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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

गुलबर्गा में दक्खिन के मशहूर मुसलमान सन्त हज़रत बन्दा नवाज़
गेसूदराज़ की दरगाह में रहा करता था। वली मोहम्मद के ख़र्च
के लिए दरगाह से एक छोटी सी माहवारी रक़म बँधी हुई थी।
प्राचीन भारतीय ऋषियों के समान उस समय के अनेक मुसलमान
फ़क़ीर अत्यन्त सरल, किन्तु कौटुम्बिक जीवन व्यतीत किया करते
थे। वली मोहम्मद के एक बेटा था, जिसका नाम शेख़ मोहम्मद
अली था। उसे शेख़ अली भी कहते थे। शेख़ अली अपने बाप के
समान पहुँचा हुआ फ़क़ीर माना जाता था। वह कुछ दिन बीजापुर
में रहा, फिर कर्नाटक के कोलार स्थान में आकर ठहरा। कोलार
का हाकिम शाह मोहम्मद दक्खिनी शेख़ अली का बड़ा भक्त था।
शेख़ अली के चार बेटे थे। ख़र्च की तङ्गी के सबब बेटों ने बाप से
प्रार्थना की कि हमें इजाज़त दीजिये कि हम कहीं और जाकर
नौकरी कर लें, धन और इज़्ज़त हासिल करें। किन्तु शेख़ अली ने
बेटों को समझाया :-
"हमारे बाप दादा ख़ुदातरस और परहेज़गार लोग थे। वे इस क़ाबिल
थे कि दुनिया में नाम हासिल करते, फिर भी दुनिया के बन्धनों और उसके
संसर्ग से वे अपने को सदा अलग रखने की कोशिश करते रहे; क्योंकि
दुनिया की लालसा से रूहानी शान्ति जाती रहती है और सच्चे सुख की
खोज का शौक़ मिट जाता है; इसलिए तुम्हें उचित है कि अपने पूर्वजों
के क़दम ब क़दम चलो और इस चन्दरोज़ा हस्ती के फन्दों में न आओ
× × × इसके अलावा मनस्वी और आज़ाद तबीयत के लोग अपनी
सांसारिक हाजत के तङ्ग होने से कभी दुखी नहीं होते और यदि उनके

३१० भारत में अंगरेज़ी राज
दुनिया से सम्बन्ध हों तो भी वे उन सम्बन्धों को छोड़ देने और दुनिया से
तश्रल्लुक़ तोड़ लेने में ही फ़ख़ करते हैं।"*
निस्सन्देह हैदरअली के पितामह और प्रपितामह दोनों सच्चे
फ़क़ीर थे । जब तक शेख़ अली ज़िन्दा रहा उसके बेटे उसके साथ
रहे। सन् १६९५ ईसवी में शेख़ अली की मृत्यु हुई। बड़ा बेटा शेख़
इलियास बाप का उत्तराधिकारी हुआ। सबसे छोटे बेटे का नाम
फ़तह मोहम्मद था। फ़तह मोहम्मद अपने बड़े भाई की इच्छा के
खिलाफ़ अरकाट के नवाब सआदतउल्ला ख़ाँ की फ़ौज में जमादार
हो गया। फ़तह मोहम्मद ने एक दूसरे मुसलमान फ़क़ीर तंजोर के
पीरज़ादा बुरहानुद्दीन की लड़की के साथ विवाह कर लिया। इस
स्त्री से फ़तह मोहम्मद के दो लड़के हुए। एक का नाम शहबाज़
और दूसरे का हैदरअली था। हैदरअली का जन्म सन् १७२०
ईसवी के क़रीब हुआ।
आज से दो सौ साल पहले अधिकांश भारत में हिन्दू और
मुसलमानों का सामाजिक जीवन एक विचित्र ढंग से परस्पर गुथा
हुआ था। हैदरअली की एक फ़ारसी जीवनी से पता चलता है
कि हैदर के जन्म के समय हिन्दू ज्योतिषियों ने उसकी जन्मपत्री
तैयार की। हैदर 'सिंह' राशि में पैदा हुआ था, इसलिए
ज्योतिषियों ही की राय से उसका नाम हैदर (शेर) अली रक्खा
गया। ज्योतिषियों ही ने पेशीनगोई की कि नवजात बालक एक
* History of Hyder Naik—by Mir Hussen Ali Khan Kirmani, translated
by Col. W. Miles, p. 5.

हैदरअली ३११
दिन राजसिंहासन पर बैठेगा, किन्तु साथ ही उसके जन्म के थोड़े
ही दिनों के बाद उसके पिता की मृत्यु हो जायगी। इस पर
फ़तह मोहम्मद के कुछ रिश्तेदारों ने बालक को मार डालना चाहा।
फ़तह मोहम्मद को पता लगा तो उसने स्वयं अपने जीने की परवा
न कर बालक का पक्ष लिया। इस तरह हैदरअली की जान बच
गई और माता पिता ने उसे बड़े प्रेम से पाला।
शहबाज़ और हैदरअली के जन्म से पहले फ़तह मोहम्मद ने
अरकाट की नौकरी छोड़ कर पहले मैसूर में नौकरी की और फिर
वहाँ से छोड़कर सूबा सीरा के नवाब दरगाह कुलीख़ाँ के यहाँ नौकरी
कर ली। सीरा में वह बालापुर कलाँ का क़िलेदार बना दिया गया।
थोड़े दिनों बाद दक्खिन के नरेशों की आपसी लड़ाइयों में फ़तह
मोहम्मद किसी लड़ाई में काम आया। बाप की मृत्यु के समय शहबाज़
की आयु आठ साल की और हैदरअली की आयु ३ साल की थी।
विजयी नवाब अब्बास कुली ख़ाँ ने फ़तह मोहम्मद की बेवा और
उसके यतीम बच्चों का सब माल असबाब ज़ब्त कर लिया और उनके
सम्बन्धियों से अधिक धन वसूल करने के उद्देश से शहबाज़ और
हैदरअली दोनों मासूम बालकों को पकड़ कर एक नगाड़े के अन्दर
बन्द कर दिया और ऊपर से नगाड़े पर चोट लगवानी शुरू की।
हैदरअली का एक चचेरा भाई, जिसका नाम भी हैदर साहब
था और जो हैदरअली के ताऊ शेख़ इलियास का
[पार्श्व टिप्पणी: मैसूर की सेना में] बेटा था, इस समय मैसूर के राजा के यहाँ नायक
[पार्श्व टिप्पणी: भरती होना] था। हैदरअली की माँ ने अपने इस भतीजे को

३१२ भारत में अंगरेज़ी राज
अपनी मुसीबत की इतला दी। हैदर साहब ने फ़ौरन धन भेजकर
शहबाज़, हैदरअली और उनकी माँ तीनों को छुड़वाया और उन्हें
श्रीरंगपट्टन में बुलवाकर बड़े आदर और प्रेम से अपने पास रक्खा।
यहाँ पर शुरू से ही शहबाज़ और हैदरअली दोनों को घोड़े की
सवारी, निशानेबाज़ी, शस्त्रों का उपयोग और युद्ध विद्या की पूरी
तालीम दी गई। बालिग़ होने पर शहबाज़ और हैदरअली दोनों
भाई मैसूर की फ़ौज में भरती हो गए।
मैसूर की हिन्दू रियासत दिल्ली सम्राट की आज्ञानुसार मराठों
को ‘चौथ’ दिया करती थी। इस एक बात के अलावा और सब
तरह अपने भीतरी शासन में मैसूर की रियासत स्वाधीन थी।
दक्खिन के सूबेदार निज़ामुलमुल्क को मैसूर दरबार के ऊपर किसी
तरह का क्रियात्मक आधिपत्य प्राप्त न था।
सन् १७४८ ई० में हैदराबाद के निज़ाम का देहान्त हुआ।
मृत्यु से पहले निज़ाम ने मुज़फ़्फ़रजंग को अपना उत्तराधिकारी
नियुक्त कर दिया। अंगरेज़ों ने एक दूसरे मनुष्य नाज़िरजंग को
हक़दार खड़ा कर दिया और उसका पक्ष लेकर लड़ना शुरू किया।
फ़्रांसीसियों और मैसूर दरबार ने मुज़फ़्फ़रजंग का साथ दिया।
अन्त में मुफ़्फ़फ़रजंग ही की विजय रही। इन लड़ाइयों में हैदर
अली का बड़ा भाई शहबाज़ मैसूर की ओर से लड़ रहा था। उसके
अधीन दो सौ सवार और एक हज़ार पैदल थे। हैदरअली उस
समय अपने भाई के अधीन एक मामूली घुड़ सवार था।
मैसूर के महाराजा एक अरसे से सिंहासन की केवल एक

हैदरअली ३१३
शोभा समझे जाते थे। महाराजा का अधिकांश समय महल के
'दैव' की पदवी अन्दर पूजा पाठ और अन्य धार्मिक क्रियाओं में
व्यतीत होता था। यहाँ तक कि महाराजा साल
में केवल दो बार अपनी प्रजा के सम्मुख आता था। शासन के काम
से उसे किसी तरह का सम्बन्ध न था। समस्त शासन प्रधान मन्त्री
के सुपुर्द था, जिसे 'दैव' या 'दलवाई' कहते थे। दैव ही राज का
क्रियात्मक स्वामी होता था। दैव की गद्दी पैतृक थी। यह रिवाज
कई पीढ़ियों से चला आता था। पिछले युद्ध में मैसूर का दैव
नन्दीराज हैदरअली की योग्यता और वीरता को देख कर इतना
खुश हुआ कि सन् १७५५ में उसने हैदरअली को डिण्डीगल
का फ़ौजदार नियुक्त कर दिया। इस युद्ध में ही हैदरअली ने
फ्रांसीसियों की सैनिक व्यवस्था और उनकी क़वायद को अच्छी
तरह देखा और डिण्डीगल में फ़ौज को क़वायद सिखाने के लिए
कुछ फ्रांसीसी अफ़सर नौकर रक्खे। अपने तोपखाने में भी उसने
कुछ फ्रांसीसी कारीगर नियुक्त किए।
धीरे धीरे हैदरअली का बल बढ़ता गया। यहाँ तक कि वह
रियासत का प्रधान सेनापति हो गया। थोड़े
हैदरअली का 'दैव' दिनों बाद मैसूर दरबार के मंत्रियों में आपसी
नियुक्त होना झगड़े बढ़े। खांडेराव ने किसी तरह साज़िश
कर नन्दीराज को गद्दी से अलग कर अपने को मैसूर का 'दैव'
नियुक्त करा लिया। लिखा है कि राजधानी श्रीरंगपट्टन की
प्रजा खांडेराव से बहुत असन्तुष्ट थी। खांडेराव एक मराठा

३१४ भारत में अंग्रेज़ी राज
ब्राह्मण था, जिसे हैदरअली ने ही किसी समय रियासत के अन्दर
नौकर रखाया था। खाँडेराव ने अब गुप्त तरीक़े से मराठों को
श्रीरंगपट्टन पर हमला करने के लिए बुलवा भेजा। हैदरअली उस
समय रियासत का प्रधान सेनापति था। इस तरह खाँडेराव ने
मैसूर दरबार और हैदरअली दोनों के साथ विश्वासघात किया।
हैदरअली को अपनी सेना सहित खाँडेराव और मराठों का मुक़ा-
बला करना पड़ा। हमें इन लड़ाइयों के विस्तार में पड़ने की ज़रूरत
नहीं है। राजकुल के लोगों ने और ख़ास कर नन्दीराज से पहले के
'दैव' देवराज की विधवा ने, जिसका उस समय श्रीरंगपट्टन में बहुत
अधिक प्रभाव था, हैदरअली की पूरी मदद की। अन्त में हैदरअली
की विजय रही। प्रजा की इच्छा के अनुसार अब मैसूर के महाराजा
ने विश्वासघातक खाँडेराव को अलग कर हैदरअली को 'दैव' के
सर्वोच्च पद पर नियुक्त कर दिया।
ऊपर आ चुका है कि बहुत समय पहले से दैव ही मैसूर के
[हाशिया: सम्राट की ओर से] क्रियात्मक शासक होते थे। मैसूर के दैव और
[हाशिया: 'सीरा' का सूबेदार] वहाँ के महाराजा में क़रीब क़रीब वैसा ही
[हाशिया: नियुक्त किया जाना] सम्बन्ध था जैसा पूना के पेशवा और शिवाजी
के वंशजों में। इसके बाद भी मैसूर के राजा नाम
मात्र को अपने महल के अन्दर सिंहासन पर बैठते रहे, किन्तु
वास्तव में इस समय से हैदरअली मैसूर का क्रियात्मक शासक बन
गया और दैव की गद्दी उसके ख़ानदान में पैतृक हो गई। कुछ
समय बाद दिल्ली सम्राट ने हैदरअली की योग्यता और उसके बल

हैदरअली ३१५
की ख़बर सुन कर उसे मैसूर के पास सीरा प्रान्त का सूबेदार
नियुक्त कर दिया।
मैसूर दरबार की हालत पिछली आपसी लड़ाइयों के सबब उस
[शासन प्रबन्ध] समय ख़ासी बिगड़ी हुई थी। हैदर ने सबसे
[और सुधार] पहले राज की माली हालत की ओर ध्यान दिया।
रियासत के अधिकांश ज़ेवर और जवाहरात
श्रीरंगपट्टन के एक धनाढ्य साहूकार के घर में गिरवी पड़े हुए थे।
साहूकार ने कई मौक़ों पर रियासत को बड़ी बड़ी रक़में क़र्ज़ दी
थीं। रियासत से उसने बेहद धन कमाया था। अपने धन के लिए
वह दूर दूर तक मशहूर था। कहा जाता है कि उसके बच्चों के
पालने ठोस सोने के बने हुए थे और ठोस सोने ही की ज़ञ्जीरों से
लटके रहते थे। हैदरअली ने आज्ञा दी कि उसका क़र्ज़ चुका
दिया जाय और रियासत का सामान उसके यहाँ से ले लिया जाय।
हिसाब की जाँच पड़ताल के लिए पञ्च मुक़र्रर किए गए। पञ्चों
की रिपोर्ट से मालूम हुआ कि साहूकार के हिसाब में काफ़ी बेईमानी
और जालसाज़ी है। पञ्चों ही ने फ़ैसला किया कि साहूकार की
तमाम सम्पत्ति ज़ब्त कर ली जाय और उसे आजन्म क़ैद रक्खा
जाय। हैदरअली ने उसकी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली, किन्तु उसे क़ैद
करने के बजाय उसके गुज़ारे के लिए एक पेन्शन नियत कर दी
और उसके बेटों को रियासत के अन्दर अच्छे अच्छे ओहदों पर
नियुक्त कर दिया। मालगुज़ारी की वसूली और राज के ख़र्च का
हैदरअली ने बहुत सुन्दर प्रबन्ध कर दिया।

३१६ भारत में अंग्रेज़ी राज
जिस तरह मैसूर का राजा दिल्ली सम्राट के मातहत था, उसी
तरह मैसूर के मातहत अनेक छोटे छोटे सामन्त राजा थे। मैसूर के
अनेक सामन्त उस समय मैसूर के ख़िलाफ़ बगावत कर रहे थे।
इनमें से अनेक के बीच आपसी लड़ाइयाँ जारी थीं। इन सामन्तों
या प्रान्तीय शासकों को अधिकतर पालीगार कहा जाता था।
हैदर ने सेना भेजकर इन सब पालीगारों को वश में किया और
सारे राज में शान्ति और सुशासन क़ायम किया।
इन बाग़ी सामन्तों में मुख्य बेदनूर का राजा था। लिखा है
कि राजधानी बेदनूर की आधी आबादी उस समय ईसाई थी।
बेदनूर के राजा और उसकी विधवा माता में कुछ झगड़ा हुआ।
राजा ने हैदरअली से मदद चाही। बेदनूर की प्रजा भी राजा के
पक्ष में थी। हैदरअली ने राजा का पक्ष लेकर बेदनूर पर चढ़ाई
की, रानी ने बड़ी वीरता के साथ अपने दुर्ग की रक्षा की। अन्त में
रानी की सेना हार गई। हैदरअली ने एक बार रानी और उसके
बेटे में सुलह करवा दी और बेटे के राजतिलक का प्रबन्ध कर दिया।
इसके बाद भी रानी ने बेटे के साथ गुप्त साज़िश करके हैदरअली
को मरवा डालने का प्रबन्ध किया। हैदरअली पर भेद खुल गया।
तहक़ीक़ात के बाद रानी और उसके पुत्र दोनों को उसने क़ैद कर
लिया और उनकी जगह अपने एक आदमी राजाराम को बेदनूर का
शासक नियुक्त कर दिया। बेदनूर की रियासत इतनी धनाढ्य थी
कि क़िले के अन्दर हैदरअली को क़रीब बारह करोड़ रुपए का माल
सोना, चाँदी और जवाहरात मिले। हैदरअली ने इस धन से अपने

हैदरअली ३१७
तमाम सिपाहियों को छै छै महीने का वेतन इनाम में दिया, ग़रीबों
और साधुओं में भोजन, वस्त्र, धन बटवाया और बेदनूर का नाम
बदलकर हैदरनगर रख दिया।
इसके बाद और भी नए नए प्रान्तों को विजय कर हैदरअली ने
मैसूर राज की सीमा को बढ़ाया और वहाँ के शासन को सुदृढ़
और व्यवस्थित रूप दिया।
मराठे भी चारों ओर अपना साम्राज्य बढ़ाने के प्रयत्नों में लगे
हुए थे। चार बार उन्होंने मैसूर पर हमला किया, किन्तु इन हमलों
से मराठों को कोई ख़ास लाभ न हो सका। हैदरअली का बल कुछ
कम न था। वह कभी लड़कर और कभी थोड़ा बहुत ज़र ज़मीन
देकर मराठों से छुटकारा पाता रहा। अन्त में जो थोड़ा बहुत
इलाक़ा मराठों ने इस तरह हैदरअली का ले लिया था वह भी उन्हें
वापस लौटा देना पड़ा और दोनों को अपने अपने हित के लिए
एक दूसरे के साथ सन्धि करनी पड़ी।
किसी भी स्वाधीन भारतीय नरेश के इस प्रकार बढ़ते हुए बल
अंग्रेज़ों के साथ को अंग्रेज़ गवारा न कर सकते थे। वे तरह
पहली लड़ाई तरह से हैदरअली को कुचलने की तदबीरें करने
लगे। हैदरअली के साथ उनका पहला युद्ध सन्
१७६७ में शुरू हुआ। छेड़छाड़ अंग्रेज़ों की ओर से हुई। अंग्रेज़ों
ने बिला वजह उस साल हैदर के बारामहल के इलाक़े पर हमला
कर दिया। करनाटक के नवाब मोहम्मदअली के साथ हैदरअली
की इससे पहले ख़ासी मित्रता थी। अंग्रेज़ों ने करनाटक के नवाब

३१८ भारत में अंगरेज़ी राज
को यह कह कर हैदरअली के ख़िलाफ़ फोड़ा कि बारामहल का
इलाक़ा हैदरअली से जीतकर तुम्हें दे दिया जायगा।
अंगरेज़ों का मुक़ाबला करने के लिए हैदरअली ने अब निज़ाम
के साथ सन्धि की। तय हो गया कि निज़ाम और हैदरअली दोनों
की सेनाएँ मिलकर करनाटक और अंगरेज़ी इलाक़े पर हमला करें
और नवाब मोहम्मदअली को दण्ड देने के लिए उसे करनाटक की
मसनद से हटाकर हैदरअली के बेटे टीपू को उसकी जगह बैठा दें।
क़रीब पचास हज़ार सेना निज़ाम की ओर से वज़ीर रुकनुद्दौला के
अधीन हैदरअली की मदद के लिए आई। इतनी ही सेना जनरल
स्मिथ के अधीन मद्रास से बढ़ी। इतने में जब कि अभी अंगरेज़ों
और हैदरअली में पत्र व्यवहार हो ही रहा था, जनरल स्मिथ ने
हैदर के वनियमवाड़ी, कावेरीपट्टम इत्यादि कुछ सरहदी क़िले अपने
अधीन कर लिए। हैदरअली के पास कुल सेना इस समय दो लाख
के क़रीब थी। इसमें से पचास हज़ार सेना लेकर वह जनरल स्मिथ
के मुक़ाबले के लिए बढ़ा। रुकनुद्दौला की सेना भी हैदरअली की
सेना के साथ साथ थी। इस दरमियान अंगरेज़ों ने निज़ाम और
रुकनुद्दौला के साथ गुप्त पत्र व्यवहार शुरू किया। कई जगह ऐन
मौक़े पर रुकनुद्दौला के व्यवहार से दगा का शक होने लगा।
हैदरअली के साथ अंगरेज़ों की कई छोटी बड़ी लड़ाइयाँ हुईं, जिनमें
विजय कहीं अंगरेज़ों की रही और कहीं हैदरअली की। हैदरअली
के मज़बूत क़िलों पर अंगरेज़ कोई विशेष असर न डाल सके। फिर
भी हैदरअली का बहुत सा इलाक़ा अंगरेज़ों के हाथों में आ गया।

हैदरअली ३१६
अरकाट का नवाब अंगरेज़ों से मिल चुका था और निज़ाम भी
हैदरअली को धोखा देता हुआ मालूम होता था। दूसरे उन दिनों
मराठों के हमले का हैदरअली को बराबर डर लगा रहता था।
तीसरे स्वयं मैसूर में उसका शासन अभी हाल ही का जमा हुआ
था और वह बहुत दिनों तक राजधानी से दूर न रह सकता था।
इन सब बातों से मजबूर होकर सितम्बर सन् १७६८ में हैदरअली
ने अंगरेज़ों से सुलह की बात चीत शुरू की।
अंगरेज़ों को इससे विश्वास हो गया कि हैदरअली की हालत
कमज़ोर है और हम आसानी से उसके सारे इलाके को फ़तह कर
लेंगे। उन्होंने अपमान के साथ हैदरअली के दूत को अपने यहाँ से
लौटा दिया। किन्तु हैदर कायर न था, उसने अब ज़ोरों के साथ
युद्ध की तैयारी शुरू की। नवम्बर सन् १७६८ में अंगरेज़ों को मैसूर
राज्य से बाहर निकालने के लिए उसने अपने एक सेनापति
फ़ज़लुल्लाह ख़ाँ को सेना सहित रवाना किया। इसके बाद हैदर
ख़ुद सेना लेकर आगे बढ़ा।
सब से पहले उसने अपने उन क़िलों को फिर से एक एक कर
विजय करना शुरू किया, जिन पर अंगरेज़ी सेना
[हाशिया: हैदरअली की विजय] ने क़ब्ज़ा कर लिया था। इनमें कावेरीपट्टम का
[हाशिया: और शत्रु के साथ] क़िला एक मुख्य क़िला था। हैदरअली ने उसका
[हाशिया: उसकी उदारता] मोहासरा शुरू किया। अंगरेज़ों ने अपनी तोपों
से क़िले की रक्षा का पूरा प्रबन्ध कर रक्खा था। हैदरअली की
तोपों ने क़िले के बाहर से गोलाबारी शुरू की। क़रीब तीन घंटे की

अकाल, धन-निष्कासन (Drain of Wealth) एवं भारत में अंग्रेजी राज उपसंहार

३२० भारत में अंग्रेज़ी राज
गोलाबारी के बाद अंगरेज़ी सेना को फ़सील छोड़ कर पीछे हट
जाना पड़ा। अंगरेज़ सेनापति ने विवश होकर सुलह का सफ़ेद
झंडा दिखलाया। हैदर ने लड़ाई बन्द कर दी और क़िले पर क़ब्ज़ा
कर लिया। क़िले के भीतर के तमाम अंगरेज़ सिपाहियों की हैदर
ने जान बख़्श दी और उन्हें इस बात की इजाज़त दे दी कि तुम
लोग अपने हथियार रख कर मद्रास लौट जाओ। कम्पनी के देशी
सिपाहियों को उसने मौक़ा दिया कि तुम लोग चाहे अपने घर
लौट जाओ और चाहे मैसूर की सेना में भरती हो जाओ। ये
हिन्दोस्तानी सिपाही क़रीब क़रीब सब हैदरअली की सेना में
आकर भरती हो गए। हैदरअली ने इस बात का भी हुकुम दे दिया
कि कम्पनी का हर अफ़सर और सिपाही, सिवाय हथियारों, गोले
बारूद, घोड़ों और उस तमाम माल के जो इंगलिस्तान के बादशाह
या अंगरेज़ कम्पनी या नवाब मोहम्मदअली का है, बाक़ी सब
निजी सम्पत्ति अपने साथ ले जा सकता है। क़िले के पराजित
अंगरेज़ सेनापति ने जब हैदरअली से निवेदन किया कि रसद
इत्यादि का बहुत सा सामान मैंने अपने निजी रुपए से ख़रीदा है,
तो उदार हैदरअली ने उसे अपने ख़ज़ाने से उस सामान का दाम
तक दिलवा दिया।
एक ओर हैदरअली का व्यवहार पराजित शत्रु के साथ इतना
उदार था, दूसरी ओर अंगरेज़ों ने इसी युद्ध में
अंगरेज़ों के व्यवहार | हैदरअली के एक छोटे से क़िले धर्मपुरी पर
के साथ तुलना | क़ब्ज़ा करते हुए, उस समय जब कि सुलह का

सफेद झंडा फसील पर गड़ा हुआ था, क़िले में घुस कर वहाँ के
क़िलेदार, उसके बालबच्चों और एक एक सिपाही को जो हथियार
रख चुके थे क़त्ल कर दिया, और यह सब अंगरेज़ सेनापति की
आज्ञा से किया गया ।
कावेरीपट्टम के बाद हैदरअली ने अपने बाकी क़िलों को भी एक
एक कर अंगरेज़ों से विजय किया । इन तमाम लड़ाइयों और
मोहासरों का बयान करना यहाँ पर अनावश्यक है। इन लड़ाइयों
में जनरल स्मिथ की सेना को काफ़ी ज़िल्लत के साथ पीछे भागना
पड़ा । जगह जगह उसे अपना माल असबाब पीछे छोड़ देना पड़ा,
अपनी तोपें और गोला बारूद तालाबों और नदियों में फेक देना
पड़ा और कहीं कहीं अपने मुर्दों तक को बिना दफ़नाए मैदान में
छोड़ कर भागना पड़ा । किन्तु अपनी तमाम लड़ाइयों में हैदर का
यह एक नियम था कि वह आगे बढ़ने से पहले शत्रु के मुर्दों को
जमा करके यथा विधि दफ़ना दिया करता था ।
हैदर के बड़े बेटे फ़तहअली टीपू की आयु इस समय १८ वर्ष
[हाशिया: टीपू का मद्रास पर हमला] की थी । टीपू अपने बाप के साथ मैदान
में मौजूद था । हैदर स्वयं जनरल स्मिथ को
अपनी सरहद से बाहर निकालने के लिए पीछे
रहा और टीपू को उसने पाँच हज़ार सवार देकर एक दूसरे
रास्ते मद्रास की ओर भेजा । टीपू अपनी सेना सहित इस
तेज़ी के साथ आगे बढ़ा कि मद्रास का गवरनर और उसकी
२१

३२२ भारत में अंगरेज़ी राज
कौन्सिल टीपू को अचानक मद्रास के सामने देखकर घबरा गए।
लिखा है कि जिस दिन प्रातःकाल टीपू के सवार मद्रास के पास
पहुँचे, गवरनर और उसकी कौन्सिल के मेम्बर और नवाब मोहम्मद
अली मद्रास के क़िले से कुछ दूर कम्पनी के एक बग़ीचे में हवा
खा रहे थे और दरख़्तों के नीचे खाना सजा हुआ था। इन लोगों
को इस तेज़ी से भागना पड़ा कि घबराहट में गवरनर की तलवार
और उसकी टोपी तक रह गई। सौभाग्यवश एक छोटा सा जहाज़
उस समय सामने था। गवरनर और उसके अंगरेज़ साथियों ने
भागकर इस जहाज़ में पनाह ली। एक यूरोपियन इतिहास लेखक
लिखता है कि यदि वह जहाज़ मौक़े पर न होता तो गवरनर और
उसके साथियों को टीपू के सवारों ने अवश्य क़ैद कर लिया होता।*
नवाब मोहम्मदअली अपने तेज़ घोड़े पर सवार होकर सड़क के
रास्ते मद्रास से भाग निकला।
टीपू ने मद्रास के क़िले से पाँच मील दूर सेण्ट टॉमस की
पहाड़ी पर क़ब्ज़ा कर लिया और आस पास के अंगरेज़ी इलाक़े
को अपने अधीन कर लिया।
इस बीच त्रिनमल्ली नामक स्थान पर हैदरअली और जनरल
[हाशिया: हैदरअली के साथ] स्मिथ का मुक़ाबला हुआ। निज़ाम की सेना
[हाशिया: निज़ाम का] अभी तक हैदर की सेना के साथ साथ थी,
[हाशिया: विश्वासघात] किन्तु निज़ाम और अंगरेज़ों में गुप्त बातचीत
हो चुकी थी। ऐन इस मौक़े पर अंगरेज़ी सेना

  • History of Hyder Shah, By M. M. D. L. T., p. 192.

हैदरअली ३९३
पर हमला करने के बहाने निज़ाम ने अपनी तमाम सेना को हैदर
और अंगरेज़ों की सेना के बीच में लाकर खड़ा कर दिया। थोड़ी
ही देर बाद निज़ाम ने अपनी सेना को इस बुरो तरह पीछे की ओर
भगाया कि हैदर की तमाम सेना में खलबली मच गई। हैदरअली
को अब पूरी तरह निज़ाम के विश्वासघात का पता 'चल गया ।
उसे मजबूर होकर अपनी सेना कुछ दूर पीछे हटा लेनी पड़ी।
फिर भी हैदर के एक सिपाही को भी गिरफ़्तार करने का अंगरेज़ों
को मौक़ा न मिल सका और न जनरल स्मिथ को आगे बढ़कर
हैदर पर हमला करने का साहस हुआ ।
हैदर के इस तरह पीछे हटने को उसकी पराजय बताकर अंगरेज़ों
ने खूब बढ़ा कर इस ख़बर को दूर दूर तक फैला दिया ।
यहाँ पर युद्ध के प्रसङ्ग से हटकर हम हैदरअली और उसकी
[पार्श्व-शीर्षक: हैदरअली की माँ] बूढ़ी माँ के सम्बन्ध की एक घटना बयान करना
चाहते हैं। हैदर की माँ उस समय लड़ाई के
मैदान से क़रीब दो सौ मील दूर हैदरनगर के महल में थी। बेटे
की इस पराजय की ख़बर उसके कानों तक पहुँची। वह फ़ौरन
पालकी में बैठकर अपने बेटे को हिम्मत दिलाने के लिए हैदरनगर
से चल पड़ी। बरसात के दिन, उस ज़माने की यात्रा के कष्ट और
उस पर लड़ाई का मैदान। फिर भी रात दिन चलकर बूढ़ी माँ
चन्द रोज़ के अन्दर ही अपने बेटे की सेना के निकट आ पहुँची।
ख़बर पाते ही हैदर अपने छोटे बेटों सहित स्वागत के लिए आगे
बढ़ा। माँ के साथ क़रीब एक हज़ार सिपाही घोड़ों और ऊँटों पर,

३२४ भारत में अंगरेज़ी राज
और इनके अलावा पालकी के आगे आगे दो सौ स्त्रियाँ बुरक़े पहने
हुए घोड़ों पर सवार थीं। कहा जाता है कि माँ के ख़ेमे में उतरते
ही हैदर ने हैरान होकर पूछा—"आप इतना कष्ट उठाकर इस समय
यहाँ कैसे आईं ?" बूढ़ी माँ ने उत्तर दिया—"बेटा, मैं यह देखना
चाहती थी कि तुम अपनी पराजय को कितने धैर्य के साथ सह
सकते हो।" हैदर ने जवाब में अपनी हिम्मत दिखलाते हुए माँ को
विश्वास दिलाया कि वह पराजय कोई पराजय ही न थी। इस पर
माँ ने उत्तर दिया—"ख़ूब, बहुत ख़ूब, अगर यही बात है तो ख़ुदा
का शुक्र है और मैं फ़ौरन लौट जाऊँगी, ताकि मेरे रहने से तुम्हारे
काम में रुकावट न पड़े।" अपने पहुँचने के ठीक तीसरे रोज़ हैदर
की बूढ़ी माँ बेटे को दुआ देकर हैदरनगर की ओर लौट गई।
निस्सन्देह इस प्रकार की वीर माता ही हैदर जैसे वीर पुत्र को
जन्म दे सकती थी।
टीपू मद्रास के क़िले से केवल एक कोस की दूरी पर था। उस
समय के उल्लेखों से ज़ाहिर है कि टीपू के लिए
टीपू के साथ छल उस समय मद्रास विजय कर सकना कुछ भी
मुश्किल न था। जनरल स्मिथ ने त्रिनमल्ली की विजय के बाद
टीपू को पीछे हटाने की एक ख़ासी सुन्दर चाल चली। उसने एक
साँडनी सवार फ़ौरन मद्रास की ओर भेजा। इस सवार ने टीपू
की सेना में पहुँच कर यह ज़ाहिर किया कि मुझे सुलतान हैदरअली
ने अपने बेटे की ख़बर लेने के लिए भेजा है। टीपू को उसने
त्रिनमल्ली की पराजय की ख़बर दी और कहा कि सुलतान का हुकुम

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हैदरअली ३२५

है कि आप फ़ौरन लौटकर सुलतान से जा मिलें । इस छल के बाद
इसी दूत ने टीपू की सेना से निकल कर आगे बढ़कर मद्रास के
अंगरेज़ों को विजय की सूचना दी, जिसकी झूठी खुशी में एक सौ
एक तोपें मद्रास के क़िले से छोड़ी गईं ।
नातजरुबेकार टीपू ने धोखे में आकर अपने सेनापतियों से
सलाह की । सब की सलाह यही हुई कि इस हालत में मद्रास के
क़िले का मोहासरा करना ठीक नहीं। टीपू अपनी सेना सहित
पीछे लौटकर पिता से आ मिला ।
माँ के जाने के दूसरे दिन हैदरअली वनियमबाड़ी के क़िले की
[हाशिया: वनियमवाड़ी में हैदर की विजय] ओर बढ़ा । वनियमवाड़ी का क़िला भी एक
निहायत मजबूत क़िला था, किन्तु हैदर की
चन्द घण्टे की गोलाबारी ने क़िले की अंगरेज़ी
तोपों को ठण्डा कर दिया । क़िले के अंगरेज़ अफ़सर ने सफ़ेद
झण्डा गाड़ दिया । हैदर की सेना ने क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया ।
हैदर ने क़िले के तमाम अंगरेज़ अफ़सरों और सिपाहियों को उनसे
यह वादा कराकर छोड़ दिया कि हम लोग कम से कम एक साल
तक किसी लड़ाई में आपके ख़िलाफ़ न लड़ेंगे ।
इस क़िले की रक्षा का उचित प्रबन्ध करके हैदरअली आम्बूर
[हाशिया: पीरज़ादा ख़ाकी शाह] की ओर बढ़ा । आम्बूर के मोहासरे में हैदरअली
का एक प्रसिद्ध मित्र पीरज़ादा ख़ाकीशाह घायल
होकर मर गया । यह पीरज़ादा एक मुसलमान
फ़क़ीर था, जो अक्सर हैदर की सेना के साथ रहा करता था ।

३२६ भारत में अंग्रेज़ी राज
उसका मुख्य काम यह था कि वह हर विजय के बाद यह देखने
के लिए घर घर घूमता फिरता था कि हैदर के सिपाही सिवाय
नक़दी और अस्त्र शस्त्र ले लेने के प्रजा के साथ किसी तरह का
अत्याचार न करें। इस सराहनीय प्रयत्न में ही पीरज़ादा ख़ाकी
शाह की जान गई। क़िले के अन्दर की अंगरेज़ी सेना ने अपने
कारतूस एक तालाब के अन्दर फेंक दिए और शस्त्रागार को आग
लगा दी। फिर भी हैदर को इस क़िले के अन्दर अंगरेज़ों की १८
पीतल की तोपें, तीन हज़ार बन्दूकें और बहुत कुछ गोला बारूद
और रसद का सामान मिला।
जनरल स्मिथ की सेना अब हार पर हार खाकर पीछे हटती
[पार्श्व टिप्पणी: विश्वासघात के पक्ष] जा रही थी। उसकी सहायता के लिए कर्नल
[पार्श्व टिप्पणी: में ईसाई पादरियों] बुड एक नई सेना सहित बंगाल से रवाना
[पार्श्व टिप्पणी: का फ़तवा] किया गया। इसी समय के निकट हैदर की
सेना में विश्वासघात के बीज बोने का अंगरेज़ों
ने एक ख़ासा षड्यन्त्र रचा। अनेक यूरोपियन उस ज़माने में यूरोप
से आकर अनेक हिन्दुस्तानी नरेशों की फ़ौजों में नौकरियाँ कर लेते
थे। हैदर की सेना में भी अनेक यूरोपियन कई ऊँचे पदों पर
नियुक्त थे। कई कम्पनियाँ फ्रांसीसी सिपाहियों की भी उसकी
सेना में शामिल थीं। अंगरेज़ों ने ईसाई पादरियों के ज़रिए हैदर
के इन तमाम यूरोपियन मुलाज़िमों को फोड़ने की कोशिश की। इस
षड्यन्त्र की कुछ भनक हैदर के कानों तक पहुँच गई। उसने अपने
तमाम यूरोपियन मुलाज़िमों को जमा करके उनकी तनख़ाहें दिलवा

हैदरअली ३२७
दीं और उनसे कह दिया कि तुम लोग अगर चाहो तो नौकरी
छोड़ कर जा सकते हो । किन्तु उन सब ने ‘इंजील और सलीब
हाथ में लेकर’ हैदर की वफ़ादारी की क़सम खाई । वे सब फिर
से नौकर रख लिए गए । अंगरेज़ों के जासूस जब फिर इन लोगों
के पास पहुँचे तो अधिकांश यूरोपियन सिपाहियों ने यह एतराज़
किया कि हम ‘इंजील और सलीब हाथ में लेकर’ सुलतान को
वफ़ादारी की क़सम खा चुके हैं । इस पर अंगरेज़ों ने यूरोपियन
ईसाई पादरियों के दस्तख़त से एक फ़तवा लिखवा कर उसकी
नक़लें हैदर के यूरोपियन नौकरों में बँटवा दीं, जिसमें लिखा था
कि—‘‘जो क़समें ‘इंजील और सलीब लेकर’ भी मुसलमानों के
सामने खाई जावें, ईसाई उनके पालन करने के लिए बाध्य नहीं
हैं।” एक फ्रांसीसी लेखक, जो उस समय हैदर की सेना में मौजूद
था, लिखता है कि इस षड्यन्त्र को सफल करने के लिए अंगरेज़ों
ने गुप्त हत्या और जालसाज़ी से भी काम लिया । अंगरेज़ी जासूसों
के पास हैदर के फ्रांसीसी सिपाहियों को फोड़ने के लिए इस समय
पुद्दुचरी के फ्रांसीसी गवरनर का एक जाली ख़त भी मौजूद था ।
इस पर भी हैदर के यूरोपियन मुलाज़िमों में से, जिनमें अधिकांश
फ्रांसीसी थे, बहुत कम ने हैदर के साथ विश्वासघात किया । जिन
यूरोपियन पादरियों ने ऊपर लिखे फ़तवे पर दस्तख़त किए उनमें
से अनेक हैदर की प्रजा थे और हैदर ने उनके साथ अनेक रिआयतें
कर रक्खी थीं ।
इस समय तक यानी सन् १७६८= के अन्त से पहले पहले हैदर

३२८ भारत में अंग्रेज़ी राज
ने अपना यह तमाम इलाक़ा, जो थोड़े दिनों के लिए अंग्रेज़ों के
हाथों में चला गया था, फिर से विजय कर लिया।
किन्तु जिस समय हैदर अपनी तमाम सेना सहित मैसूर राज
की पूर्वी सरहद पर था, अंग्रेज़ों ने एक नई सेना पीछे की ओर से
हैदरअली के पच्छिमी इलाक़े मंगलोर पर हमला करने के लिए भेज
दी। इस सेना ने हैदरअली की ग़ैर मौजूदगी में एक बार आसानी
से मंगलोर पर क़ब्ज़ा कर लिया। मंगलोर विजय की ख़ुशी में
फिर एक सौ एक तोपें मद्रास के क़िले से छोड़ी गईं। हैदरअली
को अब दो ओर से अंग्रेज़ों का मुक़ाबला करना पड़ा। सामने की
ओर जनरल स्मिथ और करनल वुड की सेनाएँ और पीछे की
ओर बम्बई की सेना।
मंगलोर के पतन की ख़बर पाते ही हैदर ने अपने बेटे टीपू को
तीन हज़ार सवार देकर मंगलोर की ओर भेजा। टीपू के पीछे पीछे
हैदर खुद थोड़ी सी सेना लेकर मंगलोर की ओर रवाना हुआ।
बाक़ी सेना उसने अपने सम्बन्धी मख़दूम के अधीन स्मिथ और
वुड के मुक़ाबले के लिए पूर्वी सरहद पर छोड़ दी।
जनरल स्मिथ और करनल वुड ने हैदर की ग़ैर हाज़िरी से
पूरा लाभ उठाया। जनरल स्मिथ ने एक छोटा
सा क़िला इस समय एक बड़ी सुन्दर चाल द्वारा
मख़दूम के आदमियों से ले लिया। स्मिथ ने
अपने एक हरकारे को मख़दूम के हरकारों की सी
पोशाक पहनाई। उसके हाथ मख़दूम का एक जाली पत्र क़िलेदार


[हाशिया / Side note: पंक्तियाँ L19–L22 के बाएँ]
जनरल स्मिथ की
चाल और उसका
जवाब