
मध्यमा वर्णन ।
बालमवारे सौतिके, सुन परनारि विहारि ।
भो रस अनरस रँगरली, रीझ खीझ इक बारि ॥२०३॥
नायकने सौतकी वारीमें परनारीके यहां जाकर भोग
किया, यह सुनकर रस और अनरस अर्थात् सुख और दुःख
हुआ अर्थात् इस रंगमें मिलकर रीझीभी और खीझीभी सुख
तो इस बातका कि, सौतकी वारी टलकर उसको दुःख
हुआ, और अनरस यह कि, मेरे पास न आकर औरके पास
गये, रीझी इसबातपर कि, मेरी वारी नहीं टाली, खीझी इस-
पर कि, कहूं मेरे संग ऐसा न करें यह प्रकृति बुरी है ।
दीपकालंकार ॥ २०३ ॥
अधमा वर्णन ।
मुँह मिठास दृग चीकने, भौंह सरल सुभाय ।
तऊ खरे आदर खरो, क्षण २ हियो सकाय ॥२०४॥
मुखपर मीठापन चिकने नेत्र, सरल स्वभावकी भृकुटी
हैं तोभी प्यारीके अति आदरसे क्षण२में हृदय डरता है अ-
र्थात् ऐसा न हो कि, कहीं क्रोध कर उठै अर्थात् ज्यों २ वह
मीठी २ बातें करती है त्यों त्यों मन डरताहै । पंचम विभा-
वना ॥ २०४ ॥