भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जीव, ब्रह्म हैजात है, पावै अपनी आद ॥
चरणदास अब कहत हूँ, वही जु प्राणांयाम ।
शुकदेव कहै ताके किये, पावै मन विश्राम ॥
बहत्तरहजार आठसौचौंसठनारी । सबकी जड़है नाभि मँझारी ॥
तिनमहँ दश नाड़ी शिरमौरी । पाँच बायें पाँच दहनी ओरी ॥
जिनमें तीनि अधिक परधान । इड़ा पिंगला सुषमनजान ॥
उनमें सुषमन अधिक अनूप । सो वह कहिये अग्नि स्वरूप ॥
दश नाड़ी अस्थान बताऊं । ठौर ठौर तेहि कहि समझाऊं ॥
दो० नाड़ि शङ्खिनी गुदामें, किरकल लिंगस्थान ।
पोषा सरवन दाहिने, जसनी बायें कान ॥
गंधारी दृग बामही, हस्तिनि दाहने नैन ।
नारि लंबका जीभमें, सब सवाद सुखदैन ॥
नासा दहिने अंगहै, पिंगल सूरज वास ।
इड़ा सुबायें ओर है, जहां ससियर परकास ॥
दोऊ मध्य में सुषमना, अद्भुत वाको भेव ।
ब्रह्म नाड़िहू कहत हैं, यों कह सो शुकदेव ॥
इड़ा ब्रह्मा जमुना जहां, सुषमन विष्णु निवास ।
और सरस्वति जानिये, येहो चरणहिं दास ॥
शिव पिंगल गंगा सहित, सो वह दहिने अंग ।
तिरवेणी याते भई, मिलीं जु तीनौ संग ।
कबहुँ इड़ा स्वर चलत है, कबहूँ पिंगल माहिं ।
मध्य सुषमना बहत है, गुरु बिन जानै नाहिं ॥
सोवह अग्नि स्वरूप है, बड़ी योग सरदार ॥
याहीते कारज सरै, ऐसी सुषमन नार ॥
इनसों प्राणायाम करीजै । पूरक कुम्भक रेचककीजै ॥