भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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हैदरअली ३२५
है कि आप फ़ौरन लौटकर सुलतान से जा मिलें । इस छल के बाद
इसी दूत ने टीपू की सेना से निकल कर आगे बढ़कर मद्रास के
अंगरेज़ों को विजय की सूचना दी, जिसकी झूठी खुशी में एक सौ
एक तोपें मद्रास के क़िले से छोड़ी गईं ।
नातजरुबेकार टीपू ने धोखे में आकर अपने सेनापतियों से
सलाह की । सब की सलाह यही हुई कि इस हालत में मद्रास के
क़िले का मोहासरा करना ठीक नहीं। टीपू अपनी सेना सहित
पीछे लौटकर पिता से आ मिला ।
माँ के जाने के दूसरे दिन हैदरअली वनियमबाड़ी के क़िले की
[हाशिया: वनियमवाड़ी में हैदर की विजय] ओर बढ़ा । वनियमवाड़ी का क़िला भी एक
निहायत मजबूत क़िला था, किन्तु हैदर की
चन्द घण्टे की गोलाबारी ने क़िले की अंगरेज़ी
तोपों को ठण्डा कर दिया । क़िले के अंगरेज़ अफ़सर ने सफ़ेद
झण्डा गाड़ दिया । हैदर की सेना ने क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया ।
हैदर ने क़िले के तमाम अंगरेज़ अफ़सरों और सिपाहियों को उनसे
यह वादा कराकर छोड़ दिया कि हम लोग कम से कम एक साल
तक किसी लड़ाई में आपके ख़िलाफ़ न लड़ेंगे ।
इस क़िले की रक्षा का उचित प्रबन्ध करके हैदरअली आम्बूर
[हाशिया: पीरज़ादा ख़ाकी शाह] की ओर बढ़ा । आम्बूर के मोहासरे में हैदरअली
का एक प्रसिद्ध मित्र पीरज़ादा ख़ाकीशाह घायल
होकर मर गया । यह पीरज़ादा एक मुसलमान
फ़क़ीर था, जो अक्सर हैदर की सेना के साथ रहा करता था ।