भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ५७
प्रथम अहिंसाही सुन लीजै । मनकरि काहू दोष न कीजै ॥
कड़ुवा वचन कठोर न कहिये । जीवघात तनसों नहिं दहिये ॥
तन मन वचन न कर्म लगावै । यही अहिंसाधर्म कहावै ॥
दूजे सत्य सत्यही बोले । हिरदै तौलि वचन मुख खोलै ॥
तीजे असते त्याग सुनीजै । तनमन सों कछु नाहिं हरीजै ॥
तन चोरी के लक्षण नाखै । मनकी चोरी को नहिं राखै ॥
चौथा ब्रह्मचर्य बतलाऊं । भिन्न भिन्न करि ताहि सुनाऊं ॥
दो० ब्रह्मचर्य यासों कहैं, सुनहु चरणही दास ।
आठ अंगैं सो नारिकी, नेक न राखै आस ॥
यती होय दृढ़ काँछ गहीजै । वीर्य क्षीण नहिं होने दीजै ॥
मैथुन कहूँ अष्ट परकारा । ब्रह्मचर्य रहै इनसे न्यारा ॥
सुमिरणतियाको नहि करिये । श्रवणनसुरति रूप नहिं धरिये ॥
रस शृंगार पढ़े नहिं गावै । नारिनसों नहिं हँसै हँसावै ॥
दृष्टि न देखे विष नहिं दौरै । मुख देखै मन होजा औरै ॥
बात इकन्त करै नहिं कबहीं । मिलन उपाय जुत्यागै सबहीं ॥
स्पर्शअष्टम निकट न जावै । कामजीति योगी सुखपावै ॥
अष्टप्रकारके मैथुन जानों । इन्हें तजे ब्रह्मचर्य पिछानों ॥
कहैं शुकदेव चरणहीदासा । ब्रह्म सत्य में करै निवासा ॥
दो० पँचवीं सुखदाई क्षमा, जलन बुझावै सोय ।
जोटुक आवै घटविषे, पातक डारै खोय ॥
१ विद्या पढ़ना व्रत करना नित्यकर्म संध्यावन्दनादि करना भिक्षा मांगि
कर भोजन बनाय गुरु को नैवेद्य लगाय भोजन करना इसे ‘ब्रह्मचर्य कहते
हैं २ स्मरण, सुरति, शृङ्गारावलोकन, हास्य करना, दृष्टि सों त्रिया रूप
देखना, मिलन उपाय, स्पर्श, एकान्त में वार्त्तालाप करना ये अष्टाङ्ग विषय
के कहलाते हैं ॥