भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
[Header] हैदरअली ३२६
के पास भेजा, जिसमें लिखा था कि—"अंगरेज़ी सेना तुम्हारे
क़िले पर हमला करने वाली है, इसलिए तुम्हारी मदद के लिए
पाँच सौ सिपाही आज शाम को भेजे जावेंगे, क़िले का फाटक
खुला रखना।" चाल काम कर गई और उसी दिन शाम को कम्पनी
के वरदी बदले हुए सिपाहियों ने जाकर क़िले पर क़ब्ज़ा कर
लिया। मख़दूम को जब यह बात मालूम हुई तो उसने बदला लेने
का इरादा किया। चन्द रोज़ के अन्दर ही उसने अपने कुछ सवारों
को अंगरेज़ी वर्दियाँ पहना कर क़िले के सामने भेजा। इन सवारों
में से एक ने, जो इत्तफ़ाक़ से अंगरेज़ी सेना का भागा हुआ एक
अंगरेज़ सिपाही था, आगे बढ़ कर क़िले के अंगरेज़ अफ़सर से
चिल्लाकर कहा—"हैदर की सेना हम लोगों का पीछा कर रही है।
मेरी सेना के कमांडर की प्रार्थना है कि आप फाटक खोल दीजिये,
ताकि हम सब लोग भीतर आ जावें।" यह चाल भी चल गई और
मख़दूम की सेना ने फिर से उस क़िले के ऊपर क़ब्ज़ा कर लिया।
स्मिथ और वुड दोनों की सेनाएँ मिलकर अब हैदर की ग़ैर
हाज़िरी में बंगलोर विजय करने के इरादे से आगे बढ़ीं। राजधानी
श्रीरंगपट्टन के बाद पूरब में बंगलोर और पश्चिम में मंगलोर ही
मैसूर राज के प्रधान नगर थे।
उधर मंगलोर की प्रजा ने टीपू का बड़े उल्लास के साथ
स्वागत किया। बम्बई की अंगरेज़ी सेना और
[हाशिया: मंगलोर में टीपू की शानदार विजय] टीपू की सेना में एक भयंकर लड़ाई हुई जिसमें
टीपू ने पूरी विजय प्राप्त की। अंगरेज़ सेनापति,
३३० भारत में अंगरेज़ी राज
४६ अंगरेज़ अफ़सरों, ६८० अंगरेज़ सिपाहियों और ६,००० से
ऊपर कम्पनी के हिन्दोस्तानी सिपाहियों को टीपू ने इस लड़ाई में
क़ैद कर लिया और उनके तमाम अस्त्र शस्त्र और सामान ज़ब्त
कर लिया। मंगलोर की यह लड़ाई वास्तव में अंगरेज़ों और हैदर
दोनों के लिए बड़े मार्के की लड़ाई थी। केवल तीस दिन अंगरेज़ी
सेना के क़ब्ज़े में रहने के बाद मंगलोर का क़िला और नगर टीपू
के हाथों में आ गया। नौजवान बेटे की इस शानदार विजय के एक
दिन बाद हैदर अपनी सेना सहित मंगलोर पहुँचा। फ़तह की
ख़बर सुनते ही सुलतान हैदर ने टीपू को छाती से लगा लिया और
मारे ख़ुशी के उसकी आँखों में आँसू आ गए।
मङ्गलोर में पुर्तगाली ईसाइयों के तीन गिरजे थे। ये यूरोपियन
पादरी उस समय की प्रथा के अनुसार अपने को
ब्राह्मण ईसाई “ब्राह्मण ईसाई” कहा करते थे। ब्राह्मणों के से
कपड़े पहनते थे, गले में जनेऊ डालते थे, निरामिष भोजन करते
थे, खड़ाऊँ पहनते थे और ब्राह्मणों का सा सब आचार विचार
रखते थे। इस चाल से उन्हें हिन्दू जनता को ईसाई बनाने में
आसानी होती थी। ये लोग हैदर की प्रजा थे। हैदर ने इनके साथ
अनेक रिआयतें कर रक्खी थीं। फिर भी अंगरेज़ों के मङ्गलोर पर
हमला करते समय इन तीनों गिरजों के यूरोपियन पादरियों ने हैदर
के ख़िलाफ़ उसके शत्रुओं को मदद दी। हैदर को जब इसका पता
लगा तो उसने उनका माल असबाब ज़ब्त कर लिया और उन्हें
हैदरअली ३३१
उस समय तक के लिए क़ैद कर दिया, जब तक कि हैदर और
अंगरेज़ों में सुलह न हो गई।
मङ्गलोर की विजय के बाद हैदर वहाँ की हिफ़ाज़त का
उचित प्रबन्ध कर स्वयं टीपू तथा सेना सहित
[पार्श्व-शीर्षक: हैदरअली मद्रास के फाटक पर] बङ्गलूर की रक्षा के लिए पीछे लौट आया।
इस बार हैदर ने अपनी सेना के तीन हिस्से
किए और वह तीन रास्तों से आगे बढ़ा। जनरल स्मिथ के लिए
बङ्गलूर विजय करने का इरादा स्वप्न मात्र साबित हुआ। हैदर की
सेना के लौटते ही जनरल स्मिथ और करनल वुड की सेना को
बुरी तरह हैदर की सेना के आगे आगे भागना पड़ा। अपने तमाम
इलाक़े से अंगरेज़ी सेना को फिर एक बार बाहर निकाल देने के
बाद हैदर की तीनों सेनाएँ अब अंगरेज़ों और नवाब करनाटक के
इलाक़ों में बढ़ती चली गईं। हैदरअली की सेना के मुक़ाबले में
कम्पनी की सेना के कहीं भी पैर न जम सके। नवाब मोहम्मदअली
बेहद डर गया। बढ़ते बढ़ते हैदर की सेना मद्रास के निकट पहुंचने
लगी। मद्रास का अंगरेज़ गवर्नर और उसकी कौन्सिल के मेम्बर
घबरा गए।
मद्रास की कौन्सिल ने अब कप्तान ब्रूक को हैदर के पास सुलह
के लिए भेजा। हैदर को मौक़ा मिला कि जो व्यवहार चन्द महीने
पहले अंगरेज़ों ने हैदर के दूत के साथ किया था वही अब हैदर
अंगरेज़ दूत के साथ करे। हैदर ने कप्तान ब्रूक को उत्तर दिया—
३३२ भारत में अंगरेज़ी राज
“मैं मद्रास के फाटक पर आ रहा हूँ और गवरनर और उसकी कौन्सिल
को जो कुछ कहना होगा वहीं आकर सुनूँगा।”
कप्तान ब्रूक निराश होकर मद्रास लौट आया। हैदर ने अपना
[अंगरेज़ों का] तमाम भारी सामान और माल असबाब मैसूर भेज
[भयभीत हो] दिया और खुद सेना सहित मद्रास की ओर
[जाना] बढ़ा। हैदर की तमाम सैन्य यात्राएँ अत्यन्त
आश्चर्यजनक होती थीं। विशाल सेनाओं सहित
पूरब से पच्छिम और पच्छिम से पूरब सैकड़ों मील की यात्राएँ
चन्द दिनों के अन्दर तय करना और फिर बिना आराम किए
घबराई हुई अँगरेज़ी सेना पर जा टूटना उसके लिए एक मामूली
बात थी। इस बार साढ़े तीन दिन के अन्दर उसने १३० मील का
फ़ासला तय किया और एक दिन अचानक मद्रास के क़िले से दस
मील की दूरी पर दिखाई दिया। अंगरेज़ भय से काँप उठे। हैदर
की सेना और मद्रास के बीचों बीच सेण्ट टॉमस की पहाड़ी थी।
यह वही जगह थी जिस पर टीपू एक बार क़ब्ज़ा कर चुका था।
अंगरेज़ों ने अब बड़ी फुरती के साथ इस पहाड़ी की रक्षा का
इन्तज़ाम किया और वहाँ पर अपनी सेना जमा की, ताकि हैदर
आसानी से मद्रास तक न पहुँचने पावे। किन्तु अंगरेज़ी सेना अभी
सेण्ट टॉमस पर जमने भी न पाई थी कि हैदर अपनी विशाल सेना
सहित दूर का चक्कर देकर मद्रास क़िले के दूसरी ओर के फाटक
पर आ पहुँचा। अंगरेज़ी सेना क़िले के दूसरी ओर फ़सील से दो
तीन मील के फ़ासले पर थी। अंगरेज़ों के भय की उस समय कोई
हैदरअली ३३३
सीमा न थी। हैदर यदि चाहता तो उसी दम बड़ी आसानी से
मद्रास पर क़ब्ज़ा कर सकता था और कम से कम दक्खिन भारत
से अंगरेज़ों के रहे सहे प्रभाव का ख़ात्मा कर सकता था। किन्तु
उसने कप्तान ब्रूक के साथ वादा कर लिया था कि मद्रास के फाटक
पर आकर मैं सुलह की बातचीत सुन लूँगा। पूर्वीय मर्यादा के
अनुसार उसने अपने वचन का पालन किया। उसने मद्रास के
अंगरेज़ गवर्नर को अपने पहुँचने की सूचना दी। गवर्नर ने तुरन्त
डूप्रे और बौशियर दो अंगरेज़ अफ़सरों को सुलतान हैदरअली से
सुलह करने के लिए भेजा। इन दोनों अंगरेज़ों में डूप्रे आइन्दा के
लिए मद्रास का गवर्नर नियुक्त हो चुका था और बौशियर उस
समय के गवर्नर का सगा भाई था।
हैदर ने बड़े आदर के साथ अंगरेज़ दूतों का स्वागत किया और
उनकी प्रार्थना के अनुसार सेण्ट टॉमस की पहाड़ी पर अपना
ख़ेमा लगवाया। सुलह की शर्तें लिखी जाने लगीं। हैदरअली की
उस समय की स्थिति को बयान करते हुए अंगरेज़ इतिहास लेखक
कर्नल मालेसन लिखता है :—
“वास्तव में हैदर उस समय सारी स्थिति पर हावी था। मद्रास का
देशी नगर और अंगरेज़ों के मकान सब उसकी दया पर थे। उसके आने से
सब के ऊपर इतना आतंक छा गया था कि मद्रास का क़िला भी उसके हाथों
में आ जाता। उसकी स्थिति इस समय ऐसी थी कि वह जो शर्तें चाहता,
अंगरेज़ों से मंजूर करा सकता था और वास्तव में उसने ऐसा ही किया भी।”*
- "Hyder, in fact, was master of the situation. The native town and
३३४ भारत में अंग्रेज़ी राज
१५ अप्रैल सन् १७६६ को अंगरेज़ों, सुलतान हैदरअली और
[हाशिया: सीरा के सूबेदार] अरकाट के नवाब मोहम्मदअली के दरमियान दो
[हाशिया: और बादशाह] अलग अलग सुलहनामे लिखे गए और हर
[हाशिया: तीसरे जॉर्ज में] सुलहनामे पर तीनों के दस्तख़त हुए ।
[हाशिया: सन्धि] अब तक की सन्धियाँ ईस्ट इण्डिया कम्पनी
और भारतीय नरेशों के बीच हुआ करती थीं।
हैदरअली ने कम्पनी के किसी तरह के राजनैतिक अस्तित्व ही को
स्वीकार करने से इनकार किया। इसलिए इनमें पहला सुलहनामा
इंगलिस्तान के बादशाह के नाम से, जिस तरह हैदर ने चाहा उस
तरह लिखा गया। इस सन्धि में तय हुआ कि इंगलिस्तान के
बादशाह तीसरे जॉर्ज और सीरा प्रान्त के सूबेदार हैदरअली ख़ाँ
और इन दोनों की प्रजा के बीच सदा अमन और मित्रता क़ायम
रहेगी, इत्यादि। हैदरअली का जो कुछ इलाक़ा युद्ध के शुरू में
अंगरेज़ों ने ले लिया था और जिसे हैदरअली फिर से विजय कर
चुका था, वह सब हैदरअली के पास रहा और अंगरेज़ों का जो
कुछ इलाक़ा हाल में हैदरअली ने जीत लिया था, वह उसने अंगरेज़ों
को लौटा दिया। केवल कारूड़ का प्रान्त, जो अंगरेज़ों के दोस्त
अरकाट के नवाब मोहम्मद अली के राज में शामिल था, अंगरेज़ों ने
उससे लेकर सदा के लिए हैदरअली की नज़र कर दिया। युद्ध के
the private houses of Madras were at his mercy. In the panic which his
arrival had caused, the fort itself might have fallen. He was in a position to
dictate his own terms, and, virtually, he did dictate them."—The Decisive
Battles of India, By Colonel Malleson, p. 230.
हैदर अली
[ एम० एम० डी० एल० टी० कृत फ्रेंच पुस्तक के अंगरेज़ी
संस्करण "हिस्ट्री आफ़ हैदरशाह" से ]
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हैदरअली ३३५
ख़र्च और ज़ुरमाने के तौर पर एक बहुत बड़ी रक़म अंगरेज़ों ने
हैदरअली को भेंट की और यह तय हुआ कि भविष्य में यदि
कोई तीसरा हैदरअली पर हमला करेगा तो अंगरेज़ हैदरअली की
मदद करेंगे और यदि कोई अंगरेज़ों पर हमला करेगा तो हैदरअली
उनको मदद करेगा ।
दूसरे सुलहनामे में, जो हैदरअली और मोहम्मदअली के
[हैदरअली और] दरम्यान था, यह तय हुआ कि मोहम्मदअली
[अरकाट के नवाब] अरकाट का नवाब बना रहे; किन्तु आइन्दा
[में सन्धि] से अरकाट का नवाब मैसूर का सामन्त समझा
जावे, छै लाख रुपए सालाना बतौर ख़िराज
मैसूर दरबार को अदा किया करे, और पहले साल का ख़िराज
पेशगी इसी समय अदा किया जावे ।
दोनों सन्धियों के पालन की ज़िम्मेदारी अंगरेज़ों ने अपने
ऊपर ली और इन सब बातों के अलावा हैदरअली के एक जहाज़
के बदले में, जो उन्होंने युद्ध के शुरू में धोखे से बम्बई में ले लिया
था, अंगरेज़ों ने एक नया युद्ध का जहाज़ पचास तोपों सहित हैदर
को भेंट करने का वादा किया ।
इस युद्ध ने साबित कर दिया कि हैदर की वीरता, उसका
युद्ध कौशल और उसकी उदारता तीनों ही ऊँचे दर्जे की थीं और
अंगरेज़ किसी तरह भी उसके मुक़ाबले में न ठहर सकते थे ।
दक्खिनी भारत में अंगरेज़ों की अब काफ़ी दुर्दशा हो चुकी
३३६ भारत में अंगरेज़ी राज
थी। एक फ़्रांसीसी इतिहास लेखक लिखता है कि इस विजय के
[मद्रास क़िले के] अवसर पर हैदर ने अंगरेज़ों से कहकर मद्रास
[फाटक पर एक] के सेण्ट जॉर्ज क़िले के सदर फाटक पर एक चित्र
[चित्र] बनवाया, जिसमें हैदर एक शामियाने के नीचे
तोपों के ढेर के ऊपर बैठा हुआ है, पीछे की ओर
सेण्ट जॉर्ज का क़िला है जिसकी फ़सील पर गवर्नर और उसकी
कौन्सिल के सब अंगरेज़ मेम्बर दोज़ानू बैठे हुए हैदर की ओर
अपने हाथ बढ़ा रहे हैं। अंगरेज़ दूत डूप्रे और बौशियर दोनों हैदर
के सामने ज़मीन पर दोज़ानू बैठे हैं। डूप्रे के नाक की जगह हाथी
की सी सूँड बनी हुई है, हैदर उसकी सूँड को पकड़े हुए है और
उसमें से अशरफ़ियाँ हैदर के सामने खनाखन ज़मीन पर गिर रही हैं।
दूसरी ओर पराजित अंगरेज़ सेनापति जनरल स्मिथ सन्धि पत्र
हाथ में लिए हुए अपने हाथ से अपनी तलवार के दो टुकड़े कर
रहा है।
इस सन्धि का यहाँ तक असर हुआ कि इंगलिस्तान में उसकी
[कम्पनी के हिस्सों] ख़बर पहुँचते ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हिस्सों
[की दर का गिरना] की दर एकदम गिर कर ४० फ़ी सदी रह गई।
युद्ध के दिनों में ही जैसे जैसे हैदर और टीपू की
विजयों की ख़बरें इंगलिस्तान पहुँचती जाती थीं, कम्पनी के हिस्सों
की दर गिरती जाती थी। इस पर डाइरेक्टरों ने बार बार मद्रास
के अधिकारियों पर ज़ोर दिया कि हैदर के साथ सुलह कर ली
जावे। किन्तु अब सुलह हो जाने पर उन्हीं डाइरेक्टरों ने मद्रास
हैदरअली ३३७
के गवर्नर को लिखा कि जिस तरीक़े से आपने सन्धि की है
उससे—
"आपने हिन्दोस्तान में रहने वाले लोगों के लिए यह समझने की
बुनियाद डाल दी है कि वे जब उनका जी चाहे बेखटके कम्पनी की हतक कर
सकते हैं।"
दोनों सन्धि पत्रों पर कम्पनी की मोहरें लग चुकी थीं, किन्तु
इसके बाद से ही अंगरेज़ों ने सन्धि को तोड़ने के मौक़े ढूंढ़ने शुरू
कर दिए।
थोड़े दिनों बाद मराठों ने चौथी बार मैसूर पर हमला किया।
[हाशिया: मराठों का मैसूर पर हमला और अंगरेज़ों का सन्धि को तोड़ना] हैदर ने सन्धि की शर्तों के अनुसार अंगरेज़ों से
मदद चाही। ऐन मौक़े पर मद्रास कौन्सिल ने
मदद देने से इनकार कर दिया। मजबूर होकर
हैदर ने कुछ धन और अपना कुछ इलाक़ा
मराठों को देकर उनसे पीछा छुड़ाया। किन्तु
अंगरेज़ों की नीयत का उसे पता चल गया।
इसके बाद हैदर ने कुर्ग के राजा को, जो पहले मैसूर का
बाजगुज़ार रह चुका था और अब बाग़ी हो गया था, युद्ध द्वारा
फिर से अपने अधीन किया।
हैदर को अपना जो इलाक़ा मराठों को देना पड़ गया था वह
उसकी नज़रों में खटक रहा था। वह पूना दरबार की अवस्था की
पूरी ख़बर रखता था। जब उसे पेशवा नारायणराव की हत्या और
राघोबा और अंगरेज़ों की साज़िशों की ख़बर मिली तो उसने इस
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३३८ भारत में अंगरेज़ी राज
इलाक़े को मराठों से वापस लेने के लिए अपने बेटे टीपू को सेना
सहित भेजा। टीपू ने वह सारा इलाक़ा फिर मराठों से विजय कर
लिया। इसके बाद सन् १७७८ में छै साल के लिए मराठों और
हैदर में सन्धि हो गई।
अंगरेज़ों और हैदर के दरमियान जो सन्धि हुई थी उसका
उल्लंघन हैदर पर मराठों के हमले के समय अंगरेज़ कर ही चुके थे।
दूसरी सन्धि मोहम्मदअली और हैदर के दरमियान थी। उसके
पालन की ज़िम्मेदारी भी अंगरेज़ों ने अपने ऊपर ली थी। किन्तु
मोहम्मदअली का अंगरेज़ों के पंजे से निकल कर मैसूर का
बाजगुज़ार हो जाना अंगरेज़ों के लिए बहुत बुरा था। इसलिए
सन्धि के बाद उन्होंने अपने वादे को पूरा करने के बजाय नवाब
मोहम्मदअली को हैदरअली के ख़िलाफ़ भड़काए रक्खा। मैसूर
की अन्य सामन्त रियासतों को भी उन्होंने अब हैदरअली के
ख़िलाफ़ भड़काना शुरू किया। इनमें एक छोटी सी रियासत
चित्तलद्रुग की थी। अंगरेज़ों ने वहाँ के राजा को भड़काकर उससे
हैदर के ख़िलाफ़ बगावत करवा दी। हैदर ने चित्तलद्रुग पर हमला
करके राजा को फिर से अपने अधीन कर लिया। इस लड़ाई में ही
हैदर ने अंगरेज़ों की बेवफ़ाई का पूरा परिचय पाकर खुले एलान कर
दिया कि मैं अंगरेज़ी इलाक़े पर हमला करने वाला हूँ। उसने फिर
एक बार दक्खिन के अन्दर मुग़ल दरबार के मुख्य नायब निज़ाम
से मदद की प्रार्थना की। निज़ाम ने फिर मदद का वादा किया
और फिर दूसरी बार ऐन मौक़े पर हैदर के साथ दग़ा की।
हैदरअली ३३६
अब वह समय आया जब कि नाना फड़नवीस ने अंगरेज़ों की
चालों और उनसे देश की हानि को अच्छी तरह
हैदर और नाना समझ कर सन् १७८० में अपना एक दूत
फड़नवीस में गणेशराव हैदर के पास मेल करने के लिए भेजा ।
अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ हैदर को भी अंगरेज़ों के चरित्र का काफ़ी अनुभव
सन्धि हो चुका था । हैदर और नाना फड़नवीस दोनों
में ख़ास समझौता हो गया । 'चौथ' की उस रक़म को, जो मैसूर
दरबार से पेशवा दरबार को मिला करती थी और जिस पर
मराठों और हैदर में अनेक बार झगड़े हो चुके थे, आइन्दा के लिए
नाना ने बहुत कम कर दिया । हैदर का जो इलाक़ा पहले मराठों ने
ले लिया था और हाल में टीपू ने मराठों से विजय किया था उसे
पेशवा दरबार ने हैदर ही का इलाक़ा स्वीकार कर लिया, और
हैदर ने मराठों से वादा किया कि अंगरेज़ों को हिन्दोस्तान से बाहर
निकालने में मैं आप लोगों की पूरी मदद करूँगा ।
अंगरेज़ों को जब इस सन्धि का पता चला और मालूम हुआ
कि हैदर अंगरेज़ी इलाक़े पर फिर से हमला करने की तैयारी कर
रहा है तो उन्होंने मद्रास से एक दूसरे के बाद दो दूत दोबारा
सन्धि करने के लिए हैदर के दरबार में भेजे । किन्तु हैदर अंगरेज़ों
को पूरी तरह समझ चुका था, उसने स्वीकार न किया । अंगरेज़
दूत ग्रे को उसने अंगरेज़ों की दग़ाबाज़ी पर लानत मलामत की और
अपने यहाँ उसके साथ वह सलूक किया जो एक राजदूत के साथ
नहीं, बल्कि किसी जासूस के साथ किया जाता है ।
३४० भारत में अंगरेज़ी राज
नवाब मोहम्मदअली अंगरेज़ों के ख़ास मददगारों में से था।
[हाशिया: हैदरअली का] अंगरेज़ों के बहकाने से मोहम्मदअली ने हैदर
[हाशिया: करनाटक विजय] अली के साथ सन्धि के पालन करने से इनकार
[हाशिया: करना] कर दिया। करनाटक के मामले में अंगरेज़
बराबर दख़ल देते रहते थे, जिसकी वजह से करनाटक की प्रजा
अत्यन्त दुखी और असन्तुष्ट थी। हैदरअली अपनी सेना सहित
जुलाई सन् १७८० में सब से पहले करनाटक की ओर बढ़ा।
करनाटक के क़िलों की रक्षा के लिए जगह जगह कम्पनी की सेनाएँ
नियुक्त थीं। यह सब सेनाएँ कर्नल कॉस्बी के अधीन थीं।
हैदरअली ने पहले की तरह अपनी सेना के कई हिस्से किए और
एक हिस्सा अपने अधीन, दूसरा अपने बड़े बेटे टीपू के, तीसरा
टीपू के छोटे भाई करीम साहब के और बाक़ी छोटे बड़े दस्ते
अन्य योग्य हिन्दू और मुसलमान सेनापतियों के अधीन करनाटक
के अनेक क़िलों को विजय करने के लिए अलग अलग दिशाओं
में रवाना कर दिए। करनाटक की दुखी प्रजा ने बड़े हर्ष के
साथ हर जगह हैदर का स्वागत किया। कर्नल कॉस्बी और
नवाब मोहम्मदअली की सेनाओं से जगह जगह हैदर की
लड़ाइयाँ हुईं, जिनमें अंगरेज़ों को हार पर हार खानी पड़ी। नवाब
मोहम्मदअली और उसके अंगरेज़ साथी हैदर की बढ़ती हुई बाढ़
को न रोक सके। क़िले पर क़िला और इलाक़े पर इलाक़ा हैदर के
हाथों में आता चला गया। इनमें एक मुख्य महमूद बन्दर का
क़िला था जिसे अब पोर्टो नोवो कहते हैं। महमूद बन्दर उन दिनों
हैदरअली ३४१
भारत की विदेशी तिजारत का एक ज़बरदस्त केन्द्र था। दूर दूर
के व्यापारी वहाँ पर जमा होते थे और करोड़ों रुपए का माल
महमूद बन्दर की मण्डियों में भरा रहता था। अंगरेज़ी सेना
महमूद बन्दर की रक्षा के लिए मौजूद थी। करीम साहब ने सेना
सहित महमूद बन्दर पर हमला करके उसे अंगरेज़ी सेना से विजय
किया। क़िले और नगर पर क़ब्ज़ा कर लिया और वहाँ से करोड़ों
का माल लाकर अपने बाप के सामनें पेश किया। इसी तरह की
अनेक विजय टीपू और दूसरे सेनापतियों ने कीं। यहाँ तक कि
स्वयं हैदरअली की सेना बढ़ते बढ़ते करनाटक की राजधानी
अरकाट के निकट जा पहुँची और नवाब मोहम्मद अली को भाग
कर मद्रास में पनाह लेनी पड़ी।
१० अगस्त सन् १७८० को हैदर के कुछ सवार बढ़ते बढ़ते
मद्रास के निकट फिर सेण्ट टामस की पहाड़ी
[हैदरअली फिर] पर जा पहुँचे। हैदर की मुख्य सेना अभी तक
[मद्रास की ओर] करनाटक की राजधानी के आसपास थी, तब
भी मद्रास फिर ख़तरे में था। दो बड़ी सेनाएँ हैदर को परास्त
करने के लिए तैयार की गईं। इनमें पहली जनरल मनरो के अधीन
मद्रास से रवाना हुई और दूसरी कर्नल बेली के अधीन गुण्टूर से
राजधानी अरकाट की ओर चली। इनके अलावा तीन नई सेनाएँ
गुण्टूर, पुदुडुचरी और त्रिचन्नपल्ली में तैयार की गईं।
हैदर ने सबसे पहले टीपू को कर्नल बेली के मुक़ाबले के लिए
गुण्टूर की ओर रवाना किया। मार्ग में १० सितम्बर सन् १७८०
३४२ भारत में अंगरेज़ी राज
को पूरिमपाक में टीपू और करनल बेली की सेनाओं में लड़ाई
पूरिमपाक की हुई। जनरल मनरो ने अपना एक दस्ता बेली
लड़ाई की सहायता के लिए भेजा। उधर हैदर भी
रातों रात चल कर टीपू की सहायता के लिए
आ पहुँचा। मैदान ख़ूब गरम हुआ, टीपू की सेना ने सामने और
पीछे दोनों ओर से अंगरेज़ी सेना पर हमला करके और उनके बीच
में घुसकर अंगरेज़ी सेना का संहार शुरू किया। यहाँ तक कि
अंगरेज़ी सेना का तोपखाना बेकार हो गया। अन्त में उनके
तोपख़ाने में आग लग गई और अंगरेज़ी सेना को बुरी तरह हार
खानी पड़ी। लिखा है कि इस लड़ाई में कम्पनी के हज़ारों भारतीय
सिपाहियों के अलावा सात सौ अंगरेज़ मारे गए और दो हज़ार
को जिनमें स्वयं करनल बेली और सर डेविड बेयर्ड जैसे अफ़सर
शामिल थे हैदर ने गिरफ़्तार कर लिया। अंगरेज़ों के लिए
पूरिमपाक की हार अत्यन्त अशुभसूचक और लज्जाजनक थी।
हैदर ने अपनी राजधानी श्रीरङ्गपट्टन में दरियादौलत नामक बाग़
की दीवारों पर इस लड़ाई का एक विशाल सुन्दर चित्र खिंचवाया
जो अभी तक मौजूद है।
जनरल मनरो इस समय अपनी सेना सहित गञ्जी स्थान में
ठहरा हुआ था। विजयी हैदर ने गुण्टूर की
अरकाट की विजय अंगरेज़ी सेना को ख़त्म करके गञ्जी की ओर रुख़
किया। हैदर अभी गञ्जी से कुछ मील दूर ही था कि करनल बेली
की पराजय का हाल सुनकर और हैदर के सवारों को अपनी ओर
टीपू की सैन्य यात्रा
इस यात्रा और पोलिलूर के संग्राम के शेष चित्र
जिल्द के अन्त में पाकेट में हैं
[ सुपरिन्टेण्डेण्ट गवर्नमेण्ट गार्डन्स मैसूर की कृपा द्वारा, दरिया दौलत बाग़
के तत्कालीन चित्र से ]
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हैदरअली ३४३
बढ़ते हुए देख कर जनरल मनरो का साहस टूट गया । उसे हैदर
के मुक़ाबले की हिम्मत न हो सकी । उसने अपनी तोपें और तमाम
भारी सामान गञ्जी के एक बड़े भारी तालाब में फेंक दिया और
स्वयं अपनी सेना सहित पीछे हटकर मद्रास में पनाह ली। हैदर
ने पहले गञ्जी में पड़ाव किया, आसपास के कुछ क़िलों को फ़तह
किया और फिर उस तमाम इलाक़े के शासन और रक्षा का
उचित प्रबन्ध कर पीछे लौटकर राजधानी अरकाट का मोहासरा
शुरू कर दिया ।
तीन महीने तक अरकाट का मोहासरा जारी रहा। इस
मोहासरे में दोनों ओर काफ़ी जानें [**] । हैदर का दामाद सय्यद
हाफ़िज़ अली ख़ाँ भी अरकाट ही के मैदान में काम आया । अन्त
में हैदरअली की सेना ने अरकाट के क़िले और नगर दोनों पर
क़ब्ज़ा कर लिया ।
विजय के सबेरे हैदरअली ने अरकाट के बाज़ारों और गलियों
[हैदरअली की] में एलान करवा दिया कि नगर निवासियों के
[उदारता] जान माल पर कोई किसी तरह का हमला न
करे, कोई किसी ग़रीब को किसी तरह का कष्ट
न दे और मैसूर की सेना का कोई सिपाही न किसी के धन को
हाथ लगावे और न किसी स्त्री की ओर आँख उठाकर देखे।
अरकाट के बचे हुए अंगरेज़ों को उसने अपनी गारद के साथ
हिफ़ाज़त से मद्रास भिजवा दिया। अपने एक आदमी मीर सादिक़
- Colonel W. Miles' History of Hyder, p. 395.
३४४ भारत में अंगरेज़ी राज
को शहर और उसके आसपास के इलाके का सूबेदार नियुक्त कर
दिया। शहर के अधिकांश कर्मचारियों को अपने अपने ओहदों पर
बहाल रक्खा और क़िले की मरम्मत तथा रक्षा और नगर के
शासन का उचित प्रबन्ध कर दिया।
हैदर की विजयों की एक विशेषता यह थी कि वह जिन
इलाकों को फ़तह करता था वहाँ के क़िलों की मरम्मत, हिफ़ाज़त
और शासन का प्रबन्ध करके आगे बढ़ता था। हैदर हर जगह
इस बात का ख़ास इन्तज़ाम रखता था कि उसके सिपाही प्रजा
के ऊपर किसी तरह का अत्याचार न करें। वह अक्सर विजय
के बाद ग़रीबों, साधुओं और धार्मिक संस्थाओं में धन तक़सीम
किया करता था। यही व्यवहार हैदर के अन्य सेनापतियों का
होता था।
जिन अनेक स्थानों और क़िलों को अरकाट की विजय से
[पार्श्व-शीर्षक: हैदर अली और टीपू] पहले और उसके बाद, हैदर की सेना ने अंगरेज़ी
[पार्श्व-शीर्षक: की अनेक विजय] सेना से एक दूसरे के बाद विजय किया उन
सब का बयान यहाँ कर सकना नामुमकिन है।
हैदर के सेनापति मीर मुइउद्दीन ने दस दिन के मोहासरे के
बाद चितोर के क़िले को फ़तह किया और फिर चन्दरगिरि
के क़िले को जीत कर नवाब मोहम्मदअली के भाई अब्दुलवहाब
ख़ाँ को क़ैद किया। टीपू ने एक महीने के अन्दर महीमण्डलगढ़,
कैलाशगढ़, सातगढ़ इत्यादि अनेक मज़बूत क़िले फ़तह किए।
टीपू हर जगह अपने बाप के समान क़िले की पराजित सेना से