बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६८ ) सतसई-सटीक ।
तुम्हारे मनमें जो भावतीहै वही तुमने हृदयमें बसारक्खी है,
मुझे खिजाती है और तुम्हारी आंखोंमें होकर मुझे झाँकती
है । लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ १९४ ॥
प्रौढाअधीरा वर्णन ।
सदन सदनके फिरनकी, सदन छुटै हरिराय ।
रुचै तितै विहरतफिरो, कतविहरतउरआय १९५
हे कृष्ण ! घर घर फिरनेकी तुम्हारी बान नहीं छुटती
अच्छा जहां तुम्हारी इच्छाहो वहां विहरते- फिरो, मेरे हृद-
यमें क्यों विहरते हो अथवा आनकर मेरी छाती क्यों चीरते
हो । लाटानुप्रासजमकालंकार ॥ १९५॥
सुभर भयौ तुव गुणकणनि, पचयोकुबतकुचाल।
क्योंधौं दाऱ्यो लौहियो, दरकतनहिंनँदलाल १९६
हे नंदलाल ! तुम्हारे गुणोंके सूखे धानसे भलीप्रकार
भराहुआ तुम्हारी बुरीबात और कुचालसे पकाहुआ मेरा हृदय
अनार की भाँति क्यों नहीं फटता । पूर्णोपमा ॥ १९६ ॥
केसर केसर कुसुमके, रहे अंग लपटाय ।
लगेजाननखअनखली, कतबोलत अनखाय १९७
केसरके फूलके तन्तु अंगमें लिपट रहेहैं त और बालाके