भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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अपनी मुसीबत की इतला दी। हैदर साहब ने फ़ौरन धन भेजकर
शहबाज़, हैदरअली और उनकी माँ तीनों को छुड़वाया और उन्हें
श्रीरंगपट्टन में बुलवाकर बड़े आदर और प्रेम से अपने पास रक्खा।
यहाँ पर शुरू से ही शहबाज़ और हैदरअली दोनों को घोड़े की
सवारी, निशानेबाज़ी, शस्त्रों का उपयोग और युद्ध विद्या की पूरी
तालीम दी गई। बालिग़ होने पर शहबाज़ और हैदरअली दोनों
भाई मैसूर की फ़ौज में भरती हो गए।
मैसूर की हिन्दू रियासत दिल्ली सम्राट की आज्ञानुसार मराठों
को ‘चौथ’ दिया करती थी। इस एक बात के अलावा और सब
तरह अपने भीतरी शासन में मैसूर की रियासत स्वाधीन थी।
दक्खिन के सूबेदार निज़ामुलमुल्क को मैसूर दरबार के ऊपर किसी
तरह का क्रियात्मक आधिपत्य प्राप्त न था।
सन् १७४८ ई० में हैदराबाद के निज़ाम का देहान्त हुआ।
मृत्यु से पहले निज़ाम ने मुज़फ़्फ़रजंग को अपना उत्तराधिकारी
नियुक्त कर दिया। अंगरेज़ों ने एक दूसरे मनुष्य नाज़िरजंग को
हक़दार खड़ा कर दिया और उसका पक्ष लेकर लड़ना शुरू किया।
फ़्रांसीसियों और मैसूर दरबार ने मुज़फ़्फ़रजंग का साथ दिया।
अन्त में मुफ़्फ़फ़रजंग ही की विजय रही। इन लड़ाइयों में हैदर
अली का बड़ा भाई शहबाज़ मैसूर की ओर से लड़ रहा था। उसके
अधीन दो सौ सवार और एक हज़ार पैदल थे। हैदरअली उस
समय अपने भाई के अधीन एक मामूली घुड़ सवार था।
मैसूर के महाराजा एक अरसे से सिंहासन की केवल एक