भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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और इनके अलावा पालकी के आगे आगे दो सौ स्त्रियाँ बुरक़े पहने
हुए घोड़ों पर सवार थीं। कहा जाता है कि माँ के ख़ेमे में उतरते
ही हैदर ने हैरान होकर पूछा—"आप इतना कष्ट उठाकर इस समय
यहाँ कैसे आईं ?" बूढ़ी माँ ने उत्तर दिया—"बेटा, मैं यह देखना
चाहती थी कि तुम अपनी पराजय को कितने धैर्य के साथ सह
सकते हो।" हैदर ने जवाब में अपनी हिम्मत दिखलाते हुए माँ को
विश्वास दिलाया कि वह पराजय कोई पराजय ही न थी। इस पर
माँ ने उत्तर दिया—"ख़ूब, बहुत ख़ूब, अगर यही बात है तो ख़ुदा
का शुक्र है और मैं फ़ौरन लौट जाऊँगी, ताकि मेरे रहने से तुम्हारे
काम में रुकावट न पड़े।" अपने पहुँचने के ठीक तीसरे रोज़ हैदर
की बूढ़ी माँ बेटे को दुआ देकर हैदरनगर की ओर लौट गई।
निस्सन्देह इस प्रकार की वीर माता ही हैदर जैसे वीर पुत्र को
जन्म दे सकती थी।
टीपू मद्रास के क़िले से केवल एक कोस की दूरी पर था। उस
समय के उल्लेखों से ज़ाहिर है कि टीपू के लिए
टीपू के साथ छल उस समय मद्रास विजय कर सकना कुछ भी
मुश्किल न था। जनरल स्मिथ ने त्रिनमल्ली की विजय के बाद
टीपू को पीछे हटाने की एक ख़ासी सुन्दर चाल चली। उसने एक
साँडनी सवार फ़ौरन मद्रास की ओर भेजा। इस सवार ने टीपू
की सेना में पहुँच कर यह ज़ाहिर किया कि मुझे सुलतान हैदरअली
ने अपने बेटे की ख़बर लेने के लिए भेजा है। टीपू को उसने
त्रिनमल्ली की पराजय की ख़बर दी और कहा कि सुलतान का हुकुम