भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ६१
दर्शवं समझौ होमही, कीजै दोय प्रकार ।
अँगन माहिं साकिल्ल कूं, वेद कहै ज्यों डार ॥
दूजै पावक ज्ञानकी, तामें इन्द्री होम ।
वाकूं परगट भूमि है, याकूं हिरदा भौम ॥
यमका अंग सभी कह दीन्हा । नेम कहा सोभी तुम चीन्हा ॥
निरैयोगही के मतजानौ । सबके कारज को पहिचानौ ॥
औपै योग पहल ये चहिये । शुभकरमन के मारग गहिये ॥
जोये होय तौ होवै योग । नाहीं बहै जगत के भोग ॥
जज्ञासीकूं पहल सुनीजै । पाछे भेद योगको दीजै ॥
यम अरु नियम दोऊ बतलाये । अच्छी नीकी भांति सुनाये ॥
अब तीजै आसन समझाऊं । जुदे जुदे कहि सबै सुनाऊं ॥
योग पहिल आसनही साधै । आसनविना योग बरबादै ॥
अथ आसनवर्णन ॥
दो० चरणदास निश्चय करौ, बिन आसन नहिं योग ।
जो आसन दृढ़ होय तो, योग सधै भजि रोग ॥
चौरासीलख आसन जानौ । योनिनकी बैठक पहिचानौ ॥
तिनमें चौरासी चुग लीन्हें । दुरलभ भेद सुगम सों कीन्हें ॥
सो तुमकूं पहिले बतलाये । जिनकूं साधौगे चितलाये ॥
तिनमें दोय अधिक परधा२नैं । तिनकूं सब योगेश्वर जानैं ॥
आसनसिद्ध पदम कहलावै । इनकूं करि निश्चय ठहरावै ॥
अरु आसन सब रोग भजावैं । ये दो आसन योग सधावैं ॥
इन कूं साधै जो जन कोई । ध्यान समाधि लगावै सोई ॥
१ नवलक्ष जलचर, दशलक्ष नभचर, ग्यारहलक्ष कृमि, बारहलक्ष वनचर,
चारिलक्ष मनुष्य, तीसकक्ष पशुयोनि इत्यादि चौरासीलक्ष योनि हैं २ मुख्य ॥