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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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हैदरअली ३१६
अरकाट का नवाब अंगरेज़ों से मिल चुका था और निज़ाम भी
हैदरअली को धोखा देता हुआ मालूम होता था। दूसरे उन दिनों
मराठों के हमले का हैदरअली को बराबर डर लगा रहता था।
तीसरे स्वयं मैसूर में उसका शासन अभी हाल ही का जमा हुआ
था और वह बहुत दिनों तक राजधानी से दूर न रह सकता था।
इन सब बातों से मजबूर होकर सितम्बर सन् १७६८ में हैदरअली
ने अंगरेज़ों से सुलह की बात चीत शुरू की।
अंगरेज़ों को इससे विश्वास हो गया कि हैदरअली की हालत
कमज़ोर है और हम आसानी से उसके सारे इलाके को फ़तह कर
लेंगे। उन्होंने अपमान के साथ हैदरअली के दूत को अपने यहाँ से
लौटा दिया। किन्तु हैदर कायर न था, उसने अब ज़ोरों के साथ
युद्ध की तैयारी शुरू की। नवम्बर सन् १७६८ में अंगरेज़ों को मैसूर
राज्य से बाहर निकालने के लिए उसने अपने एक सेनापति
फ़ज़लुल्लाह ख़ाँ को सेना सहित रवाना किया। इसके बाद हैदर
ख़ुद सेना लेकर आगे बढ़ा।
सब से पहले उसने अपने उन क़िलों को फिर से एक एक कर
विजय करना शुरू किया, जिन पर अंगरेज़ी सेना
[हाशिया: हैदरअली की विजय] ने क़ब्ज़ा कर लिया था। इनमें कावेरीपट्टम का
[हाशिया: और शत्रु के साथ] क़िला एक मुख्य क़िला था। हैदरअली ने उसका
[हाशिया: उसकी उदारता] मोहासरा शुरू किया। अंगरेज़ों ने अपनी तोपों
से क़िले की रक्षा का पूरा प्रबन्ध कर रक्खा था। हैदरअली की
तोपों ने क़िले के बाहर से गोलाबारी शुरू की। क़रीब तीन घंटे की