भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ५७
प्रथम अहिंसाही सुन लीजै । मनकरि काहू दोष न कीजै ॥
कड़ुवा वचन कठोर न कहिये । जीवघात तनसों नहिं दहिये ॥
तन मन वचन न कर्म लगावै । यही अहिंसाधर्म कहावै ॥
दूजे सत्य सत्यही बोले । हिरदै तौलि वचन मुख खोलै ॥
तीजे असते त्याग सुनीजै । तनमन सों कछु नाहिं हरीजै ॥
तन चोरी के लक्षण नाखै । मनकी चोरी को नहिं राखै ॥
चौथा ब्रह्मचर्य बतलाऊं । भिन्न भिन्न करि ताहि सुनाऊं ॥
दो० ब्रह्मचर्य यासों कहैं, सुनहु चरणही दास ।
आठ अंगैं सो नारिकी, नेक न राखै आस ॥
यती होय दृढ़ काँछ गहीजै । वीर्य क्षीण नहिं होने दीजै ॥
मैथुन कहूँ अष्ट परकारा । ब्रह्मचर्य रहै इनसे न्यारा ॥
सुमिरणतियाको नहि करिये । श्रवणनसुरति रूप नहिं धरिये ॥
रस शृंगार पढ़े नहिं गावै । नारिनसों नहिं हँसै हँसावै ॥
दृष्टि न देखे विष नहिं दौरै । मुख देखै मन होजा औरै ॥
बात इकन्त करै नहिं कबहीं । मिलन उपाय जुत्यागै सबहीं ॥
स्पर्शअष्टम निकट न जावै । कामजीति योगी सुखपावै ॥
अष्टप्रकारके मैथुन जानों । इन्हें तजे ब्रह्मचर्य पिछानों ॥
कहैं शुकदेव चरणहीदासा । ब्रह्म सत्य में करै निवासा ॥
दो० पँचवीं सुखदाई क्षमा, जलन बुझावै सोय ।
जोटुक आवै घटविषे, पातक डारै खोय ॥
१ विद्या पढ़ना व्रत करना नित्यकर्म संध्यावन्दनादि करना भिक्षा मांगि
कर भोजन बनाय गुरु को नैवेद्य लगाय भोजन करना इसे ‘ब्रह्मचर्य कहते
हैं २ स्मरण, सुरति, शृङ्गारावलोकन, हास्य करना, दृष्टि सों त्रिया रूप
देखना, मिलन उपाय, स्पर्श, एकान्त में वार्त्तालाप करना ये अष्टाङ्ग विषय
के कहलाते हैं ॥
५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोई दुष्ट कछू कहिजावो । गाली देकर कोइ खिझावो ॥
कै कोइ शिरपर कूड़ा डारो । कै कोइ दुखदेबो अरु मारो ॥
बाकी कछू न मनमें लावै । उलटा उनको शीश नवावै ॥
ऐसी क्षमा हिये में लावो । बोलौ शीतल अग्नि बुझावो ॥
छठाँ अंग धीरज का जानौ । धीरजही हिरदय में आनौ ॥
योगयुक्ति धीरज सों कीजै । सब कारज धीरज सों लीजै ॥
धीरज सों बैठै अरु डोलै । धीरज राखि समुझिकर बोलै ॥
आनि परै दुख ना अकुलावै । धीरज सों दृढ़ता गहिलावै ॥
दो० धीरज रहा तौ सब रहा, काहूसे न डराय ।
सिंह प्रेत अरु कालका, धीरज सों डरजाय ॥
दया सातवीं अब सुनि लीजै । सब जीवन की रक्षा कीजै ॥
लख चौरासी का सुखदाई । सबके हित की कहै बनाई ॥
रहिये तन मन बचन दयाला । सबही सों निर्वैर कृपाला ॥
अठवै कहूँ आर्य्यवै खोलै । कोमलहृदय सों कोमलबोलै ॥
सबको कोमल दृष्टि निहारै । कोमलता तन मन में धारै ॥
कोमल धरती बीज बवावै । बढ़े बेगि फूलै फल लावै ॥
ऐसे कोमल हिया बनावै । योग सिद्धि करि पद पहुँचावै ॥
यही आर्य्यव लक्षण जानो । शुकदेवकहैं रणजीतपिछानो ॥
दो० मिताहार जो नवें की, समझ लेहु मनमाहि ।
सतगुन भोजन खाइये, ऐसा वैसा नाहिं ॥
खावै अन्न विचारिकै, खोंटा खरा सँभार ।
जैसाही मन होत है, तैसा करै अहार ॥
सूक्ष्म चिकना हलका खावै । चौथाभाग छोड़ि करि पावै ॥
वानप्रस्थ कै हो संन्यासै । भोजन सोलह ग्रास गिरासै ॥
अरु गृहस्थ बत्तीस गिरासा । आव नींद न बहुत न श्वासा ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ५६
ब्रह्मचारी भोजन करै इतना । पठनमाहिँबीरजरहै जितना ॥
दशवां शौच पबित्तर रहिये । कर दातौन हमेश नहइये ॥
जो शरीर में होवै रोगा । रहै न तन जल छूवन योगा ॥
तौ तन माटी से शुधि कीजै । अबअंतरकी शुधि सुनलीजै ॥
राग द्वेष हिरदय सों टारै । मन सों खोटे कर्म निवारै ॥
दो० दशप्रकारका कहा यह, पहिल योगकी नीव ।
नेम कहूं अब - दूसरा, सो है साधन सीव ॥
अथ नेमअंगवर्णन ॥
दूजा अंग नियम का गाऊं । भिन्न भिन्न सब अंग सुनाऊं ॥
पहला तप इन्द्री वश कीजै । इनके स्वाद सभी तजि दीजै ॥
खातें पीतैं सोवत जागत । योगी इन्द्रिन कूं वश राखत ॥
तनकूं वश कर मनकूं मारै । ऐसी विधि तपका अँगधारै ॥
दूजा अंग कहूं संतोषा । हानि भये नहिं माने शोका ॥
लाभ भये नाहीं हरषावै । ऐसी समझ हिये में लावै ॥
परारब्ध तन होय सु होई । सँकलप बिकलपरखैनकोई ॥
दो० तीजा आस्तिक अंग है, जाका सुनो विचार ।
समझ समझ मनमें धरो, ताको गहो संभार ॥
शास्त्र सुने परतीत जो कीजै । सत्तब्रह्म निश्चय करिलीजै ॥
बुध निश्चय आतम के माहीं । जगत सांच करि मानै नाहीं ॥
चौथा दान अंग विधि होई । पात्र कुपात्र विचारै सोई ॥
एक दान उपदेश जु दीजै । भवसागर सों पार करीजै ॥
दूजा दान अन्न अरु पानी । दीजै कीजै बहु सनमानी ॥
१ इन्द्रियवश, संतोप, आस्तिक, शास्त्रचिंतन, दान देना, ईश्वराराधन,
सिद्धांतश्रवण, लाजयुक्त, तत्त्वदृद, जाप ये दशअंग नियमके कहलाते हैं ॥
६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और पराये दुख की बूझै । सुखदानी परमारथ सूझै ॥
पंचम ईश्वर पूजा करिये । तन मन बुद्धि जहांलै धरिये ॥
है निष्काम तजै सब आसा । सेवा करै होय निजदासा ॥
दो० पान फूल जु भाव सों, सह सुगन्ध करि धूप ।
शुकदेव कहैं यों कीजिये, पूजा अधिक अनूप ॥
छठें सिद्धान्त श्रवण सुन बानी । करि विचार गहिये मनमानी ॥
सार असार विचार जु कीजै । पानीको तजि पयको पीजै ॥
अरु सतगुरुसों निश्चय करिये । परखि सँभारि हिये में धरिये ॥
करणी करै तिन्हों से मिलना । वचन अयोगी के नहिं सुनना ॥
सतवां वही जु कहिये लाजा । सो वह सकल सँवारन काजा ॥
साधु गुरूंसें लाज कीजै । तन मन डोलन नाहीं दीजै ॥
करम विपर्यय सब परिहरिये । हिय आंखिन में लज्जा भरिये ॥
शुकदेवकहै सुनिचरणहिंदासा । लज्जा भवन माहिं करि बासा ॥
दो० कुटुंब मित्र जग लोगही, सबसूं कीजै लाज ।
बड़ी लाज हरिसूं करो, नीके सुधरै काज ॥
अष्टम हूँ मति दृढ़ जो कहिये । सो विशेष साधनकूं चहिये ॥
शुभ करमनकी इच्छा करनी । हो न सकै तौ भी हिय धरनी ॥
बहँकै ना काहू बहँकाये । कैसेहू नहिं हलै हलाये ॥
जग सुख देखि न मनमें आनै । स्वर्गआदि सुख तुच्छहिजानै ॥
कोइ अस्तुति आदर करि सेवै । कोइ कुभाव करि गाली देवै ॥
दोनों में निश्चल रहै जोई । शुकदेव कहैं दृढ़मति है सोई ॥
नवयें जाप करै गहि मौना । मन जिह्वासूं कीजै जौना ॥
होयसकै मन पवन गहीजै । गुरुमन्तर जप तामें कीजै ॥
दो० हरिगुरुकी अस्तुति पढ़ै, सो भी कहिये जाप ।
शुकदेव कहैं रणजीतसुनि, त्रैविधि नाश ताप ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६१
दर्शवं समझौ होमही, कीजै दोय प्रकार ।
अँगन माहिं साकिल्ल कूं, वेद कहै ज्यों डार ॥
दूजै पावक ज्ञानकी, तामें इन्द्री होम ।
वाकूं परगट भूमि है, याकूं हिरदा भौम ॥
यमका अंग सभी कह दीन्हा । नेम कहा सोभी तुम चीन्हा ॥
निरैयोगही के मतजानौ । सबके कारज को पहिचानौ ॥
औपै योग पहल ये चहिये । शुभकरमन के मारग गहिये ॥
जोये होय तौ होवै योग । नाहीं बहै जगत के भोग ॥
जज्ञासीकूं पहल सुनीजै । पाछे भेद योगको दीजै ॥
यम अरु नियम दोऊ बतलाये । अच्छी नीकी भांति सुनाये ॥
अब तीजै आसन समझाऊं । जुदे जुदे कहि सबै सुनाऊं ॥
योग पहिल आसनही साधै । आसनविना योग बरबादै ॥
अथ आसनवर्णन ॥
दो० चरणदास निश्चय करौ, बिन आसन नहिं योग ।
जो आसन दृढ़ होय तो, योग सधै भजि रोग ॥
चौरासीलख आसन जानौ । योनिनकी बैठक पहिचानौ ॥
तिनमें चौरासी चुग लीन्हें । दुरलभ भेद सुगम सों कीन्हें ॥
सो तुमकूं पहिले बतलाये । जिनकूं साधौगे चितलाये ॥
तिनमें दोय अधिक परधा२नैं । तिनकूं सब योगेश्वर जानैं ॥
आसनसिद्ध पदम कहलावै । इनकूं करि निश्चय ठहरावै ॥
अरु आसन सब रोग भजावैं । ये दो आसन योग सधावैं ॥
इन कूं साधै जो जन कोई । ध्यान समाधि लगावै सोई ॥
१ नवलक्ष जलचर, दशलक्ष नभचर, ग्यारहलक्ष कृमि, बारहलक्ष वनचर,
चारिलक्ष मनुष्य, तीसकक्ष पशुयोनि इत्यादि चौरासीलक्ष योनि हैं २ मुख्य ॥
६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों। आसन दोनों बरणौं हैं ज्यों ॥
अथ पद्मासनविधि ॥
पहिले आसन पदम बताऊं। ज्यों की त्यों मूरति दिखलाऊं ॥
पहिले बावां पांव उठावै। दहिनी जङ्घा ऊपर लावै ॥
दहिना पांव फेरि यों लावै। बांवीं साथल ऊपर राखै ॥
बावां कर पीछे सों लावै। बाम अँगूठा गहि तन तावै ॥
ऐसे हाथ दाहिना लावै। दहिन अँगूठा पकड़ दृढ़ावै ॥
ग्रीवालटक चिबुक हिये आवै। नासा आगे दीठि लगावै ॥
दिव्यदृष्टि हो कौतुक दरशै। कहै शुकदेव अभैपद परशै ॥
दो० कै हिरदै राखै चिबुक, कै सम राखै देह।
कै घौटों दोउ हाथ रखि, कै अँगूठा गहिलेह ॥
अथ सिद्धासनविधि ॥
दूजा आसनसिद्ध जुकीजे। बावां पांव गुदाढिग दीजै ॥
दाहिन पांव लिंगपर आवै। दृष्टि सुभ्रुकुटी पै ठहरावै ॥
अचरज जहां अधिक दरशावै। खुले कपाट मोक्ष गति पावै ॥
आसन साधि व्याधि परिहरै। भूख नींद जोपै वश करै ॥
दो० एड़ी पावै पांव की, सीवन मध्ये राख।
लिंग गुदा के मध्य में, मूल बोलिये साख ॥
संयम सूं इन्द्री गहै, राखै सरल शरीर।
दृष्टि उठा भ्रुकुटी धरै, मिटै जु दोनों पीर ॥
दहिनी लावै लिंगपर, भाग बराबर राखि।
बारी बारी कीजिये, शुकदेवा कहै भाखि ॥
अथ प्राणायामअंग वर्णन ॥
चौथे प्राणायामही, कहूँ सुनौ चित लाय।
जाबल जीवै पनकुं, चढ़ै गगन कूं धाय ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६३
षटचक्कर कूं छेदि करि, सुखमनही की राह।
दलसहस्रके कमल में, पहुँचै करै उछाह ॥
हिरदै में अस्थान है, प्रान वायु का - जान ।
वाके रोंके सबरुकैं, वायुन में परधान ॥
जैसे गंगा एकही, घाट घाट के नावँ ।
ऐसे प्राणहि वायु के, नावँ कहे बहु ठावँ ॥
चौरासी अस्थान' पर, चौरासीही वायु।
तामें दश ये मुख्य हैं, बरणौं सुनिये ताय ॥
प्राण अपान समानही, और व्यान , उद्यान ।
नाम धनंजय देवदत, कूरम किरकल जान ॥
दशवायू जो एकही, तिनमें दीरघ दोय ।
सोवै प्राण अपानहैं, तिन्हें पिछानै कोय ॥
प्राणजाय प्राणैं मिलै, रहे प्राणके प्रान।
शुकदेव कहि वर्णन करूं, अब इनके अस्थान ॥
प्राणवायु हिरदै के ठाहीं। बसै अपान गुदा के माहीं ॥
वायु समान नाभि अस्थाना । कंठ माहिं बाई उद्याना ॥
व्यान जुव्यापक है तन सारै । नाग वायु सों उठै डकारै ॥
पलक उघाड़ै कूरमबाई । देवदत्तसूं होय जँभाई ॥
किरकल वायु जु भूख लगावै । मुखै धनंजय देह फुलावै ॥
सब में प्राण वायु मुखजानौं । सो हिरदै के मध्य पिछानौं ॥
हिरदाही, देही के माहीं । जो कुछ है सो झांही झांही ॥
योगेश्वर ह्यांईं फल पावैं । ह्यांसू अनहद नाद जगावै ॥
६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चक्रवर्णन ॥
दो० अब चक्र¹ बरनन करूं, पाछे प्राणायाम ।
बरणूं नारी सुषमना, सुधरै सबही काम ॥
हैं वे सूरति कमल की, छोटे और विशाल ।
मूलसुं लेकर शीशलौं, एकहि जिनकी नाल ॥
कुं० लालरंग पहिला कहूँ चक्रधार तिहि नाँवँ ।
चार पँखरी² तासु की हैं जु गुदा के ठावँ ॥
हैं जु गुदा के ठावँ देह तांही पर राजै ।
चारों अक्षर तहाँ देव गन्नेश विराजै ॥
पवन सुरत हां लैधरै खोलि कहैं शुकदेव ।
दूजा लिंगस्थानही जाको सुन अब भेव ॥
पीतबरण षट पँखरी नामजु स्वाधिष्ठान ।
षट अक्षर जापै दिये ब्रह्मा दैवत जान ॥
ब्रह्मा दैवत जान सँग सावित्री³ दासा ।
इन्द्र सहित सब देव तहां सबही का बासा ॥
मणिपूरक चक्र कहूं तीजा नाभि स्थान ।
नीलबरण दश पँखरी दश अक्षर परमान ॥
दो० विष्णु जहांका देवता, महालक्ष्मी संग ।
चरणदास अब कहतहूँ, चौथे को परसंग ॥
अनहदचक्र हिरदयबिषे, द्वादशदल अरुश्वेत ।
शिवशक्ती⁴ जहाँ देवता, द्वादश अक्षर भेद ॥
पँचवां चक्र कंठ में, विशुद्ध नामजिहिकेर ।
१ आधार,स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनहद, विशुद्ध, आज्ञा ये छः चक्र
शरीर के अन्तर रहते हैं २ पंखुरी ३ सरस्वती ४ पार्वती ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६५
षोड़श दल जीव देवता, षोड़श अक्षर हेर ॥
छठयों भौंहन बीच में, अज्ञा चक्कर सोय ।
ज्योति देवता जानिये, दो दल अक्षर दोय ॥
शिष्यवचन ॥
कमलों पर अक्षर कहे, समझ न आई मोहिं ।
कौन कौन अक्षर तहां, सतगुरु कहिये सोहिं ॥
गुरुवचन ॥
पहिला कमल अधार सुनाऊं । वशषस अक्षर वरण बताऊं ॥
दूजा कमल जु स्वाधिष्ठाना । बा भा माया रल जु बखाना ॥
तृत्तिये मणिपूरक जो कहिये । डा ढा णा ता था ही लहिये ॥
दा धा ना पा फा जो गाये । ये दश अक्षर वरण बताये ॥
चौथे चक्र अनाहद माहीं । द्वादश अक्षर वरण बताहीं ॥
का खा गा घा ङा जो जान । चा छा जा झा ञ ट ठ जुमान ॥
पँचवां षोड़श विशुद्ध जो आछे । आदि अकार अकार सुपाछे ॥
छठा जो अज्ञा चक्कर मानौ । हंस वरण दो अक्षर जानौ ॥
दो० भवँर गुफा मंडल अखंड, तिरवेणी जहँ न्हान ।
नित परबी जहाँ होत है, करै पाप की हान ॥
उलट पवन बेधै षटन, ऊपर पहुंचै जाय ।
शुकदेव कहैं चरणदासजू, सुषमन सहज समाय ॥
कमलसहस दल सातवां, शीश मध्यही वास ।
तहां देवता सचगुरु, पूरी करै जो आस ॥
ह्यांतक सुषमन का सिरा, सो सातौ की नाल ।
हैं वे उलटे षट कमल, तलै अपान बयाल ॥
अपान् वायु कूं साधिकरि, ऊपर लावै मोड़ ।
जब होवै उलटे कमल, मुख अकाशकोओड़ ॥
६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अपान वायु ज्योंज्यों बढ़ै, चक्र चक्र के पास ।
त्यों त्यों सीधै होय सब, पूरा जान अभ्यास ॥
अपान वायु आवै जबे, चक्र अनाहद माहिं ।
दश प्रकार के नादही, शनैःशनैः खुलि जाहिं ॥
पहिले नाद सुनै जो ऐसा । चिड़ी चीकला बोलै जैसा ॥
एकहि बार कहै यों चिन्न । दूजीबार कहै चिन चिन्न ॥
क्षुद्रघंट ज्यों तीजी जानौ । चौथी नाद शङ्ख पहिंचानौ ॥
पँचवीं नाद बीन ज्यों गाजै । छठवीं उपज ताल ज्यों बाजै ॥
सतवीं नाद मुरलिया ऐसी । अठवीं उठै पखावज जैसी ॥
नवै नफ़ीरी नाद सुनावै । दशवें सिंह गरज उपजावै ॥
नौ तजि दशवैं सूं हित लावै । अनहद सुनि अनहद होजावै ॥
होय जीव सो ब्रह्म अगाधा । जो कोइ सुनै सुअनहदनादा ॥
दो० खुलै जो अनहदनाद ज्यों, सोसाधन सुनि लेहु ।
जासों पहुँचै सिद्धि को, या करणी चित देहु ॥
चक्राधार सों खैंचि करि, अपान वायु सजलेह ।
स्वाधिष्ठान के पासही, तीन लपेटै देह ॥
याकीविधि सब तोहिं सुनाऊं । जैसे है तैसे समझाऊं ॥
पहिले मूल द्वार को शोधै । बंध लगाय अपान निरोधै ॥
पहिले चक्कर में ठहरावै । खैंचि दूसरे के ढिग लावै ।
वाके आसौ पास फिरावै । दहिने तीनि लपेट लगावै ॥
फिरि मणिपूरक में पहुंचावै । फेरि अनाहद में लैजावै ॥
अनहद खुलै सुनै सुखपावै । फिरिहांप्राण अपान मिलावै ॥
हिरदय कंठ मध्य ठहरावै । संयम सों ताको पहुंचावै ॥
बंध दूसरो तहां लगावै । चरणदासं शुकदेव बतावै ॥
' अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६७
अष्टपदी ॥
पहिले अनहदनाद खुलैहिय ऊपरै ।
कंठ सु नीचे रोंकि ध्यान ह्वांईं धरै ॥
जहांअपरबल होय जु अनहद शब्दही ।
फिरियों जानो जाय कंठ के मध्यही ॥
तहां किये अभ्यास ध्यान राखैधना ।
होवै अधिकीनाद सुनै साधूजना ॥
केतक द्योसन माहिं ब्रह्म रन्धरकनै ।
जाय खुलै जहँ नाद सुरतिदै ह्वां सुनै ॥
शनै शनै यो होय जानेंकोइ साधही ।
हिरदय अरु ब्रह्मलोकलों एकैनादही ॥
मीठी और सवाद बहुतही पाइये ।
सतगुरु के परताप जहां मनलाइये ॥
ब्रह्मलोककी बात सुनै होवै जुह्वां ।
सबही सूझैं वस्तु जुकछु होवैं तहां ॥
दो० अनहद के सम औरना, फल बरणे नहिं जाहिं ।
पटतर कछू न देसकूं, सब कछु है वा माहिं ॥
पांच थकै आनंद बढ़ै, अरु मनुआ वश होय ।
शुकदेवकहि चरणदाससुनि, आपअपनजाखोय ॥
नाड़िन में सुपमन बड़ी, सो अनहद की मात ।
कुम्भक में केवल बड़ा, सो वाही का भ्रात ॥
मुद्रा बड़ी जु खेचरी, वाकी बहिनी जान ।
अनहद सा बाजा नहीं, और न या सम ध्यान ॥
सेवक से स्वामी.भवै, सुनै जु अनहद नाद ।
६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जीव, ब्रह्म हैजात है, पावै अपनी आद ॥
चरणदास अब कहत हूँ, वही जु प्राणांयाम ।
शुकदेव कहै ताके किये, पावै मन विश्राम ॥
बहत्तरहजार आठसौचौंसठनारी । सबकी जड़है नाभि मँझारी ॥
तिनमहँ दश नाड़ी शिरमौरी । पाँच बायें पाँच दहनी ओरी ॥
जिनमें तीनि अधिक परधान । इड़ा पिंगला सुषमनजान ॥
उनमें सुषमन अधिक अनूप । सो वह कहिये अग्नि स्वरूप ॥
दश नाड़ी अस्थान बताऊं । ठौर ठौर तेहि कहि समझाऊं ॥
दो० नाड़ि शङ्खिनी गुदामें, किरकल लिंगस्थान ।
पोषा सरवन दाहिने, जसनी बायें कान ॥
गंधारी दृग बामही, हस्तिनि दाहने नैन ।
नारि लंबका जीभमें, सब सवाद सुखदैन ॥
नासा दहिने अंगहै, पिंगल सूरज वास ।
इड़ा सुबायें ओर है, जहां ससियर परकास ॥
दोऊ मध्य में सुषमना, अद्भुत वाको भेव ।
ब्रह्म नाड़िहू कहत हैं, यों कह सो शुकदेव ॥
इड़ा ब्रह्मा जमुना जहां, सुषमन विष्णु निवास ।
और सरस्वति जानिये, येहो चरणहिं दास ॥
शिव पिंगल गंगा सहित, सो वह दहिने अंग ।
तिरवेणी याते भई, मिलीं जु तीनौ संग ।
कबहुँ इड़ा स्वर चलत है, कबहूँ पिंगल माहिं ।
मध्य सुषमना बहत है, गुरु बिन जानै नाहिं ॥
सोवह अग्नि स्वरूप है, बड़ी योग सरदार ॥
याहीते कारज सरै, ऐसी सुषमन नार ॥
इनसों प्राणायाम करीजै । पूरक कुम्भक रेचककीजै ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६६
इड़ा पिंगला मारग थाकै । उलटि सुषमना चालनलागैं ॥
बायें खैंचना पूरक जानौ । ठहरावन को कुम्भक मानौ ॥
फेरि उतारै रेचक वोई । प्राणायाम कहावै सोई ॥
दो० इड़ा पवन पूरक करै, कुम्भक राखै रोक ।
रेचक पिंगल सों करै, मिटैं पापके थोक ॥
पिंगल रोकै पवन न जावै । इड़ा और सो वायु चढ़ावै ॥
कुम्भककरि हिय चिबुक लगावै । जितकातित मनको ठहरावै ॥
सोलह मात्रा पूरक लीजै । चौंसठि कुम्भकमें जपकीजै ॥
रेचक फिरि बत्तीस उतारै । धीरे धीरे ताहि निवारै ॥
पहिल पहिलही कीजै आधे । तीनि महीने ऐसे साधे ॥
यासे आगे फेरि बढ़ावै । दोय आठ अरु चारि चढ़ावै ॥
बढ़त बढ़त ऐसेही बढ़ै । योंहीं चौंसठि ताहीं चढ़ै ॥
इड़ा वायुसों पूरक कीजै । पिंगल सों रेचक तजिदीजै ॥
फिरि पिंगलसों पूरक धारै । बहुरि इड़ाहीसों निरवारै ॥
ऐसे बारीबारी करिये । जीते प्राण वायु अघ हरिये ॥
होयसकै कुम्भक सरकावै । चौंसठि से भी परै बढ़ावै ॥
शिष्यवचन ॥
दो० चरणदास करजोरिकह, सुनौ गुरू शुकदेव ।
कौन समै याको करै, राति दिना कहिदेव ॥
मात्रा कासों कहत हैं, जो बतलायो जाप ।
केतौ करै अहारही, जाको कहिये नाप ॥
गुरुवचन ॥
ॐ बिन्दी के सहितही, ताहि मात्रा जान ।
बीजमन्त्र तासों कहत, प्रणव को पहिंचान ॥
७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
कोमल भोजन कीजिये, आधी रखिये भूख ।
पवन बसै सुखसों जहां, तन नहिं पावै दूख ॥
साठिघरी दिनराति की, आठ तासुके याम ।
लीजै चौथा भागही, कीजै प्राणायाम ॥
चारभाग ताके करै, चार समै ठहराय ।
चार चार घटिका करै, दृढ़ब्रत चित्तलगाय ॥
और दूसरी भांति सुनीजै । हो नसकै तौ याको कीजै ॥
बारह ॐ पवन चढ़ावै । कुम्भक माहिं बीस ठहरावै ॥
बारह पिंगल पवन उतारै । राति दिनामें चारहिबारै ॥
फेरि बढ़ावै कुम्भक दुगुनी । केते द्यौसन में फिर तिगुनी ॥
फिर पिंगल सों पूरक लीजे । इड़ा बायु रेचकही कीजे ॥
बिरिया एक इड़ा सों खेंचे । पिंगल दूजीबार जु एंचे ॥
कबहुँ यासू कबहुँ वासों । रेचक करै जो पूरक जासों ॥
कुंभक तिगुनी सो अधिकावे । होयसके जितनी सरकावे ॥
दो० भांति दूसरी और सुनि, साधन अधिक अनूप ।
गुरु बिन भेद न पाइये, महा गुप्त सों गूप ॥
अष्टपदी ॥
प्राण वायुकी युक्ति कहौं जेहि बातहै ।
द्वादश अंगुल नासिका आगे जातहै ॥
संयमही सों सहज जु उलट घटाइये ।
शनैशनैही साध जु ताहि समाइये ॥
अपान वायुको खेंचि प्राण घर लाइये ।
फिरि बाहर सों रोंकि जु तिन्हें मिलाइये ॥
तीनि कर्म पूरकके कुम्भकके कहे ।
१ धीरेधीरे ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७१
रेचकही के कर्म दोय निश्चय भये ॥
दो रेचक के कर्म पूरक के तीनहीं ।
ये सबही रहिजायँ होय जब छीनहीं ॥
पूरक रेचक छुटै केवल कुम्भकयही ।
ठौर समैका बंध न राखै नाशही ॥
या किरियाको अन्त जानौ तुम हां तहीं ।
प्राणवायु को रोकै कायाके महीं ॥
दो० साठहजार इक्कीसलख, सबके श्वास परमान ।
यह तौ रोकै देहमें, जबलग एकहि प्रान ॥
याकेहू ये सौ दिना, साधन भवै जु सिद्धि ।
केवल कुम्भक जानिये, पूरी हवै जु विद्धि ॥
अष्टपदी ॥
इतनी होवै शक्ति रुकन जब श्वासकीं ।
रहै नहीं परमाण जु गिनती मासकी ॥
द्वादशकै सौ बर्ष सहस कै लाखही ।
चाहै जब लग रखै सांच यह साखही ॥
गुप्त महा यह जान कठिन है साधना ।
कोटिनमें कोइ एक करै आराधना ॥
देखा देखी बहुत मनुष याकू लगैं ।
कोई चढ़ै परमान घने मगमेंथकैं ॥
चरणदास यह समझि कहें शुकदेवहीं ।
शनैशनै सों करै पांय या भेवही ॥
दो० मूल बंध अरु खेचरी, मुद्राही को जान ।
दोनोंके साधे बिना, होय अपान न प्रान ॥
खेचरि मुद्राकहूँ बखानै । जाको कोटिन में कोइ जानै ॥
७
७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
सकल शिरोमणि योग मंझारी। ज्यों मनुषों में छत्तर धारी ॥
शीश फूल ज्यों गहनो माहीं । या बिन ताड़ी लागै नाहीं ॥
साधन कर कर जीभ बढ़ावै । सो ब्रह्मरंधरताईं लावै ॥
उरैताल वा ठौर कहावै । रसना सूं द्वां बंध लगावै ॥
जासूं पवन न सरकन पावै । श्रवण नैनजू बाट रुकावै ॥
प्राणवायु बाहर नहिं आवै । मुखनासा हो निकस न जावै ॥
शुकदेव कहैं चरणदास बताऊं । आगे मूलबंध समुझाऊं ॥
दो० मूल बन्ध जानौ यही, एंडी गुदा लगाव ।
थक दहनी वावीं कभी, सिध आसन ठहराव ॥
मूलबन्ध जा कारण दीजै । सो मैं कहूँ सबै सुनि लीजै ॥
अधार चक्रसूं पवन उठावै । स्वाधिष्ठानहिं के ढिग लावै ॥
दहिनी ओर कूं ताहि फिरावै । ऐसी तीन लपेट लगावै ॥
सीधा ह्वै ऊपर कूं धावै । मणिपूरक चकर में आवै ॥
शनई शनई ताहि चढ़ावै । चकर चकर में पहुंचावै ॥
भूचकर के ऊपर ताईं । ब्रह्मरंध्र के लावै ठाईं ॥
ऐसे षट चकर कूं शोधै । प्राण वायु को यों परबोधै ॥
अपान वायु जो ह्यांतक आव । प्राण वायु ह्वै सहज समावै ॥
शुकदेव कहै सुन चरणहिं दासा । सहज शून्यमें करै निवासा ॥
अथ अष्ट प्रकार के कुम्भक वर्णन ॥
शिष्यवचन ॥
दो० प्राणायाम की विधि सबै, गुरु तुम दई सुनाय ।
सो लेकरि हिरदै धरी, ताहि न देउं भुलाय ॥
चरणदासके शीश पर, तुम्हीं गुरु शुकदेव ।
कुम्भक अष्ट प्रकार के, तिनको कहिये भेव ॥
लक्षण नाम स्वभाव गुण, जुदे जुदे समुझाय ।
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७३
चरणदास के मन विषे, सुनबेको अति चाय ॥
गुरुवचन
अब आठौ कुम्भक कहूँ, नावँ भेद गुण रूप ।
शुकदेव कहैं परसिद्ध हैं, योगहि माहिं अनूप ॥
प्रथम कुम्भकही कहूँ, नावँ जु सूरज भेद ।
दूजे ऊजाई सुनो, साधे छूटै खेद ॥
शीतकार अरु शीतली, पाँचवीं भस्त्रक जान ।
छठीं जु अमरी नाम है, नीके समझि पिछान ॥
नावँ मूर्छा सातवीं, अठवीं केवल होय ।
रणजीता सबसे बड़ी, आयु बढ़ावै सोय ॥
पवन पूर पूरकही कीजै । पाछे बन्ध जलन्धर दीजै ॥
कुंभक रेचकके मधि जानौ । ह्याईं बन्ध उड्यान पिछानौ ॥
पवन जोरही सूं गहि लीजै । अध ऊर्ध्व संकोच न कीजै ॥
मध्यम कीजै पश्चिम तानै । ब्रह्म नारिके माहिं समानै ॥
नाड़ीं पवन खैंचिये ऐसे । भरिये सब संध्यान जु जैसे ॥
अपान वायु कुं ऊपर लावै । प्राण वायु नीचे लै जावै ॥
जोपै यह साधन बनि आवै । योगी बूढ़ा होन न पावै ॥
तरुण अवस्था देखै ऐसी । नितहीरहै जानिये जैसी ॥
अथ सूर्यभेदन ॥
कुं० कुम्भक सूरज भेदही, पहिले देहुं सुनाय ।
सुख आसन कै कीजिये, अथवा वज्र लगाय ॥
अथवा वज्र लगाय, पूरक दहिने स्वर कीजै ।
नख शिख सेती रोंकि, वायू कुं बन्ध करीजै ॥
७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बायें सेती रेचिये, हौरै हौरै जान ।
कपाल धौंकनीजानिये, चरणदास पहिचान ॥
दो० वायु किरम पीड़ा हरै, कीजै वारंबार ।
कुम्भक सूरज भेदनी, शुकदेव कहै हियधार ।
अथ ऊजाई ॥
अब ऊजाई कुम्भक सुनिये । समझ सीखमन माहीं गुनिये ॥
दोउ सुर समकर पवन चढ़ावै । पेट कण्ठ लौं ताहि भरावै ॥
ताको रोकै दृढ़ करि राखै । सहजइड़ा सों रेचक नाखै ॥
ऐसे जो कोई साधन करै । रोग सलेषम के सब हरै ॥
हिरदय कण्ठ माहिं जो होई । कफका रोग रहै नहिं कोई ॥
रोग जलन्धरही का भागै । भजै वायु दुख पावक जागै ॥
बैठत चलत पवनको भरै । यही उजाई कुम्भक करै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । तीजी शीतकार समुझावै ॥
अथ शीतकार
दो० ओड़ जँभाई नासिका, लीजै खिंचै जु पौन ।
ताहि कछू ठहरायकै, छोड़ै मुख सों जौन ॥
धीरे धीरे खैंचिये, सीसी शब्द उचार ॥
सुन्दर होवै तेजवन्त, अधिक रूप को धार ॥
भूख प्यास व्यापै नहीं, आलस नींद न होय ।
तनचेतनही होत है, रहै उपाधि न कोय ॥
यहि विधि साधतही रहै, होय योगिन मैं भूप ।
चरणदास शुकदेव कहि, कुम्भक यही अनूप ॥
अथ शीतली
कहूँ शीतली कुम्भक आगे । जो कोइ करै भागतिहि जागे ।
तालु मूल जिह्वा बल सेती । प्राण वायु पीवै कर हेती ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७५
कुम्भक राखै सबतन माहीं । ढीला गात रमावै ह्वाहीँ ॥
नासा सेती रेचक कीजै । एकमास सिधिहो सुखलीजै ॥
पीजै पवन जीभको मोड़े । सहजै छोड़ै नासा ओड़े ॥
दोनों रंध्रसे तजि दीजै । यों अभ्यास पूर करलीजै ॥
ताप तिली गोला ज्वर होई । वाके तनमें रहै न कोई ॥
देह पुरानी नूतन होय । तीनि वरष साधै जो कोय ॥
जैसे सांप केंचुली भौंहिं । श्वेत बाल तजि काले होहिं ॥
काहू भांतिका दुख नहिं व्यापै । भूख प्यास तिसभाजै आपै ॥
अथ भस्त्रिका ॥
दो० अबकहूँकुम्भकभस्त्रिका, पित कफ वायु नशाय ॥
अगिनि बढ़ै अभ्याससों, तीनि गांठि खुलिजाय ॥
आसनपद्म सुयाविधि करै । बामजंघ दहिनो पग धरै ॥
बावों पग दहिनी पर लावै । जांघनसों दोउहाथ मिलावै ॥
ग्रीवा पेट बराबर राखै । आगे सुनु शुकदेवा भाखै ॥
मुख मूदै रेचै नासासूं । पूरक चपल करै श्वासासूं ॥
रेचक पूरक ऐसे कीजै । वारंवार तजै अरु लीजै ॥
जैसे खाल लोहारा भरै । रेचक पूरक आतुर करै ॥
करत करत जबहिं थकिजावै । नेक ठहरि दूजी विधि लावै ॥
फिरि पूरक सूरजसों करै । पवन उदरके माहीं भरै ॥
तर्जनि अँगुली सों दृढ़ रोकै । नासामध्य धारकरि जोखै ॥
दो० कुम्भक पिछली भांतिकरि, रेच इड़ासों वाय ।
कफ पित वायु नशायकै, लेवै अग्नि बढ़ाय ॥
कुण्डलिनी देवैजगा, यह कुम्भक सुखदाय ।
करै जुहित व्रत धारिकै, चरणदास चितलाय ॥
कुण्डलिनी सरकायकै, बेधै तीनों गांठ ।
७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऐसी पँचवीं भस्त्रिका, रहै न कोई आंठ ॥
ब्रह्मनाड़िका के छिद्र माहीं। रोंकिरही मुखदेरहि ह्नाहीं ॥
लाय लपेटै नाभी ठाहीं। दृढ़है बैठी सरकै नाहीं ॥
सवा बिलस्त कि जाकीदेही। तामें अस्थित जीव सनेही ॥
शक्ति नांगिनी यही जु कहिये। याके भेद गुरूंसों लहिये ॥
महा अपरबल जागै नाहीं। ताते नर सब मरिमरि जाहीं ॥
कोइ इक योगी ताहि डुलावै। सुपमन बाट गगन लैजावै ॥
ब्रह्मरंध्र में जाय समावै। लगै समाधि बहुत सुखपावै ॥
जो कछु होय सो कहा न जावै। चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० शिव शक्ति भेलाभ वय, रहै न द्वितिया भाव ।
कुण्डलिनी परबोधका, जो कोइ करै उपाव ॥
शिष्यवचन ॥
व्यास पुत्र शुकदेवजी, किरिपाकरी दयाल ।
चरणदास आधीनही, समझो भयो निहाल ॥
एकबार फिरि खोलिकै, कुण्डलिनी समुझाव ।
याके सबही भेद को, सुनबेको अतिचाव ॥
गुरुवचन ॥
फिरभी तोसों कहतहौं, कुण्डलिनी विस्तार ।
ताके सगरे भेदही, सुनिकै हियमें धार ॥
नाभिस्थान नागिनि रहै, कुण्डल शशी अकार ।
प्राण पियारा वही है, आगे सुनो विचार ॥
कुंभक कर्म कोई करै, देवै शक्ति जगाय ।
जैसे लागी लष्टिका, नागन शीश उठाय ॥
सीखी गुरूंसों कुंभक साधै। नीकी विधि ताको अवराधै