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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 125

( ७२ ) सतसई-सटीक ।
रही पकर पाटी सुरिस, भरे भौंह चित नैन ।
लखि सपने पिय आन रति,जगतहु लगति हियै न
क्रोधभरी भौंह नेत्र,और चित्तसे खाटकी पट्टी पकडे रही
स्वप्नमें प्रीतमको अन्य नारीके साथ सम्भोग करता देखकर
जागकरभी प्रीतमको हृदयसे नहीं लगाती । भ्रान्त्यलं-
कार ॥ २०५ ॥
इति नायक नायका वर्णनं नाम प्रथमं प्रकरणं समाप्तम् ।
अथ संयोगशृंगारवर्णन ।
अँगुरिनु उचि भरु भीतदै,उलमि चितै चखलोल।
रुचिसों दुहुँ दुहूँनके, चूमे चारु कपोल ॥२०६॥
पाँवकी अँगुरियोंसे उचक भीतपर बोझ देकर लटककर
चञ्चल आंखोंसे चारों ओर देख परमप्रीतिसे दोनोंने दोनोंके
सुन्दर कपोल चूमे । जात्यलंकार ॥ २०६ ॥
विपरीतरतिवर्णने ।
पर्यो जोर विपरीत रति, रुपी सुरत रणधीर ॥
करति कुलाहल किंकिणी, गह्यो मौन मंजीर २०७
विपरीत रतिका भार पडनेसे प्यारी संभोगरूपी युद्धमें
धीरहो डटगई उस समय तगडीके घुंघरू शब्द करनेलगे और
पैरके भूषण नूपुरने मौनता गही। जाति वा समासोक्ति २०७