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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 690 में से

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पृष्ठ 107

७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
सकल शिरोमणि योग मंझारी। ज्यों मनुषों में छत्तर धारी ॥
शीश फूल ज्यों गहनो माहीं । या बिन ताड़ी लागै नाहीं ॥
साधन कर कर जीभ बढ़ावै । सो ब्रह्मरंधरताईं लावै ॥
उरैताल वा ठौर कहावै । रसना सूं द्वां बंध लगावै ॥
जासूं पवन न सरकन पावै । श्रवण नैनजू बाट रुकावै ॥
प्राणवायु बाहर नहिं आवै । मुखनासा हो निकस न जावै ॥
शुकदेव कहैं चरणदास बताऊं । आगे मूलबंध समुझाऊं ॥
दो० मूल बन्ध जानौ यही, एंडी गुदा लगाव ।
थक दहनी वावीं कभी, सिध आसन ठहराव ॥
मूलबन्ध जा कारण दीजै । सो मैं कहूँ सबै सुनि लीजै ॥
अधार चक्रसूं पवन उठावै । स्वाधिष्ठानहिं के ढिग लावै ॥
दहिनी ओर कूं ताहि फिरावै । ऐसी तीन लपेट लगावै ॥
सीधा ह्वै ऊपर कूं धावै । मणिपूरक चकर में आवै ॥
शनई शनई ताहि चढ़ावै । चकर चकर में पहुंचावै ॥
भूचकर के ऊपर ताईं । ब्रह्मरंध्र के लावै ठाईं ॥
ऐसे षट चकर कूं शोधै । प्राण वायु को यों परबोधै ॥
अपान वायु जो ह्यांतक आव । प्राण वायु ह्वै सहज समावै ॥
शुकदेव कहै सुन चरणहिं दासा । सहज शून्यमें करै निवासा ॥
अथ अष्ट प्रकार के कुम्भक वर्णन ॥
शिष्यवचन ॥
दो० प्राणायाम की विधि सबै, गुरु तुम दई सुनाय ।
सो लेकरि हिरदै धरी, ताहि न देउं भुलाय ॥
चरणदासके शीश पर, तुम्हीं गुरु शुकदेव ।
कुम्भक अष्ट प्रकार के, तिनको कहिये भेव ॥
लक्षण नाम स्वभाव गुण, जुदे जुदे समुझाय ।