भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैदरअली ३१३
शोभा समझे जाते थे। महाराजा का अधिकांश समय महल के
'दैव' की पदवी अन्दर पूजा पाठ और अन्य धार्मिक क्रियाओं में
व्यतीत होता था। यहाँ तक कि महाराजा साल
में केवल दो बार अपनी प्रजा के सम्मुख आता था। शासन के काम
से उसे किसी तरह का सम्बन्ध न था। समस्त शासन प्रधान मन्त्री
के सुपुर्द था, जिसे 'दैव' या 'दलवाई' कहते थे। दैव ही राज का
क्रियात्मक स्वामी होता था। दैव की गद्दी पैतृक थी। यह रिवाज
कई पीढ़ियों से चला आता था। पिछले युद्ध में मैसूर का दैव
नन्दीराज हैदरअली की योग्यता और वीरता को देख कर इतना
खुश हुआ कि सन् १७५५ में उसने हैदरअली को डिण्डीगल
का फ़ौजदार नियुक्त कर दिया। इस युद्ध में ही हैदरअली ने
फ्रांसीसियों की सैनिक व्यवस्था और उनकी क़वायद को अच्छी
तरह देखा और डिण्डीगल में फ़ौज को क़वायद सिखाने के लिए
कुछ फ्रांसीसी अफ़सर नौकर रक्खे। अपने तोपखाने में भी उसने
कुछ फ्रांसीसी कारीगर नियुक्त किए।
धीरे धीरे हैदरअली का बल बढ़ता गया। यहाँ तक कि वह
रियासत का प्रधान सेनापति हो गया। थोड़े
हैदरअली का 'दैव' दिनों बाद मैसूर दरबार के मंत्रियों में आपसी
नियुक्त होना झगड़े बढ़े। खांडेराव ने किसी तरह साज़िश
कर नन्दीराज को गद्दी से अलग कर अपने को मैसूर का 'दैव'
नियुक्त करा लिया। लिखा है कि राजधानी श्रीरंगपट्टन की
प्रजा खांडेराव से बहुत असन्तुष्ट थी। खांडेराव एक मराठा