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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चक्रवर्णन ॥
दो० अब चक्र¹ बरनन करूं, पाछे प्राणायाम ।
बरणूं नारी सुषमना, सुधरै सबही काम ॥
हैं वे सूरति कमल की, छोटे और विशाल ।
मूलसुं लेकर शीशलौं, एकहि जिनकी नाल ॥
कुं० लालरंग पहिला कहूँ चक्रधार तिहि नाँवँ ।
चार पँखरी² तासु की हैं जु गुदा के ठावँ ॥
हैं जु गुदा के ठावँ देह तांही पर राजै ।
चारों अक्षर तहाँ देव गन्नेश विराजै ॥
पवन सुरत हां लैधरै खोलि कहैं शुकदेव ।
दूजा लिंगस्थानही जाको सुन अब भेव ॥
पीतबरण षट पँखरी नामजु स्वाधिष्ठान ।
षट अक्षर जापै दिये ब्रह्मा दैवत जान ॥
ब्रह्मा दैवत जान सँग सावित्री³ दासा ।
इन्द्र सहित सब देव तहां सबही का बासा ॥
मणिपूरक चक्र कहूं तीजा नाभि स्थान ।
नीलबरण दश पँखरी दश अक्षर परमान ॥
दो० विष्णु जहांका देवता, महालक्ष्मी संग ।
चरणदास अब कहतहूँ, चौथे को परसंग ॥
अनहदचक्र हिरदयबिषे, द्वादशदल अरुश्वेत ।
शिवशक्ती⁴ जहाँ देवता, द्वादश अक्षर भेद ॥
पँचवां चक्र कंठ में, विशुद्ध नामजिहिकेर ।


१ आधार,स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनहद, विशुद्ध, आज्ञा ये छः चक्र
शरीर के अन्तर रहते हैं २ पंखुरी ३ सरस्वती ४ पार्वती ॥