भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ७५
कुम्भक राखै सबतन माहीं । ढीला गात रमावै ह्वाहीँ ॥
नासा सेती रेचक कीजै । एकमास सिधिहो सुखलीजै ॥
पीजै पवन जीभको मोड़े । सहजै छोड़ै नासा ओड़े ॥
दोनों रंध्रसे तजि दीजै । यों अभ्यास पूर करलीजै ॥
ताप तिली गोला ज्वर होई । वाके तनमें रहै न कोई ॥
देह पुरानी नूतन होय । तीनि वरष साधै जो कोय ॥
जैसे सांप केंचुली भौंहिं । श्वेत बाल तजि काले होहिं ॥
काहू भांतिका दुख नहिं व्यापै । भूख प्यास तिसभाजै आपै ॥
अथ भस्त्रिका ॥
दो० अबकहूँकुम्भकभस्त्रिका, पित कफ वायु नशाय ॥
अगिनि बढ़ै अभ्याससों, तीनि गांठि खुलिजाय ॥
आसनपद्म सुयाविधि करै । बामजंघ दहिनो पग धरै ॥
बावों पग दहिनी पर लावै । जांघनसों दोउहाथ मिलावै ॥
ग्रीवा पेट बराबर राखै । आगे सुनु शुकदेवा भाखै ॥
मुख मूदै रेचै नासासूं । पूरक चपल करै श्वासासूं ॥
रेचक पूरक ऐसे कीजै । वारंवार तजै अरु लीजै ॥
जैसे खाल लोहारा भरै । रेचक पूरक आतुर करै ॥
करत करत जबहिं थकिजावै । नेक ठहरि दूजी विधि लावै ॥
फिरि पूरक सूरजसों करै । पवन उदरके माहीं भरै ॥
तर्जनि अँगुली सों दृढ़ रोकै । नासामध्य धारकरि जोखै ॥
दो० कुम्भक पिछली भांतिकरि, रेच इड़ासों वाय ।
कफ पित वायु नशायकै, लेवै अग्नि बढ़ाय ॥
कुण्डलिनी देवैजगा, यह कुम्भक सुखदाय ।
करै जुहित व्रत धारिकै, चरणदास चितलाय ॥
कुण्डलिनी सरकायकै, बेधै तीनों गांठ ।