सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोई दुष्ट कछू कहिजावो । गाली देकर कोइ खिझावो ॥
कै कोइ शिरपर कूड़ा डारो । कै कोइ दुखदेबो अरु मारो ॥
बाकी कछू न मनमें लावै । उलटा उनको शीश नवावै ॥
ऐसी क्षमा हिये में लावो । बोलौ शीतल अग्नि बुझावो ॥
छठाँ अंग धीरज का जानौ । धीरजही हिरदय में आनौ ॥
योगयुक्ति धीरज सों कीजै । सब कारज धीरज सों लीजै ॥
धीरज सों बैठै अरु डोलै । धीरज राखि समुझिकर बोलै ॥
आनि परै दुख ना अकुलावै । धीरज सों दृढ़ता गहिलावै ॥
दो० धीरज रहा तौ सब रहा, काहूसे न डराय ।
सिंह प्रेत अरु कालका, धीरज सों डरजाय ॥
दया सातवीं अब सुनि लीजै । सब जीवन की रक्षा कीजै ॥
लख चौरासी का सुखदाई । सबके हित की कहै बनाई ॥
रहिये तन मन बचन दयाला । सबही सों निर्वैर कृपाला ॥
अठवै कहूँ आर्य्यवै खोलै । कोमलहृदय सों कोमलबोलै ॥
सबको कोमल दृष्टि निहारै । कोमलता तन मन में धारै ॥
कोमल धरती बीज बवावै । बढ़े बेगि फूलै फल लावै ॥
ऐसे कोमल हिया बनावै । योग सिद्धि करि पद पहुँचावै ॥
यही आर्य्यव लक्षण जानो । शुकदेवकहैं रणजीतपिछानो ॥
दो० मिताहार जो नवें की, समझ लेहु मनमाहि ।
सतगुन भोजन खाइये, ऐसा वैसा नाहिं ॥
खावै अन्न विचारिकै, खोंटा खरा सँभार ।
जैसाही मन होत है, तैसा करै अहार ॥
सूक्ष्म चिकना हलका खावै । चौथाभाग छोड़ि करि पावै ॥
वानप्रस्थ कै हो संन्यासै । भोजन सोलह ग्रास गिरासै ॥
अरु गृहस्थ बत्तीस गिरासा । आव नींद न बहुत न श्वासा ॥