भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और पराये दुख की बूझै । सुखदानी परमारथ सूझै ॥
पंचम ईश्वर पूजा करिये । तन मन बुद्धि जहांलै धरिये ॥
है निष्काम तजै सब आसा । सेवा करै होय निजदासा ॥
दो० पान फूल जु भाव सों, सह सुगन्ध करि धूप ।
शुकदेव कहैं यों कीजिये, पूजा अधिक अनूप ॥
छठें सिद्धान्त श्रवण सुन बानी । करि विचार गहिये मनमानी ॥
सार असार विचार जु कीजै । पानीको तजि पयको पीजै ॥
अरु सतगुरुसों निश्चय करिये । परखि सँभारि हिये में धरिये ॥
करणी करै तिन्हों से मिलना । वचन अयोगी के नहिं सुनना ॥
सतवां वही जु कहिये लाजा । सो वह सकल सँवारन काजा ॥
साधु गुरूंसें लाज कीजै । तन मन डोलन नाहीं दीजै ॥
करम विपर्यय सब परिहरिये । हिय आंखिन में लज्जा भरिये ॥
शुकदेवकहै सुनिचरणहिंदासा । लज्जा भवन माहिं करि बासा ॥
दो० कुटुंब मित्र जग लोगही, सबसूं कीजै लाज ।
बड़ी लाज हरिसूं करो, नीके सुधरै काज ॥
अष्टम हूँ मति दृढ़ जो कहिये । सो विशेष साधनकूं चहिये ॥
शुभ करमनकी इच्छा करनी । हो न सकै तौ भी हिय धरनी ॥
बहँकै ना काहू बहँकाये । कैसेहू नहिं हलै हलाये ॥
जग सुख देखि न मनमें आनै । स्वर्गआदि सुख तुच्छहिजानै ॥
कोइ अस्तुति आदर करि सेवै । कोइ कुभाव करि गाली देवै ॥
दोनों में निश्चल रहै जोई । शुकदेव कहैं दृढ़मति है सोई ॥
नवयें जाप करै गहि मौना । मन जिह्वासूं कीजै जौना ॥
होयसकै मन पवन गहीजै । गुरुमन्तर जप तामें कीजै ॥
दो० हरिगुरुकी अस्तुति पढ़ै, सो भी कहिये जाप ।
शुकदेव कहैं रणजीतसुनि, त्रैविधि नाश ताप ॥