भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
कोमल भोजन कीजिये, आधी रखिये भूख ।
पवन बसै सुखसों जहां, तन नहिं पावै दूख ॥
साठिघरी दिनराति की, आठ तासुके याम ।
लीजै चौथा भागही, कीजै प्राणायाम ॥
चारभाग ताके करै, चार समै ठहराय ।
चार चार घटिका करै, दृढ़ब्रत चित्तलगाय ॥
और दूसरी भांति सुनीजै । हो नसकै तौ याको कीजै ॥
बारह ॐ पवन चढ़ावै । कुम्भक माहिं बीस ठहरावै ॥
बारह पिंगल पवन उतारै । राति दिनामें चारहिबारै ॥
फेरि बढ़ावै कुम्भक दुगुनी । केते द्यौसन में फिर तिगुनी ॥
फिर पिंगल सों पूरक लीजे । इड़ा बायु रेचकही कीजे ॥
बिरिया एक इड़ा सों खेंचे । पिंगल दूजीबार जु एंचे ॥
कबहुँ यासू कबहुँ वासों । रेचक करै जो पूरक जासों ॥
कुंभक तिगुनी सो अधिकावे । होयसके जितनी सरकावे ॥
दो० भांति दूसरी और सुनि, साधन अधिक अनूप ।
गुरु बिन भेद न पाइये, महा गुप्त सों गूप ॥
अष्टपदी ॥
प्राण वायुकी युक्ति कहौं जेहि बातहै ।
द्वादश अंगुल नासिका आगे जातहै ॥
संयमही सों सहज जु उलट घटाइये ।
शनैशनैही साध जु ताहि समाइये ॥
अपान वायुको खेंचि प्राण घर लाइये ।
फिरि बाहर सों रोंकि जु तिन्हें मिलाइये ॥
तीनि कर्म पूरकके कुम्भकके कहे ।
१ धीरेधीरे ॥