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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

धर्मजहाजवर्णन । ३७
तुमसे अधिकी मूढ़ नर, जगमें घने दिखात ॥
हुकुम बड़ा माया बड़ी, नामी बड़े जु भूप।
नर नारी बहु टहल में, सुन्दर अधिक अनूप ॥
सन्तन की गति और है, हरि गुरुसों सनमुख ।
मुक्त होय छूटैं सबै, जन्म मरण के दुख ॥
जगत बड़ाई में फँसे, परी अविद्या छाहि ।
नरक भुगति यमदण्डही, फिरि चौरासी माहिं ॥
हरि औ गुरु को शिरपर धरिये, सतपुरुषनकी सङ्गति करिये ॥
रहिये साधुनके सँग माहीं । ध्यान भजन जहाँ छूटे नाहीं ॥
है परिपक्व जहां मन रहो। गुरुमत दया दीनता गहो ॥
सहज सहज उपदेश लगावो । भूलेको हरि बाट बतावो ॥
तारन तरन बहुत जन भये । क्षमा दीनता धारे गये ॥
पै उनको अभिमान न आया । नेक न पड़ी अविद्या छाया ॥
आपा मेटि गुरूही राखा । जब बोले तब गुरुही भाषा ॥
तू अभिमानी जन्म गँवाया । पापबोझ शिर घना उठाया ॥
दो० योंही न१भकी ओरसों, वाणी भई जुआय ।
कियो गुरू्सों मान तैं, चौरासी२ को जाय ॥
तहं सों गुरु रमते भये, शिष्यहि दै फटकार ।
कहा कि तेरे तन बिषे, हूजी बड़ो विकार ॥
तापाछे कछु दिननमें, देही भयो विकार ।
निकट न आवैं तासुके, तहं के कोउ नर नार ॥
कुष्ठ भयो अर्द्धंगको, रहो न काहू योग ।
आठ पहर वाको भयो, निरोशोगही शोग ॥
तनतजिकै नरकै गयो, फिरि चौरासी माहिं ।
१ आकाश २ कुंभीपाक आदि चौरासी नरक संख्या ॥

३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो गुरु सों करे मानहीं, ताकी गतिहोय नाहीं ॥
कहैं गुरू शुकदेवजी, चरणदास परवीन ।
मनसोंतजि अभिमानको, गुरुसों रहिये दीन ॥
मान न काहूसों करै, सबही सों आधीन ।
समरथ हरिकी भक्तिमें, जगतकाज सों हीन ॥
दश कर्मों को जानिये, महापापकी खानि ।
तन मन बचन सँभारिये, यहीजु अधिकसयानि ॥
कहूं एक दृष्टान्तही, सो परमारथ भेश ।
सुनि समुझै हिरदै धरै, तौ लागै उपदेश ॥
रहै सुहावत नगर इक, बसैं लोग सुखमान ।
नर नारी सुन्दर सबै, अरुधनवन्त बखान ॥
नया करैं जहाँ भूपही, बरस दिनाके माहिं ।
संवत बीते तासुको, फिर वै राखैं नाहिं ॥
पकड़ डारदैं नदी पारा । जहां भयानक अधिक उजारा ॥
पशू आदि ताको भषि जावैं । स्वपनासा देखैं विनशावैं ॥
नयाभूप करि आज्ञा मानैं । ताको अपना ईश्वर जानैं ॥
रहैं हुकुम माहीं करजोरैं । वाको बचन न कबहूँ मोरैं ॥
छत्तरधारी छाईं डारैं । सों मैं आगे कही उजारैं ॥
कई सैकड़ों ऐसे भये । चेते नहीं निष्फल गये ॥
राजा नया और इक किया । सो वह समझा चेता हिया ॥
मनही मनमें कहै विचारे । बहुत भूप जंगल में डारे ॥
दो० बरस दिना जब बीतिहैं, हमहूँ को दे डारि ।
सरिताही१ के पारही, अधिकी जहां उजारि ॥
याको कछू उपाय बिचारौं । तासेती यह जन्म न हारौं ॥
१ नदी ॥

धर्मजहाजवर्णन । '३६
एक दिना उन यही विचारा। देखन गयो नदी के पारा ॥
जहां भूप जाजाकरि मरते। तिनके हाड़ हईं जा गिरते ॥
खड़ा जु होय देखि मन आई। नीकी ठौर बनाऊं ह्नांई ॥
दृष्टि उठाय ऊंची जो कीन्ही। कामदारको आज्ञा दीन्ही ॥
बन काटौ आज्ञा दइ एता। फेरक पांचकोस में जेता ॥
सुन्दरसा इक कोट बनाओ। तामें सुन्दर बाग रचाओ ॥
करौ हवेली१ ताके माहीं। जैसी भूपनहूँ कै नाहीं ॥
गिलंम२ बिछौने परदे लावो। अरु तय्यारी सबै करावो ॥
होय चुकै जब मोहिं सुनावो। बहुत इनाम अधिक तुम पावो ॥
दो० वैसीही बनने लगी, जैसी आज्ञा दीन।
बनते बनते बनचुकी, सुन्दर अधिक नवीन ॥
फिर राजा को आनि सुनाया। राजा सुनि बहुतै सुखपाया ॥
आछी वस्तु वहां पहुँचाई। ह्नांजो रही न सुरति लगाई ॥
कहा कि एक दिना ह्नां जाना। क्षण क्षण होय अ³वधिकीहाना ॥
पांचक गांव कोटके साथा। किये दिये लिखि अपने हाथा ॥
अपना एक हितू मन भाई। भरी कचहरी लिया बुलाई ॥
करि इनाम ताको वह दिया। वाका देखा सांचा हिया ॥
और कही जो राजा होवै। वाहि तलाकँ४ याहि जो खोवै ॥
योंही आठ महीने बीते। करणी करि भये मनके चीते ॥
दो० है निश्चित आनँदभये। चिन्ता भय नहिं कोय ॥
अपना कारज करिचुके। ह्नां ह्नां एकहि होय ॥
सुखही में वह वर्ष बिताया। अवधिबीतिफिरिवहदिनआया ॥
सब उमराव५ जु घिरिकर आये। नया भूप करने को लाये ॥
यहि सिंहासन सों दियो डारी। कहा कि तुम्हरी बीती बारी ॥
१ मकान २ गलीचा ३ अवादा ४ कसम ५ अमीर ॥
५

४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ऐसे कहि कर गहि लै चाले। पार नदी के जंगल घाले ॥
शुभकरणी को करि वह राजा। अपने महलन जाय बिराजा ॥
इतसे भी उत सुख बहुभारी। ना कोइबैरी ना जंजारी ॥
अपनी करणी से सुख पावै। रहै अशोक न चिन्ता आवै ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा। शुभ करणी करि पाया बासा ॥
दो० ऐसे मानुष देह को, जानहुँ नगर समान।
राजा यामें जीवहै, शुभकरणी परमान ॥
नाहिं तौ चौरासी जङ्गल है। भांति भांतिका जितही भौ है ॥
पशू पशूको जित भषिजावै। नित भयमानि नहीं सुख पावै ॥
बहु दुख पावै खोटी करनी। जैसी करनी तैसी भरनी ॥
शुभकरनी को जो नर धावै। बहुत भांति सुख सुरपुरजावै ॥
दो० भूप उमरअपनी किया, अपना पूरण काम।
ऐसेही शुभ कर्म्म सों, तुमहूँ पावो धाम ॥
अरु इक कथा कहौं अतिनीकी। जा सुनिजाय अविद्या१ जीकी ॥
इक राजा था बहु परबीना। सो वह पुत्र विनाथा हीना ॥
एक समय वहि रोग जुआया। पुत्र बिना बहुतै कलपाया ॥
कौनकाज अब ह्यांको करिहै। जो मेरो देहीं यह मरिहै ॥
यह मन करत सिद्ध इकआया। राजाने सब वाहि सुनाया ॥
सिद्ध कही सुत गोदं घलावो। बेटाकरि तिहिराज बिठावो ॥
राजा कही जु ध्यान लगावो। राज भाग में ताहि बतावो ॥
फिरिउनकही जुखोलि दिखाऊं। साहूकारका पुत्र बताऊं ॥
वाके भाग्य लिखा यह राजा। ताको सुत करि कीजै काजा ॥
फिर उन वाकोगोद जु लीन्हा। ह्यांको रोज काज सब दीन्हा ॥
कोइक दिनमें उन तनत्यागा। पुत्र राज्य करने तब लागा ॥
१ मूर्खता २ बैठालेव ॥

धर्मजहाजवर्णन ४१
राज्य पितासों नीका कीन्हा । प्रजाआदिको सब सुख दीन्हा ॥
दो० राज करत वर्षे भई, सुखले अरु सुख दीन ।
नगर मध्य वाके कोऊ, विना द्रव्य नहिं हीन ॥
एक दिना ऐसो भो काजा । सोवत चौकि उठा वह राजा ॥
भोर भये सब फौज बुलाई । हरिकी आज्ञा सो समुझाई ॥
कहा जहांतक परजा मेरी । ताको लूटो जाय सबेरी ॥
आज्ञा ले सब फौज पधारी । प्रजा लूटि लई तिन सारी ॥
दूजे कही कि हां तुम जावो । लूटे सब ते भवन जलावो ॥
घर परजाके सभी जलाये । नीच ऊंचने बहुदुख पाये ॥
तीजे वचन भूप यों भाखो । कहाफौज सों खोज न राखो ॥
शस्त्र¹ सों बड़े बड़े नर मेलो । लड़के वाले कोल्हू पेलो ॥
यह सुनि सकलप्रजाघिरिआई । राजा पास पुकार सुनाई ॥
बहुतक राजा भये अनूठा² । अपनी प्रजा नहीं कोहुं लूटा ॥
दो० पहिले सबको सुख दिया , अब भे तुम दुखदाय ।
कारण यह कहि दीजिये , सबही को समुझाय ॥
यह कहि साहूकार ने , जो था वाका बाप ।
कुयश चला संसार में , बहुत लगाये पाप ॥
साहुकार पण्डित घने , और बड़ेही लोग ।
कोल्हूकी सुनि कतल³ की, बहुतक माना शोग ॥
आये हैं फरयाद⁴ को , सुने बिगड़ते काज ।
सकल प्रजाको मारिकै , किसकाकरिहौ राज ॥
संकल प्रजा तुव शरणहैं , बकसि देव महराज ।
अपनी अपनी भूमि में , फेरि बसैं सब साज ॥
राजा कही सु मैं नहिं जानूं । अपने मुख से कहा बखानूं
१ हथियार २ उत्तम ३ मारना ४ गोहारि

४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
कहा पुरुष सो इक तुम आनौ । जिनका कहासांच तुममानौ ॥
यह सुनि जवाब सवालहि वारे । आकरि बैठे सबन मँझारे ॥
सो इक नर बहुतै इतबारी । जिनकीसाखिहुतीबहु भारी ॥
तिनको लै राजा के पासा । खड़े किये सब चरणन दासा ॥
राजा उठि उन्हीं के माहीं । मिलि बैठो पुनि वाही ठाहीं ॥
राजा कही जु हरि की ओरैं । ध्यान लगावो मनको मोरैं ॥
घड़ी चारि जब ध्यानलगाया । नभ से शब्द यही जो आया ॥
दो० ढील भूप तैं क्योंकरी , इनकी कीजै जेल ।
बड़े कतलही कीजिये , छोटे कोल्हू पेल ॥
तीनहिं बार लगाया ध्यानी । वारंवार यही भइ बानी ॥
भूप कही कहा दोष हमारा । कोपित भयो जो सिरजनहारा १ ॥
अब तुम परजासों कहि देवो । कतल पेलना कोल्हू लेवो ॥
आय नरनकहि सबमें खोली । सुनि परजा ऐसे उठि बोली ॥
कहन सकल आपस में लागे । हम हैं मूरख बड़े अभागे ॥
हम शुभकर्म कबहुँ नहिं कीन्हे । तिथि पर्वहि केहुदाननदीन्हे ॥
कथा कीर्त्तन में नहिं कहे । कुटुंब जाल में पागे रहे ॥
हरि की भक्ति नहीं चित लाई । ताते अब होतो मुकताई ॥
दो० हरी ही को बिसराइया , पूत महल के काज ।
नाम रहैगो जगत में , सो भी रहा न आज ॥
चले नरक को निश्चय जैहैं । मार यमों की निश्चय खैहैं ॥
कांपत है सब देह हमारी । आपस में भावैं नर नारी ॥
ऐसे ही सब रो रो बोलैं । ब्याकुल भये धरणिमें डोलैं ॥
एक ठाँव ह्वै मता उपाया । सो राजा को जायसुनाया ॥
करजोरे मुख तृण गहिलीन्हे । नखशिखलौं तनदीन जुकीन्हे॥
१ पैदा करनेवाला ॥

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४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकग्रन्थ ।
यह सुनि परजा सब हरषाई । अपने अपने घरको आई ॥
कोउ सिरकी कोउ छप्पर डारा । पका मंदिर नाहिं विचारा ॥
चोरी जारी सबै बिसारी । ढीले भये सभी व्योहारी ॥
अरु साधुनकी वृत्ती धारी । बालक युवा जेंरठ नरनारी ॥
रहे नहीं वै खोटे मनके । भये तपस्वी कृश सब तनके ॥
दो० जो कछु गाड़ो द्रव्य गृह, करी न ताकी आंट ।
राखि लिया षटमास का, अरु सब दीन्हा बांट ॥
जिते धनिक तिन सब यह कीन्हा । हते अनाथ तिनहि दैदीन्हा ॥
कहैं परस्पर धन कहा करिहैं । छठे महीना पीछे मरिहैं ॥
यही समझि उपजा बैरागा । सकलइन्द्रियन का रस त्यागा ॥
फीके लगे भोग सब जगके । सहज काम तब छूटे अघके ॥
सबकी दशा एक जो भई । मौत जानि करि चिन्ता ठई ॥
दिन दिन दुर्बल होते जावैं । हरिहीका जप ध्यान लगावैं ॥
एक एक दिन लागै प्यारा । भजन करैं जगिन्यारा न्यारा ॥
हठ अरु वाद न कोऊ ठानै । इक इक घरी अमोलकि जानै ॥
कहैं कि खोवैं तौ कित पावैं । कथा कीर्तन सों चित लावैं ॥
कथा कीर्तन जित तित होई । साधु समागम ह्वै गये सोई ॥
घरघर शुभ कर्मन व्योहारा । धर्म पकड़ि अधरम सब डारा ॥
ज्यों ज्यों दिवस अवधिके आवैं । घने घने शुभ कर्म कमावैं ॥
दो० जाको होवै मौतभय, जगमें लगै न चित्त ।
झुकै रामकी ओरही, बहुत लगावै हित्त ॥
उन पुरुषनकी यह गति भई । जगकी चाल डारि सब दई ॥
लाड़ चाव व्योहार न कोई । ब्याह सगाई पुत्र न होई ॥
काम क्रोध नहिं उपजै मोहा । लोभ मान नहिं प्रीति न द्रोहा ॥
१ चाल २ वृद्ध ३ प्रेम ४ गुणों का गान करना ॥

धर्मजहाजवर्णन । ४५
ऐसे रहि शुभ कर्म्म जु करें । सदा मौत से सब जन डरें ॥
सहज सहज फिरि वहदिन आया। डरे नहीं शुभकर्म्म कमाया ॥
आपसमें कहें हमको क्या है। यमकी मार नरक भय नाहै ॥
राजा जान्यो वह दिन आया। अपना सेवक तुरत पठाया ॥
कही कि फौज सबै वनि आवैं । कतल करन परजा को धावैं ॥
फौजें सजिकरि ठाढ़ी भईं । आज्ञा ओर दृष्टि जो दई ॥
राजाके मन ऐसी आई । उन सब पुरुपन लेहुँ बुलाई ॥
सांचे सबही के इतवारी । फेरि बुलावो अवकी वारी ॥
यही शोचि फिरि शीश उठाया। आज्ञाकारी निकट बुलाया ॥
दो० कामदार सों यों कही, वैसो पुरुप बुलाय ।
जिनमें मिलिवैठा प्रथम, हरिसों ध्यान लगाय ॥
फिरि उनहिंन को लियो बुलाई। मिलि बैठा सबका सुखदाई ॥
कहीकि सब मिलि सुरति उठावो। रामओर को ध्यान लगावो ॥
अज्ञा होय सोइ तुम मानौ । मेरा दोप कछू मत जानौ ॥
मोको अज्ञा होय सो करिहौं। अपने हिये नेकनहिं धरिहौं ॥
राजा कहि मिलि ध्यान लगाया। ऐसा शब्द गगनसों आया ॥
राजा मैं अब बकसि दियाहै। सकल प्रजाको शुद्ध हियाहै ॥
जिन पर मोको कोप भया था। तिनके कारण खड्ग लियाथा ॥
सर्व प्रजा सो वातें डारी। करिसुकर्म हरिभक्ति सँभारी ॥
दो० ताते अज्ञा यों दई, रचो कुटुँव घरवार ।
शुभकर्म्मन को कीजिये, खोटे कर्म्म निवार ॥
राजाकही खोलि दृग दीजै। अज्ञाभई सोई अब कीजै ॥
खोलि आँख कर जोरिके भाखे। बकसे गये तुम्हारे राखे ॥
जो तुम कहौ सोई अब करें। बचन तुम्हारे हिरदय धरें ॥
राजा कही यही तुम कीजो। रामनामको संगी लीजो ॥

४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुको ध्यान धरो मनमाहीं । विपति जासुसों आवतनाहीं ॥
अपनी त्रिया त्रियाकरि जानो । परतिरियाको माता मानो ॥
परधन को पाहन १ सम देखो । शुभकर्मनको करो विशेखो ॥
बोलौ सांच झूठको नाखो । निन्दा हिंसा नेक न राखो ॥
है रहियो सबके सुखदाई । करुवा वचन न बोलौ भाई ॥
जो व्यवहार करौ सो सांचा । लोक प्रलोक न आवै आंचा ॥
दो० भाषत श्रीशुकदेवजी, सुनौ चरणही दास ।
राजा ने उपदेश दै, खोई सबकी त्रास ॥
फिरि वै पुरुष बिदा है आये । हरि राजाके वचन सुनाये ॥
जिन बातनसों बकसे सारे । सो रखियो तुम हिये मँझारे ॥
उज्ज्वल कर्म भूलि मति जैयो । हरिकीभक्ति माहिँही रहियो ॥
सुनिकरि आपसमें फैलाई । एक एक ने सुनी सुनाई ॥
सबने मानी निश्चय कीन्ही । प्रकट २ सुअपनी आंखिनं चीन्ही ॥
हाथ कँगनको दर्पण केहा । जैसी करणी भुगतै जेहा ॥
खुशीभये लागे व्यँवहारा । रामभक्तिको लिये सँभारा ॥
कहि शुकदेव चरणहीदासा । सकल प्रजा रहै उमगहुलासा ॥
दो० चरणदास सुनिये श्रवण, मैं उपदेशूं तोहिं ।
जो पहिले हरिको भजै, पाछे दुःख न होहिं ॥
कथा कहौं इक और पुरानी । करणी करै सुसमुझै प्रानी ॥
इन्दुनाम इक ब्राह्मण हुता । जाके दश सुत अरु इक सुता ॥
सुता व्याहि दइ घरकी हुई । जाके पीछे माता मुई ॥
पिता मुवा दश पुत्र रहेथे । आपसमें सब बैठि कहेथे ॥
ऐसी कछू जु करणी कीजै । जगमें ऊंची पदवी लीजै ॥
इकने कही हूजिये भूपा । सुन्दर देही धरौ अनूपा ॥
१ पत्थर २ जाहिर ॥

धर्मजहाजवर्णन । ४७
तेज मुल्कमें होवै भारी । हुकुम जुमानैं नर अरु नारी ॥
और एक ऐसे उठि बोला । सावधान ह्वै अन्तर खोला ॥
दो० राजाही का हुकम तो, थोरेही में जोय ।
ऐसी करणी कीजिये, भूपचक्रवै होय ॥
एकद्वीप नौखण्ड में, जाको पूरो राज ।
एक और उठि बोलिया, यह भी ओछा साज ॥
चक्रवर्त्ति१ में इन्द्र बड़, देवन हूँ को भूप ।
उम्र बड़ी आनंद बड़े, दुख की लगै न धूप ॥
करणी करत इन्द्रही लोगा । होकर राजा कीजै भोगा ॥
जहाँ अप्सरा नृत्य करत हैं । सुन्दर अधिकी रूप धरत हैं ॥
और बड़ा भाई यों भाखा । सुरपतिहूको नाहीं राखा ॥
कहा कि पदवी ब्रह्माकीसी । और न दीखै काहू हीसी ॥
जाके एक दिवसही माहीं । चौदह इन्द्र सर्व ह्वै जाहीं ॥
सब ब्रह्मण्ड आसरे वाके । बिनशिजायँ मिटिजायँ जाके ॥
तीनि लोकका पिता वही है । वेद पुराणन माहँ कही है ॥
करणी करिकरि ब्रह्मा हूजै । ऐसी पदवी क्यों नहिं लीजै ॥
दो० सगरे यों उठि बोलिया, सत्य सत्य यह बात ।
ऐसाही अब कीजिये, ठहराई सब भ्रात ॥
दशहू करन तपंस्या लागे । पारब्रह्मकी ओरी पागे ॥
अधिक तपस्या कीन्ही भारी । मास सूखिगया दीखैं नारी ॥
हाड़ त्वचा२ चिपटी रहगई । लोहू धातु३ कछू ना ठई ॥
सब जन चित्रहिसे रहगये । कठिन तपस्या करते भये ॥
फूलपात जलहू नहिं लीन्हा । ऐसा तप दशहूने कीन्हा ॥
तन त्यागे दूजेही जन्मा । दशहू भ्रात हुये जो ब्रह्मा ॥
१ चारों दिशाओं का राजा २ खाल ३ वीर्य ॥

४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिनके दश ब्रह्माण्ड बने हैं। एकएक तिनमाहिं ठने हैं ॥
करणी कबहुँ न निष्फल जावै । जो मनधारे सोई पावै ॥
दो० करणी सों भये इन्द्रहु, करणी ब्रह्मा सोय ।
करणी सों ईश्वर भये, शुकदेवा कहै गोय ॥
दश हजार इक बीसही, वर्ष तपस्या कीन्ह ।
हरिजाको बदलो दियो, मांगो सो वर दीन्ह ॥
चारौ युगके माहिं जो, करणीही परधान१ ।
गुरु शुकदेवा कहत है, चरणदास उरआन ॥
उज्ज्वल कर्म्मन के कियें, दिनदिन उज्ज्वलहोय ।
मनमें उपजै भक्तिही, प्रेम पदारथ सोय ॥
चरणदास तुम करणी कीजो । याही में मन नीके दीजो ॥
ऐसा जन्म बहुरि नहिं पैहै । बीतिजाय पुनि बहु पछितै हैं ॥
मनुष देह को दुर्लभ जानौ । याको पा शुभकरणी ठानौ ॥
यो देही में करी कमाई । जाय स्वर्ग में नौनिधि पाई ॥
भक्तिकरी देही के माहीं । जा बैकुण्ठ सु आये नाहीं ॥
या देही में ज्ञान भया है । जीव ब्रह्म जो होय गया है ॥
मूरख करणी को नहिं जानै । कथनी कथिकथि बहुत बखानै ॥
थोथी कथनी काम न आवै । थोथा फटकै उड़ि उड़ि जावै ॥
दो० कथनीही के बीचमें, लीजो तत्त्व२ विचार ।
सार सार गहि लीजियो, दीजो डारि असार ॥
थोथी कथनी वही जु जानौ । बिन करणी जो करै बखानौ ॥
लोक प्रलोक न शोभा पावै । बकिबकिबकि खाली रहिजावै॥
कथनी के शूरा बहु जाने । करणी में कायर अरु याने ॥
शूरा वही जु करणी करै । दया धर्म्मलै सन्मुख अरै ॥
१ मुख्य २ पृथ्वी अप् तेज वायु आकाश ॥

धर्मजहाजवर्णन । ४६
पाँव धरे सो नाहीं उठावै । करणी करता चला जु जावै ॥
फिरै जबहिं फल लैकर आवै । सो वह शूरा मल्ल कहावै ॥
कायर बीचहि सों फिरि आवै । सो वह करणी को बिसरावै ॥
आपन खोट न जानै भोंदू । वह तौ कथनीही का गोंदू ॥
दो० ऐसे जगमें बहुत हैं, वैसे जगमें नाहिं ।
कोई कोइहि देखिये, सतगुरु के मग माहिं ॥
होनहार को बहुत बतावैं । पै ताको कछु मर्म न पावैं ॥
कहैं कि होनी होय सुहोई । ताको मेटिसकै नहिं कोई ॥
याको समझ उपाय न करिया । श्रद्धा तजि कायरह्वै परिया ॥
समझि निखट्टु¹ गृही भहे । वेष धारि बिन करणी रहे ॥
जानतनाहिं जु पिछिली करणी । अब कै भई जु होनी भरणी ॥
परालब्ध² अरु भाग्य कहावै । पिछले कर्म्मन से उपजावै ॥
अबके करै सु आगे पावै । कछू कछू फल अभी दिखावै ॥
कै काहू गाली दै देखो । कै काहू को मारि विशेखो ॥
कै काहूको अशन खवावो । कै काहूको शीश नंवावो ॥
कै करि चोरी द्यूतहि³ खेलौ । कै काहूको गुस्सा झेलौ ॥
दोनों का फल आगे आवै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
प्रगट देखिये यही तमाशा । नीच ऊंच करणी परकाशा ॥
दो० कोटि यही उपदेश है, यही जु सगरी बात ।
करणीही बलवंत है, यों शुकदेव दिखात ॥
मनकी करणी ज्ञान है, परमातम लखिलेय ॥
ब्रह्मरूप है जाय जब, छूटै सबही भय ॥
भवसागर⁴ में भय घने, ताकी लगै न आंच ॥
झूठेको भय बहुत है, भय नहिं व्यापै सांच ॥
१ कोईकाम न करनेवला २ कर्म्म ३ जुवां ४ संसार ॥

५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
करणीही सों पाइये, पारब्रह्म का खोज ।
सतगुरु पै चलि जाइये, मेटै सबही सोज ॥
इच्छाब्रह्म करी सोइ करणी । ईश्वर रूप धरालै धरणी ॥
महतत् करि अहँकार जुकीये । तीनरूप^१ उनको करिदीये ॥
राजस^२ तामस^३ सात्त्विक^४ जानौ । एही त्रैगुण मनमें आनौ ॥
राजस सों जगको उपजावै । सात्त्विक सों पालै सिरजावै ॥
तामस सों विनशावै तोड़ै । बहुत सृष्टि नहिं भूपर जोड़ै ॥
जोड़ै तौ वह कहां समावै । धरती का परमाण^५ कहावै ॥
योजन पचास क्रोड़ बताई । वेद पुराणन में जो गाइ ॥
धरती करणीही सों ठाढ़ी । कछुवा शेष भये जो आढी ॥
करणीही सों घन वरसावै । वादल मिलती पवन चलावै ॥
दो० करणी सों करतारही, धरा ब्रह्म का नावँ ।
माया भी तौ उन करी, खेली बहु विधि दावँ ॥
कोई निराकार बतलावै । कोई निर्गुण कहि समझावै ॥
कोइ कहै दोनों से न्यारा । है जु अकर्त्ता अलख^६ अपारा ॥
कहैं कि माया कियो पसारा । जेता दीखै यह संसारा ॥
तौ कहु माया कितसों आई । अन्त यही हरिने उपजाई ॥
वही सृष्टि का कारण काजा । वाने जगत प्यारकरि साजा ॥
देह देह में वह दरशावै । चतुर हो चतुराई पावै ॥
जैसे बरतन गढ़ै कुम्हारा । सव में दीखै सिरजनहारा^७ ॥
चित्र^८ मध्य चित्रामी सूझै । सुरति लगाय लगाय उरूझै ॥
जवहीँ बनी वनाई नीकै । कहि शुकदेवजु अपने जीकै ॥
१ ब्रह्मा विष्णु महेश २ रजोगुण ब्रह्मा ३ तमोगुण शिव ४ सतोगुण विष्णु
५ अंदाज ६ न देखपड़नेवाला ७ बनानेवाला ८ तस्वीर ॥

धर्मजहाजवर्णन । ५१
दो० बिना किये कछु होयना, आपहि लेहु विचार ।
करणी देखी दूर लों, शोचा वारंवार ॥
चरणदास तोसों कहौं, उठि उद्यम को लाग ।
आलस सकल गवांयकै, विषयन² में मतिपाग ॥
कारज लोक प्रलोक के, विन करणी हो नाहिं ।
करणी ही सों होतहैं, करणी सबके माहिं ॥
खोटे कर्म्मन सों दुखी, या दुनिया के बीच ।
करणी ही सों होतहै, नर ऊंचा अरु नीच ॥
संगति मिलि करने लगे, ऊंचे नीचे कर्म्म ।
बुद्धि मैली जो होति है, खोवै अपना धर्म्म ॥
सतसंगति सों रहत है, धर्म्म कुसंगति जाय ।
चरणदास शुकदेव कहि, दोनों दिये दिखाय ॥
धर्म गया जब सत गया, भ्रष्ट भई अति बुद्धि ।
तबहिं पाप अरु पुण्यकी, कछू रही ना शुद्धि ॥
पाप पुण्यही सत्य है, ठहरि रहा ब्रह्माण्ड ।
इन दोनों के मिटतही, होत खण्डहू खण्ड ॥
पाप पुण्य व्यवहार है, ताहि देखि प्रत्यक्ष ।
जाही सेती प्रेत यम, देवत गण अरु यक्ष ॥
चौरासी अरु पुरुष सब, चंद सूर³ लौं जान ।
पाप पुण्य के फेर में, सबही पड़े पिछान ॥
पाप किये नरकै पड़े, पावै दुःख अपार ।
पुण्य किये सुख बहुत है, देखो दृष्टि उघार ॥
विरले जन को होत है, पाप पुण्य की सूझ ।
सोइ छुटै जग जाल सों, बहुतै रहै अरूझ ॥
१द्वन्ध २ काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य ३ सूर्य ॥

५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लक्ष बात की बात है, कोटि बात की जान ।
पाप पुण्य सों जानिये, लाभ होय कै हान ॥
करणी बिन थोथा रहै, कछू न पावै भेव ।
विभव प्राप्त कहुँ होयना, कहैं जु यों शुकदेव ॥
होनी कहैं जु वेभी सारे । करणी करते दृष्टि निहारे ॥
बिन करणी व्यवहार न चालै । नहीं तौ बैठे रहजा ठालै ॥
कृत्य करै सो भी यह करणी । बनिया हाट पांडिया वरणी ॥
करणीही सों खावै पीवै । योग करै बहुतै दिन जीवै ॥
मन मांजै सबही परकाशै । करणीबिन झूठी सब आशै ॥
करणीही सों सिधि द्वै जावै । अष्टसिद्धि करणी सों पावै ॥
जीवन्मुक्ती करणी हेती । सुनिले सकल शास्त्र१ सों तेती ॥
गुरु सों निश्चय यहै जु कीनी । रणजोता मैं तुम को दीनी ॥
दो० यह तौ धर्म जहाज है, मैं तोहिं दई निहार ।
भवसागर मों डारियो, चढ़ै सो उतरै पार ॥
बादवान पुनि खेइयो, दीजो ताहि चलाय ।
पानी पाप निकासियो, नेकहु ना भरिजाय ॥
चढ़ि उतरै जो पारही, पावै सुख का धाम ।
आनँदही आनँद लहै, करै तहां विश्राम ॥
शिष्यवचन ॥
दो० धन्य श्रीशुकदेव हो, वचन तुम्हारे धन्य ।
सब संदेह मिटाय करि, निश्चल कीन्हो मन्य ॥
व्यास पुत्र तुम मम गुरु देवा । करूं मान२सी तुम्हरी सेवा ॥
मन में तुम्हरी पूजा साजू । तुमसों पूंछ करौं सब काजू ॥
मेरे ध्यान शिताबो आये । जो थे सो सन्देह मिटाये ॥
१ सांख्ययोग मीमांसा न्याय वैशेषिक धर्मशास्त्र २ जो मन में की जाय ॥

धर्मजहाजवर्णन । ५३
मैं तौ ध्यान करतही रहूँ। तुम्हरी मूरति हिरदय गहूँ ॥
मेरे जीवन प्राण अधारा । मैं नहिं रहौं चरण से न्यारा ॥
तुम्हरो चरणन दास कहाऊं । वार वार तुम पै बलि जाऊं ॥
तुम्हीं को ईश्वर करि मानूं । पारब्रह्म तुम्हीं को जानूं ॥
और न कोई दूजी आसा । मो हिरदय में राखौ वासा ॥
दो० अपने चरणहिं दास को, सब विधि दिया अघाय ।
स्तुतिकरूं तौ क्या करूं, मोपै कही न जाय ॥
इति श्रीगुरुचेलेका संवादधर्मजहाजसम्पूर्णम् ३ ॥
अथ श्रीगुरुशिष्यसंवादअष्टाङ्ग
योग प्रारम्भः ॥
शिष्यवचन ॥
दो० व्यासपुत्रधनिधनि तुम्हीं, धनि धनि यह अस्थान ।
मम आशा पूरी करी, धनिधनि वह भगवान ॥
तुम दर्शन दुरलभ महा, भये जु मोको आज ।
चरण लगो आपादियो, भये जु पूरण काज ॥
चरणदास अपनोकियो, चरणन लियो लगाय ।
शिरकरधरिसबकछुदियो, भक्तिदई समुझाय ॥
बालपने दरशन दिये, तबहीं सब कछु दीन ।
बीज जु वोया भक्तिका, अब भया वृक्ष नवीन ॥
दिन दिन बढ़ता जायगा, तुम किरपा के नीर ।
जबलगमाली ना मिला, तवलग हुता अधीर ॥
अरु समुझाये योगही, बहु भांती बहु अंग ।

५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऊरधरेता ही कही, जीतन बिंद अनंग ॥
अरु आसन सिखलाइया, तिनकी सारी विद्धि ।
तुम्हरी कृपा सों होहिंगे, सबही साधन सिद्धि ॥
इक अभिलाषा और है, कहि न सकूं सकुचाय ।
हिये उठे मुख आयकरि, फिरि उलटी ही जाय ॥
गुरुवचन ॥
दो० सतगुरु से नहिं सकुचिये, एहो चरणहि दास ।
जो अभिलाषा मन विषे, खोलि कहौ अब तास ॥
शिष्यवचन ॥
सतगुरु तुम आज्ञादई, कहूँ अपनी बात ।
योगअष्टांग बुझाइये, जाते हियो सिरात ॥
मोहिं योग बतलाइये, जोहै वह अष्टांग ।
रहनीगहनी विधिसहित, जाके आठो आंग ॥
मत मारग देखे घने, ह्यांसियरे भये प्रान ।
जो कुछ चाहौ तुम करौ, मैं हौं निपट अयान ॥
गुरुवचन ॥
योगअष्टांग बुझाइहैं, भिन्न भिन्न सब अंग ।
पहिले संयम सीखिये, जाते होय न भंग ॥
शिष्यवचन ॥
संयम काको कहतहैं, कहौ गुरू शुकदेव ।
सो सबही समुझाइये, ताको पावै भेव ।
गुरुवचन ॥
प्रथम सूक्ष्म भोजन खावै । क्षुधामिटै नहिं आलस आवै ॥


१ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि ये
अष्टांगयोग कहलाते हैं ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ५५
थोड़ासा जल पीवन लीजै । सूक्ष्म बोलै वाद न कीजै ॥
बहुत नींद भर सोवै नाहीं । दूजा पुरुष न राखै पाहीं ॥
खट्टा चरपरा खार न खावै । बीरज क्षीण होन नहिं पावै ॥
करै न काहू वैरी मीता । जगवस्तुकी रखे न चीता ॥
निश्चल द्वै मनको ठहरावै । इन्द्रिनके रस सब बिसरावै ॥
तिरया तेल नहिं देह छुवावै । अष्ट सुगन्ध¹ अंग नहिं लावै ॥
पुरुषन की राखै नहि आसा । गुरुका रहै चरणही दासा ॥
दो० काम क्रोध मद लोभ अरु, राखैना अभिमान ।
रहै दीनताई लिये, लगै न माया वान ॥
छल नहिं करै न छल में आवै । दम्भ² झूठके निकट न जावै ॥
टोना यंत्र भूत नहिं ध्यावै । झूठ जानके सब बिसरावै ॥
धातु रसायनि मन नहिं लीजै । झूठ जानि याहू तजिदीजै ॥
स्वांग तमाशे बाग न जैये । आसन ऊपर बैठा रहिये ॥
दृढ़ ह्वै लगै युक्तिके माहीं । ताते विघ्न होय कछु नाहीं ॥
रूठा रहै जगत लोगन सों । न्यारा रहै सबही भोगन सों ॥
इन्द्र आदि लौं सुख संसारी । नेक न चाहै चित्त मँझारी ॥
सिमिटि रहै हिय माहिं समावै । ऐसे योग सधै सिधि पावै ॥
दो० ऋद्धि सिद्धि अरु कामना, तिनकी रखै न आस ।
मान बड़ाई चपलता, त्यागै चरणहिं दास ॥
गहि संतोप क्षमा हिय धारै । संयम करिकरि रोग निवारै ॥
अहङ्कारको छोटा करिये । कुटिल मनोरथमन नहिं धरिये ॥
बसिये जितहि देश सुस्थाना । निर उपाधि धरती अस्थाना ॥
भली भूमि लखि गुफा बनावै । नीची ऊंची रहन न पावै ॥
१ तेल, फुलेल, चोवा, चन्दन, कपूर, इत्र, केसरि, कस्तूरी ये अष्ट सुगन्ध
कहलाते हैं २ मिथ्या बातें बनाना ॥
६

५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
जिमीं बराबर चौरस होई । होय लदाव कि मधरी सोई ॥
साँकर द्वार कपाट लगावै । कहूँ छिद्र रहने नहिं पावै ॥
तामें बैठि योग तप कीजै । दूजो पुरुष न भीतर लीजै ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । जगसों रहिये सदा उदासा ॥
दो० यह सब निश्चयही करै, योग युक्ति के साथ ।
पहिले ऐसा होय करि, पीछे साधन साध ॥
आठ अंग कहुं योगके, सुनो चरणहीं दास ।
मेरे बचनन के विषे, चितदै करौ निवास ॥
यमके अंग प्रथम सुनि लीजै । दूजे नियम कहूँ चित दीजै ॥
तीजे आसन हितकरि साधौ । प्राणायाम चौथे आराधौ ॥
प्रत्याहार पांचवां जानौ । छठे धारणा को पहिंचानौ ॥
सतवें ध्यान मिटै सब बाधा । कहूँ आठवां अंग समाधा ॥
शिष्यवचन ॥
धन्य धन्य तुम श्री गुरुदेवा । मेरे प्राणनाथ शुकदेवा ॥
व्यास पुत्र तुम दीन दयाला । मम अनाथ को कियो निहाला ॥
आठ अंग मोहिं दिये सुनाई । अब कहु भिन्न भिन्न समुझाई ॥
एक एकको जुदा बखानो । जासों जाय दास पर जानो ॥
गुरुवचन
दो० एक एक का कहतहौं, जुदा जुदा विस्तार ।
श्रवणन सुनौ विचारिकै, लेलै हियमें धार ॥
अथ यमअंग वर्णन
प्रथम कहौं यम के दश अंगा³ । समझैं योग न होवै भंगा ॥
१ कँवारा २ प्राण अपान व्यान उदान समान ३ अहिंसा, सत्यदृढ़ असत्-
त्याग, ब्रह्मचर्य धरना, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मात्सर्य, तृष्णा इनसे पृथक्
रहना, क्षमा, धैर्य, दया, आर्जव, मिताहार यानी सूक्ष्म भोजन करना ये यमके
दश अंग कहलाते हैं ॥