बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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( ६६ ) सतसई-सटीक ।
खेल है, हे लाल ! और और स्थानोंसे प्रीतिको नित्य क्यों
सकुचाते हो, अर्थात् इन बातोंमें लोक कहेंगे प्यारी प्यारेसे
प्रीति नहीं करती, इसकारण ठौर ठौर अटकते फिरते हैं ।
लोकोक्ति अलंकार ॥ १८९॥
कत सकुचत निधरक फिरो, रतियों खोरि तुम्हेंन ।
कहा करौं जो जा हिये, लगे लगोहे नैन ॥१९०॥
सकुचाते काहेको हो निधरक फिरो हो तुम्हें रत्तीभर दोष
नहीं है, इसमें तुम्हारा क्या वश है जो यह लगोहे नयन जाकर
लगजाते हैं । व्याजस्तुति यथा [दोहा-मुखपर स्तुतिसी लगे,
अरु खलु निन्दा होय । इमि वचरचनाको कहें, व्याजस्तुति
सबकोय ] ॥ १९० ॥
तेह तरेंयौ त्यौरकरि, कत करियत दृग लोल ।
लीकनहींयहपीककी, श्रुतिमणिझलककपोल ॥
क्रोधसे डरावना मुखकर नेत्र क्यों चंचल करतेहो यह
लकी