भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 592, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंसफेद झंडा फसील पर गड़ा हुआ था, क़िले में घुस कर वहाँ के
क़िलेदार, उसके बालबच्चों और एक एक सिपाही को जो हथियार
रख चुके थे क़त्ल कर दिया, और यह सब अंगरेज़ सेनापति की
आज्ञा से किया गया ।
कावेरीपट्टम के बाद हैदरअली ने अपने बाकी क़िलों को भी एक
एक कर अंगरेज़ों से विजय किया । इन तमाम लड़ाइयों और
मोहासरों का बयान करना यहाँ पर अनावश्यक है। इन लड़ाइयों
में जनरल स्मिथ की सेना को काफ़ी ज़िल्लत के साथ पीछे भागना
पड़ा । जगह जगह उसे अपना माल असबाब पीछे छोड़ देना पड़ा,
अपनी तोपें और गोला बारूद तालाबों और नदियों में फेक देना
पड़ा और कहीं कहीं अपने मुर्दों तक को बिना दफ़नाए मैदान में
छोड़ कर भागना पड़ा । किन्तु अपनी तमाम लड़ाइयों में हैदर का
यह एक नियम था कि वह आगे बढ़ने से पहले शत्रु के मुर्दों को
जमा करके यथा विधि दफ़ना दिया करता था ।
हैदर के बड़े बेटे फ़तहअली टीपू की आयु इस समय १८ वर्ष
[हाशिया: टीपू का मद्रास पर हमला] की थी । टीपू अपने बाप के साथ मैदान
में मौजूद था । हैदर स्वयं जनरल स्मिथ को
अपनी सरहद से बाहर निकालने के लिए पीछे
रहा और टीपू को उसने पाँच हज़ार सवार देकर एक दूसरे
रास्ते मद्रास की ओर भेजा । टीपू अपनी सेना सहित इस
तेज़ी के साथ आगे बढ़ा कि मद्रास का गवरनर और उसकी
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